पाकुड़ नगर परिषद में टेंडर मैनेज का खेल, सरकारी राजस्व को करोड़ों की चपत
पाकुड़ नगर परिषद में विकास योजनाओं की निविदा प्रक्रिया में टेंडर मैनेज के गंभीर आरोप लगे हैं, जिससे सरकारी राजस्व ...और पढ़ें

पाकुड़ नगर परिषद में टेंडर का खेल। फोटो एआई जनरेटेड
HighLights
पाकुड़ नगर परिषद में निविदा प्रक्रिया पर सवाल, टेंडर मैनेज के आरोप।
ठेकेदारों की मिलीभगत से प्रतिस्पर्धा प्रभावित, सरकारी राजस्व को नुकसान।
अध्यक्ष ने टेंडर मैनेज आरोपों की जांच का आश्वासन दिया।
संवाद सहयोगी, पाकुड़। नगर परिषद कार्यालय में निविदा प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ योजनाओं में निविदा निष्पादन से पहले ही टेंडर मैनेज कर लिया जाता है, जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है।
जानकारी के अनुसार नगर परिषद क्षेत्र के विभिन्न वार्डों में पीसीसी सड़क, पुलिया एवं नाली निर्माण से संबंधित कई योजनाओं के लिए लाखों रुपये की लागत वाली निविदाएं निकाली गई थीं। पांच लाख रुपये से कम लागत वाली योजनाओं के ऑफलाइन निविदा निष्पादन की तिथि मंगलवार निर्धारित थी।
आरोप है कि निविदा खोलने से पहले ही कुछ योजनाओं को लेकर ठेकेदारों के बीच आपसी सहमति बना ली गई थी। सूत्रों का दावा है कि निविदा प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए राशि का लेन-देन भी हुआ है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
बताया जाता है कि नगर परिषद में 50 से अधिक पंजीकृत ठेकेदार हैं, लेकिन अधिकांश निविदाओं में केवल दो से तीन ठेकेदारों की ही सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है। इससे निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारों का मानना है कि अधिक प्रतिस्पर्धा होने पर कार्य कम लागत में संभव हो सकता है, जिससे सरकारी राजस्व की बचत होती है। सूत्रों की माने तो टेंडर मैनेज की राशि प्रति ठेकेदारों के बीच 26,000 रुपये की दर से बंटवारा हुआ है। जिसमें एक हिस्सा कार्यालय खर्च के नाम पर रखा गया है। यह मामला नया नहीं है, इसे पूर्व भी इस तरह के मामले सामने आए है।
ऐसे काम करता है कथित टेंडर मैनेजमेंट का खेल
स्थानीय सूत्रों के अनुसार किसी योजना की निविदा में कई ठेकेदार आवेदन करते हैं, लेकिन आपसी समझौते के बाद कुछ ही ठेकेदार अंतिम रूप से प्रतिस्पर्धा में बने रहते हैं। आरोप है कि निविदा राशि के एक निश्चित प्रतिशत पर आपसी सहमति बनाकर प्रतिस्पर्धा को सीमित कर दिया जाता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने निविदा प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए विभिन्न प्राविधान निर्धारित किए हैं। पूर्व में ठेकेदार कम दर (विलो रेट) पर भी निविदा प्रस्तुत करते थे, जिससे सरकारी धन की बचत होती थी। अब कथित तौर पर प्रतिस्पर्धा कम होने से राजस्व हित प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
क्या कहते हैं अधिकारी?
नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी अमरेंद्र कुमार चौधरी ने कहा कि उन्हें निविदा प्रक्रिया में किसी प्रकार के टेंडर मैनेजमेंट की जानकारी नहीं है। सभी निविदाओं का निष्पादन निर्धारित नियमों के तहत किया जाएगा।
वहीं नगर परिषद अध्यक्ष शबरी पाल ने कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित निविदा को रद्द करने सहित आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
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