मंगल मुद्दा: बिहार में 'सुधा' की मलाई, पर झारखंड में 'मेधा' को धार देने की क्यों पड़ रही है दरकार
बिहार का 'सुधा' ब्रांड जहां डेयरी सेक्टर में दशकों से स्थापित है, वहीं झारखंड का 'मेधा' अपनी पहचान बनाने के ...और पढ़ें

झारखंड मिल्क फेडरेशन।
HighLights
सुधा का 40 साल पुराना अनुभव, मेधा युवा ब्रांड।
मेधा को संग्रह, वितरण और उत्पाद विविधता बढ़ानी होगी।
आक्रामक मार्केटिंग और सरकारी प्राथमिकता से मिलेगी मदद।
डिजिटल डेस्क, रांची। पड़ोसी राज्यों की तासीर और विकास की रफ्तार में अक्सर दिलचस्प फर्क देखने को मिलता है। बिहार की सुबह जहां 'सुधा' के एक पैकेट के साथ भरोसेमंद शुरुआत करती है, वहीं झारखंड में अपनी पहचान और वजूद की लड़ाई लड़ रहा 'मेधा' ब्रांड आज भी बाजार के बड़े हिस्से पर काबिज होने के लिए संघर्ष कर रहा है।
कभी एक ही प्रशासनिक इकाई का हिस्सा रहे इन दोनों क्षेत्रों में डेयरी सेक्टर की यह कहानी केवल कारोबार की नहीं, बल्कि समय, दूरदर्शिता और बुनियादी ढांचे के फर्क की एक जीवंत दास्तान है।
सीनियर जर्नलिस्ट राकेश परिहार कहते हैं कि मेधा के पास विकास की अपार संभावनाएं हैं, बस जरूरत है रणनीति को और अधिक आक्रामक और पेशेवर बनाने की। आप किसी भी शहर में चले जाइए सुधा के स्टोर और मेधा स्टोर डिजाइन, लोकेशन और प्रोडक्ट डिसप्ले को देखें फर्क दिख जाता है।
प्रीमियम लोकेशन पर कुछ शॉप खुलने चाहिए। समय रहते कलेक्शन से लेकर मार्केटिंग तक की कमियों को दूर कर लिया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब झारखंड की हर सुबह 'मेधा' की मिठास और भरोसे के साथ रोशन होगी।
आखिर क्या वजह है कि सुधा बिहार की धड़कन बन गई, जबकि मेधा को झारखंड में अभी लंबी दौड़ लगानी है? आइए, इस रिपोर्ट में पूरी जमीनी सच्चाई की पड़ताल करते हैं।
सुधा: सफलता का चार दशक पुराना इतिहास
बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1983 में 'ऑपरेशन फ्लड' के तहत अमूल के सहकारिता मॉडल पर की गई थी। इतने लंबे समय तक सक्रिय रहने के कारण आज इसका दायरा बहुत बड़ा हो चुका है।
किसान नेटवर्क: राज्यभर से 14 से 17 लाख से अधिक दूध उत्पादक किसान सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं।
प्रोक्योरमेंट और प्रोसेसिंग: रोजाना दूध की खरीद 25 से 30 लाख लीटर के बीच है, जबकि इसकी कुल प्रोसेसिंग क्षमता 50 लाख लीटर प्रतिदिन से भी अधिक है। राज्यभर में हजारों सहकारी समितियां और 30,000 से अधिक रिटेल डिस्ट्रीब्यूशन पॉइंट्स का मजबूत जाल फैला हुआ है।
बाजार विस्तार: बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली-NCR और उत्तर-पूर्व के राज्यों तक इसकी पहुंच है। इसके साथ ही घी, पेड़ा और गुलाब जामुन जैसे वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स का निर्यात भी किया जाता है।
मेधा: विकास के पथ पर बढ़ता युवा ब्रांड
झारखंड मिल्क फेडरेशन और 'मेधा' ब्रांड की औपचारिक शुरुआत 2014 के बाद हुई, और इसका मुख्य रांची प्लांट 2016 में पूरी तरह ऑपरेशनल हुआ। इसे राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के तकनीकी सहयोग से खड़ा किया गया है।
- किसान नेटवर्क: वर्तमान में मेधा से लगभग 65,000 से 75,000 किसान जुड़े हैं, और इसे लगातार बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।
- प्रोक्योरमेंट: दूध की खरीद रोजाना 2.5 से 3.75 लाख लीटर के आसपास है। होटवार के अलावा कोडरमा, लातेहार और देवघर, साहिबगंज जैसे महत्वपूर्ण जिलों में भी इसके प्रोसेसिंग प्लांट्स काम कर रहे हैं।
- प्रगति और प्रोत्साहन: राज्य सरकार द्वारा दुग्ध उत्पादकों को डीबीटी के जरिए प्रोत्साहन राशि और अतिरिक्त बोनस दिए जाने से किसानों का रुझान इस तरफ बढ़ा है।
क्यों सुधा बिहार में सुपर-हिट और मेधा झारखंड में अपेक्षाकृत पीछे?
