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रांची के प्रोफेसर का कमाल! बांग्ला साहित्य को AI से समझने की बनाई तकनीक, ब्रिटेन में तीन डिजाइन पंजीकृत

Published: Thu, 05 Nov 2026 07:00 AM (IST)

रांची यूनिवर्सिटी के डॉ. दीपक प्रमाणिक के एआइ-आधारित बांग्ला साहित्य शोध को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। उनके तीन डिजाइन यूके ...और पढ़ें

एआई जेनरेटेड इमेज।

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HighLights

  1. डॉ. दीपक प्रमाणिक के बांग्ला साहित्य एआई शोध को वैश्विक पहचान।

  2. यूके में तीन डिजाइन पंजीकृत, भारत में पेटेंट आवेदन प्रकाशित।

कुमार गौरव, रांची। रांची यूनिवर्सिटी के रामलखन सिंह यादव कालेज के असिस्टेंट प्रोफेसर (स्टेज 2) एवं बांग्ला विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक प्रमाणिक के शोध एवं नवाचार को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यूके इंटेलैक्चुअल प्रोपर्टी ऑफिस में तीन डिजाइनों का पंजीकरण, भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित इन बांग्ला साहित्य शोध प्रणाली का पेटेंट आवेदन प्रकाशित किया गया है।

इसका विषय झारखंड से विश्व पटल तक

बांग्ला भाषा, साहित्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनूठा संगम, है। बांग्ला साहित्य अब केवल पढ़ा ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से विज्ञानी ढंग से समझा भी जा सकेगा। डॉ. दीपक प्रमाणिक ने इस दिशा में दोहरी सफलता हासिल की है।

ब्रिटेन के इंटेलेक्चुअल प्रापर्टी ऑफिस (यूके आईपीओ) ने उनके तीन शोध-आधारित डिजाइनों को पंजीकृत किया है। वहीं, भारत में उनकी एआई-आधारित बांग्ला साहित्य शोध एवं व्याख्या प्रणाली का पेटेंट आवेदन भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय जर्नल में प्रकाशित हुआ है। मानविकी के किसी शिक्षक द्वारा भाषा-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह उपलब्धि झारखंड के शैक्षणिक जगत के लिए गौरव का विषय है।

विशेष बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में तीन पंजीकृत डिजाइन 21 अक्टूबर 2026 को जबकि भारत में पेटेंट आवेदन का प्रकाशन पेटेंट कार्यालय जर्नल 16 अक्टूबर 2026 को बांग्ला वाणी, ध्वनि, मंत्र, भावना और साहित्य पांचों पर एआई-आधारित शोध प्रकाशित हुआ।

यूके आईपीओ ने ब्रिटेन के पंजीकृत डिजाइन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत डॉ. प्रमाणिक के नाम से तीन डिजाइनों के पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किए हैं।

तीनों की पंजीकरण तिथि 1 अक्टूबर 2026 और अनुदान तिथि 21 अक्टूबर 2026 है। ये डिजाइन ऐसे डेटा-प्रसंस्करण उपकरणों से जुड़े हैं, जो बांग्ला भाषा सुनने-बोलने के दौरान मनुष्य की संज्ञानात्मक और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करने में सहायक होंगे। तीनों डिजाइन अंतरराष्ट्रीय डिजाइन वर्गीकरण के वर्ग 14 (रिकार्डिंग, दूरसंचार या डेटा प्रसंस्करण उपकरण) में दर्ज हैं।

कविता से लोककथा तक, एआई समझेगा बांग्ला साहित्य का मर्म

डॉ. प्रमाणिक का दूसरा नवाचार सीधे साहित्य-शोध से जुड़ा है। उनका आविष्कार एआइ-बेस्ड इंटेलिजेंट बंगाली लिटररी रिसर्च एंड इंटरप्रिटेशन सिस्टम यूजिंग नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग एंड कांटेक्स्ट-अवेयर सिमेंटिक एनालायसिस, प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी) और संदर्भ-सजग अर्थ-विश्लेषण के सहारे बांग्ला साहित्यिक पाठ के अर्थ और भाव को पहचानता है।

साहित्य में एक ही शब्द प्रसंग बदलते ही नया अर्थ ले लेता है। यह प्रणाली इसी संदर्भ को पढ़कर अर्थ तय करती है, बहु-स्तरीय सत्यापन से व्याख्या जांचती है और गलत व्याख्या की संभावना घटाती है। इसे कविता, उपन्यास, कहानी, निबंध, नाटक और लोक साहित्य बांग्ला की सभी प्रमुख विधाओं के लिए रचा गया है। साथ ही, यह बांग्ला भाषा के लिए उपलब्ध सीमित कंप्यूटेशनल संसाधनों की चुनौती का भी समाधान सुझाती है।

तकनीक से जुड़ना समय की मांग

बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा कि बांग्ला भाषा और साहित्य के शोध को आधुनिक तकनीक तथा एआई से जोड़ना आज के समय की आवश्यकता है। कहा कि मेरे इस शोध एवं नवाचार का उद्देश्य बांग्ला भाषा-आधारित अनुसंधान के क्षेत्र में नई तकनीकी संभावनाओं के द्वार खोलना तथा साहित्यिक अध्ययन को वैश्विक डिजिटल शोध के साथ जोड़ना है।

मानविकी में नवाचार की मिसाल

आमतौर पर पेटेंट और डिजाइन पंजीकरण विज्ञान और इंजीनियरिंग से जोड़े जाते हैं। डॉ. प्रमाणिक की उपलब्धि दिखाती है कि भाषा और साहित्य के शिक्षक भी डिजिटल ह्यूमैनिटीज और एआइ के माध्यम से विश्वस्तरीय नवाचार कर सकते हैं। यह पहल शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए भाषा-प्रौद्योगिकी आधारित शोध के नए रास्ते खोलती है।

इस उपलब्धि से रामलखन सिंह यादव कॉलेज कोकर, रांची यूनिवर्सिटी तथा झारखंड के शिक्षाविदों और शोध समुदाय में हर्ष का वातावरण है। बता दें कि डॉ. दीपक प्रमाणिक (एमए, जेईटी, पीएचडी) रामलखन सिंह यादव कॉलेज कोकर में सहायक प्राध्यापक (स्टेज 2) एवं बांग्ला विभागाध्यक्ष हैं।

कॉलेज स्तर पर उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अध्यापन अनुभव है और वे आरयू में शोध-निर्देशन से जुड़े हैं। बांग्ला साहित्य, शोध-पद्धति तथा भाषा और प्रौद्योगिकी का समन्वय उनके प्रमुख शोध-क्षेत्र हैं। 

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