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तय समय सीमा और निर्धारित प्रारूप में ही जाति प्रमाण पत्र का लाभ, झारखंड हाई कोर्ट में JPSC-JSSC के ​खिलाफ 22 याचिकाएं खारिज

Published: Thu, 07 May 2026 06:17 PM (IST)Updated: Fri, 08 May 2026 08:11 AM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में जाति प्रमाण पत्र के निर्धारित प्रारूप और समय सीमा से संबंधित ...और पढ़ें

झारखंड हाई कोर्ट ने जाति प्रमाण पत्र नियमों पर आयोग के फैसले को सही ठहराया।

झारखंड हाई कोर्ट ने जाति प्रमाण पत्र नियमों पर आयोग के फैसले को सही ठहराया।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने जाति प्रमाण पत्र अपीलों को खारिज किया।

  2. जेपीएससी, जेएसएससी के आरक्षण नियमों को सही माना।

  3. निर्धारित प्रारूप, समय सीमा का पालन अनिवार्य।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने जेपीएससी और जेएसएससी में निर्धारित प्रारूप और अंतिम तिथि तक जाति प्रमाण पत्र जमा नहीं करने के मामले में गुरुवार को महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते समय अगर कोई उम्मीदवार आनलाइन फार्म में निर्धारित प्रारूप में जाति प्रमाण पत्र का विवरण दर्ज नहीं करता है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाएगा। अदालत ने कहा कि विज्ञापन में बताई गई शर्तों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है और इसमें किसी तरह की ढील नहीं दी जा सकती।

झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की ओर अलग-अलग पदों (दंत चिकित्सक, पुलिस सब-इंस्पेक्टर, रेडियो आपरेटर, शिक्षक आदि) के लिए निकाले गए विज्ञापनों में यह शर्त रखी गई थी कि आरक्षित वर्ग (एससी-एसटी-ओबीसी) के उम्मीदवारों को आनलाइन आवेदन में निर्धारित प्रारूप का जाति प्रमाण पत्र संख्या और जारी तिथि दर्ज करना अनिवार्य होगा।

ऐसा न करने पर उनकी उम्मीदवारी सामान्य वर्ग में रखी जाएगी। कई उम्मीदवारों ने आनलाइन आवेदन में गलत जानकारी दर्ज की थी। कुछ ने केंद्र सरकार के प्रारूप का प्रमाण पत्र डाला था, तो किसी ने सर्किल आफिसर द्वारा जारी प्रमाण पत्र का ब्योरा भरा था।

बाद में दस्तावेज सत्यापन के समय उन्होंने सही प्रारूप के प्रमाण पत्र पेश किए, लेकिन तब तक आवेदन की अंतिम तिथि निकल चुकी थी। आयोग ने ऐसे सभी उम्मीदवारों को सामान्य वर्ग में मानते हुए अयोग्य ठहरा दिया।

इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। एकल पीठ ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके बाद इन्होंने अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में क्या कहा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किया है।

अदालत ने कहा कि विज्ञापन में दी गई शर्तें संवैधानिक हैं और इनका पालन करना जरूरी है। केवल यह दावा करना पर्याप्त नहीं कि उम्मीदवार आरक्षित वर्ग का है। आवेदन की अंतिम तिथि तक उम्मीदवार के पास निर्धारित प्रारूप का वैध जाति प्रमाण पत्र होना चाहिए और उसका विवरण फार्म में दर्ज होना चाहिए।

बाद में (दस्तावेज सत्यापन) प्रमाण पत्र पेश करने से कोई लाभ नहीं मिलेगा। अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के राम कुमार गिजरोया मामले का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा कि उस मामले के तथ्य अलग थे (वहां विज्ञापन में कोई अंतिम तिथि निर्धारित नहीं थी), जबकि इन मामलों में स्पष्ट अंतिम तिथि और प्रारूप दिया गया था।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यहां लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि आवेदकों का कर्तव्य है कि वे विज्ञापन को ध्यान से पढ़ें। अगर कोई संदेह है तो पहले स्पष्टीकरण लेना चाहिए। लापरवाही या गलती से भरे गए फार्म को बाद में सही नहीं किया जा सकता।

केवल इसलिए कि आयोग ने उन्हें परीक्षा में बैठने दिया, इसका यह मतलब नहीं कि उनकी जाति का दावा सही मान लिया गया। यह एक औपचारिक अनुमति थी। अंतिम चयन तभी होता है जब सारे दस्तावेज सही पाए जाएं।

कुछ अपीलकर्ताओं ने कहा कि उनसे मिलते-जुलते अन्य लोगों को नौकरी मिल गई है। कोर्ट ने कहा कि अगर कहीं गलती से किसी को लाभ मिला है, तो उसे उद्धृत करके दूसरों को भी वैसा ही लाभ दिलाने की मांग नहीं कर सकते। अदालत किसी गलती को दोहराने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

प्रार्थी डाॅ. नूतन इंदवार की ओर से कहा गया था कि एसटी वर्ग की 44 में से सिर्फ आठ सीटें भरी गई हैं, इसलिए उन्हें सम्मानजनक विचार करते हुए नियुक्ति दी जाए। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ रिक्तियां रह जाने से नियमों या विज्ञापन की शर्तों में ढील नहीं दी जा सकती।

आयोग का निर्णय सही

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि अपीलकर्ताओं ने ऑनलाइन आवेदन में न तो आवश्यक प्रारूप का जाति प्रमाण पत्र डाला और न ही उसका सही ब्योरा भरा, इसलिए उन्हें सामान्य वर्ग में रखना और अयोग्य ठहराना सही था।

एकल पीठ के 20 दिसंबर 2019 के फैसले में कोई कमी नहीं है। पीठ ने कहा कि यदि अदालतें अंतिम तिथि बदलती रहेंगी या शर्तों में ढील देती रहेंगी, तो भर्ती प्रक्रिया का कभी अंत नहीं होगा।

यह कानून की दृष्टि से अनुचित होगा और अन्य उम्मीदवारों के साथ भेदभाव होगा जिन्होंने समय पर सही दस्तावेज जमा किए थे। इस फैसले के बाद सभी 22 याचिकाओं को अदालत ने खारिज कर दिया। 

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