लातेहार में मॉडल डेयरी लिख रही आत्मनिर्भरता की कहानी, 10 गायों से हर महीने 1 लाख का दूध कारोबार
लातेहार के किनामाड़ में एक मॉडल डेयरी 10 गायों के साथ हर महीने एक लाख रुपये तक का दूध बेच ...और पढ़ें

10 गायों से हर महीने 1 लाख का दूध कारोबार (एआई जेनरेटेड तस्वीर)
HighLights
किनामाड़ डेयरी 10 गायों से 1 लाख रुपये मासिक दूध बिक्री।
दो ग्रामीणों को 24 हजार रुपये मासिक रोजगार प्रदान।
डीएमएफटी समर्थित पहल, ग्रामीण आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है।
उत्कर्ष पाण्डेय, लातेहार। रोजगार की तलाश में गांव से शहरों की ओर पलायन की खबरों के बीच किनामाड़ की एक छोटी सी डेयरी उम्मीद की बड़ी कहानी लिख रही है। यहां 10 गायों के सहारे हर महीने एक लाख रुपये तक के दूध की बिक्री हो रही है।
गायों की रंभाहट के बीच दो ग्रामीणों के घरों में नियमित आमदनी पहुंच रही है तो स्थानीय बाजार को भी ताजा दूध मिल रहा है। लातेहार प्रखंड में केंद्रीय विद्यालय जाने वाले मार्ग पर स्थित इस मॉडल डेयरी की स्थापना जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) की सहायता से की गई है।
स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी से संचालित यह पहल बताती है कि रोजगार की राह तलाशने के लिए गांव छोड़ना ही एकमात्र विकल्प नहीं है, गांव में भी अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
प्रतिदिन 70 किलोग्राम होता है दूध का उत्पादन
डेयरी में वर्तमान में 10 गायों का पालन किया जा रहा है। प्रत्येक गाय प्रतिदिन औसतन छह से सात किलोग्राम दूध देती है। इस तरह यहां प्रतिदिन 60 से 70 किलोग्राम दूध का उत्पादन हो रहा है। स्थानीय बाजार में दूध 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाता है। इस हिसाब से प्रतिदिन तीन हजार से 3,500 रुपये तक की बिक्री होती है।
वहीं, 30 दिनों के आधार पर मासिक दूध बिक्री का कुल मूल्य 90 हजार से 1.05 लाख रुपये तक पहुंचता है। यानी 10 गायों के सहारे डेयरी हर महीने करीब एक लाख रुपये का दूध बाजार तक पहुंचा रही है।
दो ग्रामीणों को मिला रोजगार, हर महीने 24 हजार की पगार
मॉडल डेयरी के संचालन में कढ़ीमा गांव के फुनेश्वर यादव और सबानो गांव के शनि उरांव महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। दोनों को प्रतिमाह 12-12 हजार रुपये मानदेय दिया जाता है। इस तरह दो ग्रामीणों को मिलाकर हर महीने 24 हजार रुपये का नियमित रोजगार मिल रहा है। इनके लिए यह रकम महज मानदेय के साथ परिवार की जरूरतें पूरी करने और आर्थिक स्थिति मजबूत बनाने का आधार है।
गांव में ही रोजगार उपलब्ध होने से रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों की ओर जाने की मजबूरी भी कम करने की उम्मीद जगी है। एक ओर दो ग्रामीण परिवारों को नियमित आमदनी मिल रही है तो दूसरी ओर आसपास के लोगों को ताजा और गुणवत्तापूर्ण दूध उपलब्ध हो रहा है। इस तरह डेयरी की उपयोगिता रोजगार और स्थानीय जरूरत, दोनों स्तरों पर दिखाई दे रही है।
10 गायों से शुरू हुई पहल, विस्तार से खुल सकते हैं रोजगार के नए द्वार
किनामाड़ की मॉडल डेयरी की मौजूदा क्षमता भले ही 10 गायों तक सीमित है, लेकिन इसकी संभावनाएं काफी व्यापक हैं। यदि भविष्य में गायों की संख्या बढ़ाई जाए और दूध के संग्रहण, शीतकरण तथा विपणन की बेहतर व्यवस्था विकसित की जाए तो उत्पादन के साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। इसके लिए पशुओं के चारे, नियमित स्वास्थ्य जांच और रखरखाव पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
ग्रामीणों का मानना है कि ऐसी योजनाओं का विस्तार गांवों में स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने और युवाओं को स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध कराने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। आखिर विकास की असली तस्वीर तब उभरती है, जब सरकारी सहायता से शुरू हुई कोई योजना लोगों के घरों में नियमित आमदनी पहुंचाने लगे।
किनामाड़ की मॉडल डेयरी इसी बदलाव की छोटी, मगर प्रेरक मिसाल है। यहां 10 गायों का दूध बाजार तक पहुंच कर ग्रामीण आत्मनिर्भरता व स्थानीय रोजगार की नई उम्मीद भी बन रहा है।
हमारा प्रयास है कि सरकारी योजनाओं का लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचे और उन्हें अपने क्षेत्र में रोजगार के अवसर मिलें। ऐसी पहलों को प्रोत्साहित कर इनका विस्तार किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक ग्रामीण परिवार आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। - संदीप कुमार, उपायुक्त लातेहार।
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