विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

कभी दूसरे राज्यों पर निर्भर था झारखंड, अब दूध से मछली तक अपना उत्पादन बढ़ाकर बन रहा आत्मनिर्भर

Published: Fri, 06 Nov 2026 04:59 PM (IST)

झारखंड कृषि और संबद्ध उत्पादों में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ खाद्यान्न उत्पादन दोगुना हो गया ...और पढ़ें

एआई जेनरेटेड इमेज।

एआई जेनरेटेड इमेज।

HighLights

  1. खाद्यान्न उत्पादन 3.5 मिलियन टन से बढ़कर 7.4 मिलियन टन हुआ।

  2. मछली उत्पादन में 95% से अधिक आत्मनिर्भरता हासिल की गई।

मनोज सिंह, रांची। झारखंड सरकार को अब अपने लोगों का पेट भरने के लिए केंद्र अथवा दूसरे राज्यों पर अब उतना निर्भर रहने की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो रही है। झारखंड में खाद्यान्न से लेकर दलहन, तिलहन, दूध, अंडा आदि के उत्पादन में धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता हासिल हो रही है।

मछली समेत कई उत्पाद ऐसे हैं जहां झारखंड की स्थिति पड़ोसी राज्यों से धीरे-धीरे सुधर रही है। इसके लिए किसानों से लेकर राज्य सरकार के अधिकारियों तक ने लगातार मेहनत किया है और उनके प्रयासों से यह सफलता हासिल हो सकती है।

इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फसल उत्पादन 3.5 मिलियन टन से बढ़कर कुल लगभग 7.4 मिलियन टन पहुंच गया है। धान का रकबा जो 2000 में लगभग 10 लाख हेक्टेयर था, वह बढ़कर 18 लाख हेक्टेयर हो गया है, और औसत धान की उपज प्रति हेक्टेयर ए टन से बढ़कर तीन टन हो गई है। दलहन की खेती भी एक लाख हेक्टेयर से बढ़कर आठ लाख हेक्टेयर हो गई है।

इसके पीछे सिर्फ सरकार की दूर दृष्टि और किसानों की मेहनत ही नहीं बल्कि समृद्धि के लिए लगातार होते रहे समेकित प्रयास भी कारक हैं। आधुनिक तकनीक और बीज वितरण में किसानों को 50 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक के अनुदान पर प्रमाणित बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं, और बीज वितरण प्रणाली को ब्लाक चेन से जोड़ा गया है।

ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, और सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई पंपों को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि खेती की लागत कम हो सके। धान कटाई के बाद खाली रहने वाली प्रति भूमि पर रबी और अन्य फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन में बदलाव

संयुक्त बिहार के समय सुधा ब्रांड का प्रचलन था, लेकिन झारखंड के पास अपना कोई डेयरी ब्रांड नहीं था। अब झारखंड का अपना डेयरी ब्रांड मेधा एक घरेलू नाम बन चुका है, जिसके राज्य भर में कई डेयरी प्लांट कार्यरत हैं। रोजाना करीब 2.50 लाख लीटर दूध का संग्रहण किया जाता है। लेकिन जब मेधा नाम से ब्रांड शुरू की गई थी तो उस समय 11 हजार लीटर प्रतिदिन ही दूध का संग्रहण हो पाता है।

इसको बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से पांच रुपये प्रति लीटर प्रोत्साहन राशि दी जाती है। जिसके चलते राज्य के करीब 66 हजार किसान झारखंड मिल्क फेडरेशन यानी मेधा से जुड़े हैं। एक समय में मछली के लिए आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर निर्भर रहने वाला झारखंड आज अपनी जरूरत का 95 प्रतिशत से अधिक (लगभग 3.63 लाख मीट्रिक टन) मछली उत्पादन कर रहा है।

झारखंड में मछली पालन से करीब दो लाख किसान जुड़े हैं, जो आर्थिक रूप से मजबूत बन रहे हैं। मत्स्य क्षेत्र में वैज्ञानिक मत्स्य पालन, केज कल्चर, बायोफ्लाक एवं रास जैसी आधुनिक तकनीकों का विस्तार किया जा रहा है। इसके साथ ही आधुनिक हैचरी, फिश फीड मिल, कोल्ड चेन, प्रोसेसिंग यूनिट एवं आधुनिक मत्स्य बाजारों के विकास की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मत्स्य पालकों की आय में भी वृद्धि सुनिश्चित हो रही है।

मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत व्यावसायिक बकरी पालन एवं सूकर पालन को ग्रामीण उद्यमिता के माडल के रूप में विकसित किया जा रहा है। बकरी पालन योजना में 100 बकरी एवं पांच बकरा वाली इकाई के लिए लगभग 9.78 लाख की परियोजना लागत पर 6.82 लाख (70 प्रतिशत) अनुदान का प्रविधान है।

वहीं, व्यावसायिक सूकर पालन योजना में 25 सूकरी एवं दो नर सूकर वाली इकाई के लिए 14.54 लाख की लागत पर लगभग 10.18 लाख (70 प्रतिशत) सरकारी अनुदान उपलब्ध कराया जाएगा। इन योजनाओं से ग्रामीण युवाओं, स्वयं सहायता समूहों, एफपीओ एवं प्रगतिशील पशुपालकों को स्वरोजगार के अवसर मिलेंगे।

