एक पत्थर पर मां काली की भव्य प्रतिमा, झारखंड का ये मंदिर तंत्र साधना के लिए फेमस; दीपावली में विशेष पूजा
पाकुड़ का ऐतिहासिक मां नित्यकाली मंदिर 1737 से आस्था का केंद्र है, जहां एक ही विशाल शिलाखंड से बनी मां काली की भव्य प्रतिमा स्थापित है।

मां नित्यकाली मंदिर। फोटो जागरण
HighLights
1737 से स्थापित, पाकुड़ का ऐतिहासिक मां नित्यकाली मंदिर।
एक ही विशाल शिलाखंड से निर्मित मां काली की भव्य प्रतिमा।
तंत्र साधना, बामाखेपा, तारापीठ से जुड़ाव, 32 भैरव मौजूद।
संवाद सहयोगी, पाकुड़। सदियों पुरानी तंत्र साधना की परंपरा, एक ही विशाल शिलाखंड में उकेरी गई मां काली की भव्य प्रतिमा और 32 भैरवों की उपस्थिति। पाकुड़ का ऐतिहासिक मां नित्यकाली मंदिर धार्मिक आस्था के साथ इतिहास और लोकमान्यताओं की भी अनूठी विरासत समेटे हुए है।
मान्यता है कि तारापीठ के महान साधक बामदेव, जिन्हें श्रद्धालु बामाखेपा के नाम से जानते हैं, मां नित्यकाली के दरबार में आए थे। बुजुर्गों के बीच प्रचलित कथाओं के अनुसार, उन्होंने यहां मां की प्रतिमा से लिपटकर आराधना की थी। बामाखेपा से जुड़ी ये लोककथाएं मंदिर को तारापीठ की साधना परंपरा से जोड़ती हैं।
स्वप्नादेश के बाद बनारस से आए मूर्तिकार, एक पत्थर में गढ़ी गई प्रतिमा
मंदिर की स्थापना को लेकर प्रचलित मान्यता के अनुसार, बंगाल संवत 1222 यानी 1737 ईस्वी में तंत्र साधना के उपासक राजा पृथ्वी चंद्र शाही को स्वप्न में मां ने निर्धारित स्थान पर खुदाई कराने का आदेश दिया था।
मान्यता है कि वहां मिलने वाले विशाल शिलाखंड से मां की प्रतिमा बनवाई जानी थी। इसके लिए बनारस के एक मूर्तिकार को भी स्वप्नादेश हुआ और वह पाकुड़ पहुंचा। राजा ने खुदाई कराई तो वहां विशाल शिलाखंड मिला।
इसी पत्थर से मां नित्यकाली की भव्य प्रतिमा का निर्माण कराया गया। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मां की प्रतिमा एक ही शिलाखंड से निर्मित बताई जाती है। इसमें कहीं जोड़ नहीं दिखाई देता। राजा ने पंचमुंड आसन पर मां की स्थापना कराई थी।
मां के दरबार में गणेश के साथ 32 भैरवों की उपस्थिति
मंदिर की धार्मिक संरचना भी तांत्रिक परंपरा की विशिष्टता को दर्शाती है। मां नित्यकाली की प्रतिमा के ठीक सामने भगवान गणेश विराजमान हैं। वहीं, मंदिर परिसर में शिवलिंग के स्वरूप में 32 भैरव, एक महाकाल भैरव और एक दिकपाल भैरव स्थापित हैं।
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में तांतीपाड़ा, रानीदिघी, पटाल और राजापाड़ा मोहल्ले के विभिन्न स्थानों पर स्थापित शिवलिंगों को 108 भैरवों की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। सिंहवाहिनी मंदिर और मां बागधीश्वरी का मंदिर भी इस धार्मिक परिक्षेत्र की पहचान हैं।
तारापीठ की साधना परंपरा से जुड़ा है शक्तिस्थल
तंत्र साधना से जुड़े लोगों के बीच मान्यता है कि तारापीठ की साधना को पूर्णता तभी मिलती है, जब साधक पाकुड़ स्थित मां नित्यकाली और मां श्मशान काली के दरबार में भी शीश नवाएं।
तारापीठ, नलहटी और मां कामाख्या की धार्मिक परंपराओं के बीच पाकुड़ के इस मंदिर को भी विशिष्ट स्थान प्राप्त है। दीपावली की रात मां श्मशान काली की विशेष पूजा-अर्चना होती है।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था ने मां नित्यकाली मंदिर को पीढ़ियों से धार्मिक पहचान दी है। हालांकि, परिसर में शिवलिंगों सहित अन्य धार्मिक वस्तुओं की चोरी की घटनाएं सुरक्षा और संरक्षण की जरूरत भी रेखांकित करती हैं।
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