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CM हेमंत सोरेन ने मां के निधन के बाद क्यों रखा गांव की सीमा पर भोजन? जानिए संथाल समाज की परंपरा के बारे में

Published: Fri, 09 Oct 2026 05:50 PM (IST)

हेमंत सोरेन ने अपनी माता रूपी सोरेन के अग्नि संस्कार के बाद संथाली समाज के धार्मिक और सामाजिक विधि-विधान का ...और पढ़ें

मां रूपी सोरेन के अग्नि संस्कार के बाद संथाली विधि-विधान का पालन करते सीएम हेमंत सोरेन। जागरण

मां रूपी सोरेन के अग्नि संस्कार के बाद संथाली विधि-विधान का पालन करते सीएम हेमंत सोरेन। जागरण

HighLights

  1. माता रूपी सोरेन के अग्नि संस्कार के बाद संथाली विधि-विधान का पालन।

  2. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गांव की सीमा पर भोजन अर्पित किया।

  3. संथाल समाज में श्राद्ध की तिथि से लेकर भोज तक निभाई जाती हैं खास परंपराएं।

अश्विनी रघुवंशी, रांची। माता रूपी सोरेन के अग्नि संस्कार के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संथाली समाज के धार्मिक और सामाजिक विधि विधान का पूर्णरूपेण पालन शुरू किया है।

परंपरा के मुताबिक, अग्नि संस्कार के दूसरे दिन घर में भोजन पकाया गया। अद्धांगिनी कल्पना सोरेन ने उन्हें पत्तल पर खाना दिया। अपने पुत्र, रिश्तेदारों के साथ हेमंत सोरेन भोजन लेकर नेमरा गांव की सीमा पर गए। माटी पर पत्तल रख प्रणाम किया। माता का आह्वान किया कि वे उसे ग्रहण करे। सिर्फ माता ही क्यों, तकरीबन साल भर पहले पिता दिशोम गुरू शिबू सोरेन के स्वर्गवास के बाद भी हेमंत सोरेन और उनके परिवार के सारे लोगों ने विधि विधान के पालन में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

rupi soren last rites

झामुमो की केंद्रीय उपाध्यक्ष रही रूपी सोरेन को रामगढ़ जिला के नेमरा गांव में गुरुवार को हेमंत सोरेन ने मुखाग्नि दी। इसके बाद उन्होंने नियमानुसार सूती वस्त्र धारण किया। उनकी पत्नी गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी रीति रिवाजों
के अनुपालन में लगी रही।

किसी के निधन पर ऐसी है संथाल समाज की परंपरा

दुर्गा चरण मुर्मू धाढ़ दिशोम के माझी परगना महाल के देश पराणिक हैं। पिछले तीन सालों से लुगूबुरू घंटाबाड़ी और पारसनाथ में धर्मगुरू के नाते धार्मिक प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने बताया, अग्नि संस्कार या दफन करने के बाद मान्यता है कि उस दौरान पुण्यात्मा घर से बाहर रहती है। इसलिए जहां से गांव की सीमा शुरू होती है, सूती वस्त्र पहन कर वहां तीन दिन तक भोजन और पानी ले जाया जाता है।

लकड़ी के चूल्हा पर मिट्टी के बर्तन में बिना मसाला के भोजन बनता है। दाल और भात। इसके बाद हंड़िया बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है जिसमें पांच दिन लगते हैं। उसे भी पूर्वजों के नाम पर चढ़़ाया जाता है। उन्होंने बताया कि तीन दिन तक पुण्यात्मा को भोजन कराने के बाद गांव वाले मिल कर श्राद्ध की तिथि तय करते हैं।

संथाल समाज में आम तौर पर श्राद्ध के लिए कोई निश्चित अवधि निर्धारित नहीं है।लोग अपने सामर्थ्य को देख 13 दिन से लेकर एक माह के भीतर श्राद्ध कार्यक्रम करते हैं। श्राद्ध का कार्यक्रम तीन दिन चलता है। श्राद्ध तक शादी विवाह या बच्चे का नामकरण नहीं कर सकते। किसी पूजा पद्धति में शामिल नहीं हो सकते।

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धर्म गुरू दुर्गा चरण मुर्मू ने बताया, श्राद्ध के पहले दिन लाल मुर्गा की पूजा की जाती है। दूसरे दिन मैथन डैम के पास दामोदर नदी, रजरप्पा में भैरो नदी और श्यामसुंदरपुर में सुवर्णरेखा नदी के ठाकुरबाड़ी घाट पर अस्थि विसर्जन किया जाता रहा है। अस्थि के साथ उन चीजों को भी विसर्जित किया जाता है जिससे मृतक को लगाव रहा है।

कोई बांसुरीवादक रहा है तो बांसुरी भी प्रवाहित की जाती है। उससे पहले अस्थि को कलश में लेकर मिट्टी के नीचे रखा जाता है। हल्दी लगा कर। नदी के किनारे मुंडन होता है। घर पर भी बच्चे और रिश्तेदार मुंडन कराते हैं। उसी रात मृतक के पुरूष होने पर पाठा और महिला होने पर पाठी की बलि दी जाती है।

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अगर मृतक शाकाहारी हैं तो भी यह बदल नहीं सकता। मृतक और पूर्वज को देवता मान कर घर में उनका पूजा स्थल निर्धारित होता है। इसके बाद मृतक के स्वजन शुद्ध हो जाते हैं। अगले दिन श्राद्ध भोज किया जाता है। उन्होंने बताया कि श्राद्ध भोज की तिथि तय होने के बाद रिश्तेदारों को माझी बाबा और उनके दूत आमंत्रण देने जाते हैं। मेहमानों की देखभाल की जवाबदेही भी गांव वालों की होती है। समय के साथ थोड़ा बदलाव हो रहा है। मगर मूल चीज नहीं बदल सकती। 

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