1. समय और अनुभव का विशाल फासला: सुधा को बाजार में अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए 40 से अधिक साल का समय मिला है, जबकि मेधा अभी मात्र एक दशक पुराना युवा ब्रांड है। जन-मानस में सुधा का नाम भरोसे का पर्याय बन चुका है।
2. विरासत और भौगोलिक लाभ: वर्ष 2000 में झारखंड अलग होने से पहले ही सुधा के कई प्रमुख डेयरी प्लांट्स रांची, जमशेदपुर और बोकारो जैसे औद्योगिक शहरों में स्थापित हो चुके थे। इस वजह से झारखंड के अलग होने के बाद भी शहरी उपभोक्ताओं के बीच सुधा का दबदबा बरकरार रहा।
3. अर्थव्यवस्था का बुनियादी ढांचा: बिहार में पीढ़ियों से कृषि और पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुख्य रीढ़ रही है। इसके विपरीत, झारखंड की अर्थव्यवस्था लंबे समय से खनन और औद्योगिक गतिविधियों पर केंद्रित रही है, जिससे ग्रामीण इलाकों में संगठित डेयरी सहकारिता का नेटवर्क देरी से विकसित हुआ।
4. प्रतिस्पर्धा का कड़ा माहौल: झारखंड के खुले बाजार में पहले से ही सुधा, अमूल और अन्य राष्ट्रीय ब्रांड्स जमे हुए थे। ऐसे में एक स्थानीय ब्रांड के रूप में मेधा को अपनी पैठ बनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।
बाजार का 'सिकंदर' बनने के लिए मेधा को यहां सुधार की जरूरत?
यदि झारखंड के अपने ब्रांड 'मेधा' को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दिग्गजों को कड़ी टक्कर देनी है, और राज्य के हर कोने तक अपनी धाक जमामी है, तो उसे निम्नलिखित चार प्रमुख क्षेत्रों में रणनीतिक बदलाव करने होंगे।

1. कलेक्शन: दूध संग्रह नेटवर्क का जमीनी विस्तार
सुदूर गांवों तक पहुंच: झारखंड के आदिवासी बहुल और दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में आज भी दूध का बड़ा कारोबार असंगठित बिचौलियों के हाथ में है। मेधा को हर पंचायत स्तर पर चिलिंग प्लांट और ऑटोमैटिक मिल्क कलेक्शन यूनिट्स का नेटवर्क खड़ा करना होगा।
पारदर्शी भुगतान प्रणाली: किसानों को प्रोत्साहन राशि और भुगतान बिना किसी प्रशासनिक लेटलतीफी के सीधे उनके बैंक खातों में मिले, ताकि वे निजी वेंडर्स के पास जाने से बचें।
2. डिस्ट्रीब्यूशन: वितरण प्रणाली और सप्लाई चेन में कसावट
शहरी बूथों का सघन जाल: रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो और हजारीबाग जैसे बड़े शहरों के हर वार्ड, मोहल्ले और हाउसिंग सोसायटी में 'मेधा एक्सक्लूसिव पार्लर' या वेंडिंग कार्ट्स की संख्या बढ़ानी होगी।
समयबद्ध आपूर्ति: सुबह की सप्लाई में देरी होने पर शहरी ग्राहक तुरंत दूसरे ब्रांड्स की ओर रुख कर लेते हैं। इसलिए लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को पूरी तरह बुलेटप्रूफ बनाना जरूरी है।
3. प्रोडक्ट पोर्टफोलियो: मूल्य संवर्धन पर जोर
विविधता का विस्तार: केवल सादा दूध और दही बेचने से आज के प्रतिस्पर्धी बाजार में नेतृत्व हासिल नहीं किया जा सकता। मेधा को अपने पोर्टफोलियो में फ्लेवर्ड मिल्क, प्रीमियम पनीर, मक्खन, खोवा, और पारंपरिक व्यंजनों पर आधारित मिठाइयों के साथ-साथ आइसक्रीम जैसी वेराइटी को तेजी से उतारना होगा।
आकर्षक पैकेजिंग: पैकेजिंग का लुक और उसकी शेल्फ-लाइफ ऐसी होनी चाहिए जो ग्राहकों को पहली नजर में ही प्रीमियम अहसास कराए।
4. मार्केटिंग और ब्रांडिंग: आक्रामक प्रचार और सरकारी प्राथमिकता
लोकल इमोशनल कनेक्ट: विज्ञापनों और मार्केटिंग कैंपेन में झारखंड की माटी, स्थानीय संस्कृति, पर्व-त्योहारों और यहाँ के मेहनतकश किसानों की कहानियों को प्रमुखता से जोड़ा जाए।
सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता: झारखंड सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को मिलने वाले दूध एवं पोषण आहार में केवल मेधा के उत्पादों का ही अनिवार्य रूप से उपयोग हो, जिससे खपत में भारी उछाल आएगा।
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