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झारखंड में सरकारी कर्मचारियों को हाई कोर्ट से राहत, विभागीय परीक्षा देर से पास करने पर भी मिलेगा MPC-MACP लाभ

Published: Sat, 07 Nov 2026 10:25 PM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को एसीपी और एमएसीपी का लाभ देने के एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा है।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर

HighLights

  1. सरकारी कर्मचारी को एसीपी-एमएसीपी लाभ मिलेगा।

  2. विभागीय परीक्षा देरी से पास करना बाधा नहीं।

  3. सेवा ठहराव की भरपाई वित्तीय उन्नयन से।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की अदालत ने सरकारी कर्मचारी को एसीपी और एमएसीपी का लाभ देने के मामले में एकल पीठ के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वित्तीय उन्नयन (एसीपी-एमएसीपी) का उद्देश्य लंबे समय तक एक ही पद पर काम करने के कारण होने वाली सेवा संबंधी ठहराव की भरपाई करना है। इसलिए विभागीय परीक्षा देर से पास करने के आधार पर कर्मचारी की लगभग 19 साल की सेवा को लाभ की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता।

अदालत ने एकल पीठ के नौ अप्रैल 2025 के आदेश को बरकरार रखा। एकल पीठ ने कर्मचारी रवींद्र प्रसाद को उनकी सेवा अवधि के अनुसार प्रथम और द्वितीय एसीपी तथा तृतीय एमएसीपी का लाभ देने का निर्देश दिया था। इसके लिए सेवा की गणना 15 अप्रैल 1980 से करने को कहा गया था, न कि 23 अगस्त 2009 से, जब उन्होंने विभागीय परीक्षा पास की थी।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि कर्मचारी ने नियुक्ति के बाद निर्धारित समय में विभागीय परीक्षा पास नहीं की थी। सरकार ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट का अमरेश कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य का फैसला इस मामले में लागू नहीं होता।

हालांकि, खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि एसीपी और एमएसीपी वास्तविक पदोन्नति नहीं, बल्कि वित्तीय उन्नयन की योजनाएं हैं। इनका लाभ देने के लिए पदोन्नति वाले पद की योग्यता पर जोर देना योजनाओं के उद्देश्य को विफल करेगा।

खंडपीठ ने यह भी पाया कि रवींद्र प्रसाद की सेवा 1982 में समाप्त नहीं की गई थी और वह 15 अप्रैल 1980 से लगातार काम करते रहे। उन्होंने 23 अगस्त 2009 को विभागीय परीक्षा भी पास कर ली थी।

ऐसे में उनकी सेवा के शुरुआती 19 वर्षों को लाभ की गणना से अलग करने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप एकल पीठ का आदेश न्यायसंगत और उचित है। इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।

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