बार-बार छींक और बंद नाक से हैं परेशान? सिर्फ धूल-मिट्टी नहीं, ये 6 कारण भी करते हैं एलर्जी को ट्रिगर
इस आर्टिकल में आप एलर्जी की कुछ ऐसी वजहों के बारे में जानेंगे, जिनपर आमतौर पर लोगों का ध्यान बहुत कम जाता है।

धूल-मिट्टी से बचकर भी क्यों हो रही है एलर्जी? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम अक्सर सोचते हैं कि एलर्जी का मतलब सिर्फ धूल-मिट्टी या किसी खास खाने से होने वाली परेशानी है। हम इन चीजों से बचते भी हैं, लेकिन फिर भी अचानक नाक बंद होना, छींकें आना या त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाना हमारा पीछा नहीं छोड़ते।
आखिर ऐसा क्यों होता है? पीजीआई चंडीगढ़ की एचओडी, डॉ. जयमंती बख्शी का कहना है कि इसके पीछे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में छिपे कुछ ऐसे कारण हैं, जिन पर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता। आइए, आसान भाषा में समझते हैं इन अनदेखे 'ट्रिगर्स' को जो आपकी एलर्जी को चुपचाप बढ़ा रहे हैं।

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आपका अपना बेडरूम
हम अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा बिस्तर पर बिताते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि यही जगह एलर्जी की सबसे बड़ी जड़ हो सकती है।
हमारे गद्दों, तकियों और चादरों में 'डस्ट माइट्स' नाम के ऐसे सूक्ष्म जीव पलते हैं जिन्हें हम नंगी आंखों से नहीं देख सकते। जब हम सांस लेते हैं, तो ये हमारे शरीर में चले जाते हैं।
- पहचान कैसे करें: अगर आपको सुबह उठते ही सबसे ज्यादा छींकें आती हैं या नाक बंद लगती है, तो समझ जाइए कि समस्या बिस्तर में है।
- बचाव का तरीका: चादरों और तकिये के गिलाफ को हर हफ्ते 60°C से ज्यादा गर्म पानी में धोएं। बेडरूम से कालीन हटाना और एलर्जेन-प्रूफ कवर का इस्तेमाल करना बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।
ठंडी हवा के साथ उड़ती बीमारियां
गर्मियों में सुकून देने वाला एयर कंडीशनर या कूलर भी एलर्जी का बड़ा कारण बन सकता है। अगर इनके फिल्टर समय पर साफ न किए जाएं, तो ये पूरे घर में धूल, फफूंद और एलर्जी वाले कण फेंकने लगते हैं।
- पहचान कैसे करें: एसी या कूलर चालू करते ही अगर आपकी तबीयत बिगड़ने लगे, तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
- बचाव का तरीका: हर 1 से 3 महीने में फिल्टर बदलें या अच्छी तरह साफ करें। अगर संभव हो, तो 'HEPA' ग्रेड वाले फिल्टर का चुनाव करें।
महकते घर के पीछे का जहरीला सच
हम घर को महकाने के लिए रूम फ्रेशनर, सुगंधित मोमबत्तियां या कपड़ों में फैब्रिक सॉफ्टनर का खूब इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सच तो यह है कि ये चीजें हवा में ऐसे रसायन छोड़ती हैं जो हमारी सांस की नली को बुरी तरह परेशान करते हैं।
चूंकि भारतीय घरों में खिड़कियां अक्सर बंद रहती हैं, इसलिए इन रसायनों का असर और गहरा हो जाता है। नया पेंट, नया फर्नीचर और बनावटी फर्श भी कई हफ्तों तक हवा में हानिकारक गैसें छोड़ते हैं। अगर घर के अंदर रहने पर आपको एलर्जी ज्यादा महसूस होती है, तो इन खुशबूदार और केमिकल वाले प्रोडक्ट्स से दूरी बनाएं।
आपकी प्लेट में छिपे दुश्मन
पैकेट वाले खाने में जो रंग, प्रिजर्वेटिव्स और स्वाद बढ़ाने वाले तत्व डाले जाते हैं, वे कई बार 'हिडन एलर्जेंस' का काम करते हैं।
इसके अलावा, कुछ लोगों को कच्चे फल या सब्जियां खाने के बाद बिल्कुल वैसी ही एलर्जी होने लगती है जैसी धूल या पराग से होती है। अगर खाना खाने के बाद आपको दिक्कत होती है, तो एक डायरी बनाएं और लिखें कि आपने क्या खाया था। इससे असली कारण पकड़ने में बहुत मदद मिलेगी।
शहरों की जहरीली हवा का कहर
भारत की लगभग 77% आबादी ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर है जहां प्रदूषण (PM2.5) का स्तर WHO के सुरक्षित पैमानों से कहीं ज़्यादा है। यह प्रदूषण ना सिर्फ फेफड़ों को कमज़ोर करता है, बल्कि सांस की नली की सुरक्षा परत को तोड़कर एलर्जी को और भी भयंकर बना देता है।
जलवायु परिवर्तन की वजह से एलर्जी का मौसम अब लंबा हो गया है, इसलिए सिर्फ गोलियां खाने से काम नहीं चलेगा। रोज़ाना अपने शहर का AQI चेक करें, खराब हवा वाले दिनों में बाहर जाना कम करें और घर के अंदर एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें।
तनाव
परीक्षा की टेंशन, ऑफिस का काम या घर के झगड़े- ये सब सिर्फ आपके दिमाग को नहीं, बल्कि आपकी इम्युनिटी को भी प्रभावित करते हैं। तनाव के समय शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे हार्मोन बढ़ते हैं, जो 'हिस्टामाइन' रिलीज करके एलर्जी को ट्रिगर कर देते हैं।
दवाओं के साथ-साथ भरपूर नींद लेना, एक्सरसाइज करना और खुद को तनाव-मुक्त रखना भी एलर्जी के इलाज का एक बहुत जरूरी हिस्सा है।
एलर्जी से लड़ना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि इसके दुश्मन अक्सर छिपकर वार करते हैं। अगर तमाम सावधानियों के बाद भी आपको राहत नहीं मिल रही है, तो अपनी जीवनशैली, खान-पान और तनाव पर बारीकी से ध्यान दें।
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