अमेरिका-कनाडा से जापान तक गूंज चुकी है बापी के ढाक की थाप, जमशेदपुर में मां दुर्गा की आराधना में लगा रहे चार चांद
जमशेदपुर में दुर्गा पूजा के दौरान ढाक की थाप और धुनुची नृत्य भक्तिमय माहौल बनाते हैं। कलाकार बापी मनोज सिंह ...और पढ़ें

जमशेदपुर में दुर्गा पूजा की रौनक ढाक की थाप से। जागरण
मनोज सिंह, जमशेदपुर। मां दुर्गा की आराधना, धुनुची नृत्य और ढाक की गूंज... दुर्गोत्सव की ये तीनों पहचान बंगाल की समृद्ध संस्कृति और परंपरा को जीवंत कर देती हैं। लौहनगरी जमशेदपुर में भी दुर्गापूजा के दौरान ढाक की थाप श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर कर रही है।
महाषष्ठी से लेकर महादशमी तक पूजा पंडालों में गूंजती ढाक की आवाज उत्सव के उल्लास को और बढ़ा देती है। इसकी लय पर जहां श्रद्धालु झूम उठते हैं, वहीं धुनुची नृत्य का आकर्षण देखते ही बनता है।
डिमना रोड स्थित शिवशंकर दुर्गापूजा समिति के पंडाल में इस बार पश्चिम बंगाल के ढाकुरिया से ढाकी पार्टी पहुंची है। इस दल के मुख्य कलाकार बापी हैं, जो अपनी कला से श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। बापी बताते हैं कि ढाक बजाने की कला उन्हें देश-विदेश तक ले गई है।
उनकी टीम अमेरिका, कनाडा, फ्रांस और जापान में भी अपनी प्रस्तुति दे चुकी है। जमशेदपुर में दुर्गोत्सव के दौरान ढाक बजाना उनके लिए केवल काम नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ने का माध्यम भी है।
ढाक की थाप में छिपी है बंगाल की पहचान
ढाक बंगाल का पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जिसे दुर्गापूजा का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। आकार में बड़े ढोल जैसे इस वाद्य को रस्सी के सहारे कंधे पर लटकाकर विशेष लकड़ी की छड़ियों से बजाया जाता है।
इसे बजाने वाले कलाकार ढाकी कहलाते हैं। इसकी गूंजदार धुन पूजा के माहौल को भक्तिमय बनाने के साथ उत्सव में नई ऊर्जा भर देती है। संधि पूजा, आरती, धुनुची नृत्य और मां दुर्गा की विदाई के समय इसकी थाप विशेष आकर्षण बनती है।
पश्चिम बंगाल से आते हैं कलाकार
जमशेदपुर में दुर्गापूजा के दौरान अधिकांश बड़े पूजा समितियां पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से ढाकी कलाकारों को आमंत्रित करती हैं। ये कलाकार पूजा के दिनों में पंडालों में पारंपरिक धुन बजाकर उत्सव की रौनक बढ़ाते हैं। कई कलाकार वर्षों से शहर के पूजा पंडालों में अपनी सेवाएं देते आ रहे हैं। उनकी कला बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभाती है।
मां की विदाई पर भावुक कर देती है थाप
ढाकी बाजा केवल संगीत नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। इसकी थाप पर होने वाला धुनुची नृत्य श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। वहीं, महादशमी के दिन सिंदूर खेला और मां दुर्गा की विदाई के समय ढाक की धुन वातावरण को भावुक कर देती है। बहुसांस्कृतिक जमशेदपुर में ढाक की गूंज दुर्गोत्सव को विशिष्ट पहचान देती है। मां के आगमन से लेकर विदाई तक इसकी थाप उत्सव के हर पल को यादगार बनाती है।