भविष्य में पशुपालन क्लस्टरों, उन्नत नस्लों, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, कोल्ड स्टोरेज, मांस प्रसंस्करण एवं संगठित विपणन नेटवर्क के विस्तार से इस क्षेत्र में निवेश, रोजगार और आय सृजन की व्यापक संभावनाएं हैं।

अंडा उत्पादन पर विभाग का जोर

महिला सशक्तिकरण एवं पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में झील योजना एक नई पहल की जानी है। इस योजना के तहत 10 जिलों की 5,000 ग्रामीण महिलाओं को लेयर पोल्ट्री ईकाइयों से जोड़ा जाएगा। 470.93 करोड़ की इस परियोजना से प्रतिवर्ष 100 से 124 करोड़ अंडों के उत्पादन का लक्ष्य है, जिससे राज्य की अंडा उत्पादन क्षमता में 40 प्रतिशत से अधिक वृद्धि होगी।

प्रत्येक महिला लाभुक को 8,900 से 9,000 प्रतिमाह तथा लगभग एक से 1.25 लाख वार्षिक शुद्ध आय प्राप्त होने का अनुमान है। इससे कुपोषण में कमी के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 550 करोड़ से अधिक का नकदी प्रवाह सुनिश्चित होने की संभावना है।

महिला किसान खुशहाली योजना के माध्यम से महिला किसानों को खेती के साथ बागवानी, पशुपालन, मत्स्यपालन, मुर्गीपालन, मशरूम उत्पादन एवं वर्मी कम्पोस्ट जैसी गतिविधियों को एकीकृत कृषि प्रणाली के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य महिला किसानों को वर्षभर आय के विविध स्रोत उपलब्ध कराकर उन्हें सफल कृषि उद्यमी के रूप में विकसित करना है।

वनोपज आधारित आजीविका को सुदृढ़ बनाने के लिए झाम्कोफेड एवं सिद्धकोफेड की ओर से महुआ, साल बीज, करंज बीज, चिरौंजी एवं लाह जैसे वनोपजों के संग्रहकर्ताओं को प्रशिक्षण, टूल किट और बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।

साथ ही वनोपज प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन की दिशा में पहलें की जा रही हैं, जिससे संग्रहकर्ताओं को बेहतर मूल्य प्राप्त होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। झास्कोलैंप की ओर से लाह की खेती को बढ़ावा देने और लाह उत्पादक किसानों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लाह पोषक वृक्ष समृद्धि योजना शुरू की गई है।

इस योजना के तहत 25 डिसमिल भूमि के लिए लाह किसानों को निःशुल्क लाह पोषक पौधों का वितरण किया जाएगा। प्रत्येक लाभार्थी किसान को सेमियालता के 400 पौधे, कुसुम के पांच पौधे, बेर के पांच पौधे, कैलियान्ड्रा कैलोथायरस के 20 पौधे प्रदान किए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य लाह उत्पादन को बढ़ावा देना, किसानों की आय में वृद्धि करना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के नए और सशक्त अवसर उपलब्ध कराना है।

कृषि को मजबूत बनाने के उद्देश्य से कस्टम हायरिंग सेंटर, ट्रैक्टर वितरण एवं आधुनिक कृषि यंत्रीकरण कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही राज्य के 4,454 लैम्पस/पैक्स नेटवर्क के माध्यम से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में चरणबद्ध रूप से को-ऑपरेटिव मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स-सह-सोलर पैनल आधारित कोल्ड रूम स्थापित करने की योजना है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए इस पहल हेतु 162.21 करोड़ का प्रविधान प्रस्तावित है, जिससे किसानों को नाशवान कृषि उत्पादों के भंडारण, विपणन एवं मूल्य संरक्षण की बेहतर सुविधा प्राप्त होगी।

इसी प्रकार, झारखंड राज्य मिलेट मिशन के अंतर्गत वर्ष 2024-25 से राज्य के सभी जिलों में मोटे अनाजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसानों को 3,000 प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। वर्ष 2024-25 में 18,900 किसानों को 6.37 करोड़ तथा वर्ष 2025-26 में लगभग 24,070 किसानों को 11.47 करोड़ की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई है।

मिलेट उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं पोषण आधारित उपभोग को बढ़ावा देकर झारखंड को जलवायु-अनुकूल एवं पोषण-सुरक्षित कृषि माडल के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

सरकार का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना, ग्रामीण युवाओं एवं महिलाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा करना। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देकर झारखंड को कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन और वनोपज आधारित समृद्ध एवं आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं।

-शिल्पी नेहा तिर्की, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री, झारखंड।

भौगोलिक क्षेत्र: 79.70 लाख हेक्टेयर

कृषि योग्य क्षेत्रफल: 38 लाख हेक्टेयर

कुल खेती का क्षेत्रफल: 25 - 26 लाख हेक्टेयर

प्रमुख फसलें: धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तिलहन, सब्जी

लघु फसलें: मक्का, अरहर, उड़द, मूंग, गेहूं, चना, सरसों 

यह भी पढ़ें- बिहार के ओल का यूपी, बंगाल, झारखंड और आंध्र प्रदेश तक जलवा, दीपावली पर खुश हैं समस्तीपुर के किसान 

यह भी पढ़ें- मंदार की थाप पर होता है झारखंड का 'सोहराई डांस', फसलों की कटाई जुड़ा है इस आदिवासी लोक नृत्य का नाता

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।