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झारखंड का सोहराई पर्व: पशुओं के बर्तन में खाना खाते हैं मालिक, पढ़ें आदिवासी महापर्व की अनूठी परंपराएं

Published: Sun, 08 Nov 2026 08:09 AM (GMT+05:30)

Sohrai 2026: झारखंड में 9 नवंबर को आदिवासी समाज का पारंपरिक सोहराई पर्व मनाया जाएगा। यह पर्व पशुधन के प्रति आभार, प्रकृति से सामंजस्य और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

HighLights

  1. पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने का पारंपरिक पर्व।

  2. गोहाल घर की विशेष पूजा और पशुओं का श्रृंगार।

  3. पारंपरिक पकवान और सामुदायिक एकजुटता का संदेश देता।

जागरण संवाददाता, रांची। दीपावली के उल्लास के बीच आदिवासी समाज में पारंपरिक सोहराई पर्व की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस वर्ष 9 नवंबर को यह पर्व मनाया जाएगा।

सोहराई आदिवासी समाज की ऐसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें पशुधन को परिवार और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए उनकी पूजा की जाती है।

यह पर्व मनुष्य, प्रकृति और पशुओं के बीच सदियों से चले आ रहे आत्मीय संबंधों को दर्शाता है। पारंपरिक जानकार जगलाल पाहन ने कहा कि सोहराई शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है।

पर्व की शुरुआत सुबह पशुओं को नहलाने और उनकी साफ-सफाई से होती है। इस दिन खेती में इस्तेमाल होने वाले हल, फावड़े और अन्य कृषि उपकरणों की भी सफाई कर पूजा की जाती है।

इसके बाद गोहाल घर यानी पशुओं के रहने के स्थान की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। पूजा के दौरान महुआ की डाली से खूंटा तैयार कर गोहाल घर के कोने में स्थापित किया जाता है।

पशुओं को बांधने वाली जगह पर अक्षत और टीका लगाया जाता है। चावल के घोल से पारंपरिक अल्पनाएं बनाई जाती हैं। गाय-बैलों के सींगों पर तेल लगाया जाता है तथा उन्हें फूलों से सजाया जाता है। उनके शरीर पर चावल के घोल से आकर्षक पारंपरिक आकृतियां भी बनाई जाती हैं।

पशुओं को खिलाया जाता है पारंपरिक पकवान

सोहराई की एक विशेष परंपरा शाम के समय देखने को मिलती है। इस दौरान पटाखे और अन्य आवाजें निकालकर पशुओं को दौड़ाया जाता है। जगलाल पाहन बताते हैं कि इसके पीछे मान्यता है कि घरेलू पशु अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति और संकट के समय भागने की क्षमता न भूलें।

इसके बाद पशुओं को गोहाल में बांधने से पहले उड़द, घघरा और प्रसाद स्वरूप पारंपरिक हड़िया दिया जाता है। खास बात यह है कि पशुओं के बर्तनों से उनके मालिक भी भोजन ग्रहण करते हैं।

पूजा में चढ़ाए गए मुर्गे से पारंपरिक व्यंजन 'सूढ़ी' तैयार किया जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में लोगों के बीच बांटा जाता है। इस अवसर पर पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्ति को भी सम्मानस्वरूप मानदेय देने की परंपरा है।

आजीविका और प्रकृति से जुड़ा है पर्व

जगलाल पाहन ने कहा कि पुराने समय में आदिवासी परिवारों की आजीविका काफी हद तक पशुधन पर निर्भर थी। गाय, बैल और बकरियां खेती, दूध तथा आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का प्रमुख आधार थीं।

विपरीत परिस्थितियों में पशुओं को बेचकर परिवार अपनी आवश्यकताएं पूरी करते थे। इसलिए सोहराई केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पशुओं के प्रति सम्मान, उनके योगदान के प्रति आभार और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का संदेश भी देता है।

बदलते समय में भी यह पर्व आदिवासी समाज की पहचान, सामुदायिक एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।

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