झारखंड में दासाय पर्व: जनजातीय समुदाय का दुर्गोत्सव मनाने का अनूठा तरीका, नौ कृषि उपज की पूजा
झारखंड के जनजातीय समुदाय दुर्गा पूजा को 'दासाय पर्व' के रूप में मनाते हैं, जिसमें आपसी भाईचारा और कृषि का ...और पढ़ें

दसाय त्योहार को कृषि त्यौहार या शस्य उत्सव भी कहा जाता है।
HighLights
दासाय पर्व झारखंड के जनजातीय समुदाय का अनूठा दुर्गोत्सव है।
यह कृषि और प्रकृति से जुड़ा भाईचारे का त्योहार है।
एक महीने पहले से तैयारी, सामूहिक नृत्य और मेलों का आयोजन।
दिनेश शर्मा, चक्रधरपुर। दुर्गा पूजा को झारखंड के जनजातीय समुदाय के बीच 'दासाय पर्व' के रूप में बहुत ही अनूठे और पारंपरिक ढंग से मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान आदिवासी और आदिम जनजाति के लोग आपसी भेदभाव को भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और भाईचारे का संदेश देते हैं।
कृषि और प्रकृति से जुड़ा है यह पर्व
दुर्गा पूजा की महाअष्टमी के दिन रम्भा (केला), कचु (अरबी), हल्दी, जयन्ती, बेल, डालिया, अशोक, धान और मान—इन नौ प्रकार की कृषि उपज (नपत्रिका) को सजाकर आदिम जनजाति के लोग विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। यही कारण है कि इस त्योहार को 'कृषि त्योहार' या 'शस्य उत्सव' भी कहा जाता है।
अष्टमी के इस दिन को 'जागरण' भी कहा जाता है। जागरण की संध्या ढलने के बाद कृषक अरवा चावल के आटे को दूध या पानी में मिलाकर घोल तैयार करते हैं। इस घोल का छिड़काव वे अपनी फसलों, पेड़-पौधों तथा घर के सभी घरेलू सामानों पर करते हैं। आदिम जनजातियों का अटूट विश्वास है कि ऐसा करने से फसलें निरोग रहती हैं और बंपर पैदावार होती है।
नवमी और दशमी का महत्व
दुर्गा पूजा की नवमी तिथि को आदिम जनजाति समुदाय द्वारा एक बेहद शुभ दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन समुदाय के लोग मांसाहार से दूर रहते हैं, लेकिन मछली खाना शुभ मानते हैं। यह दिन मुख्य रूप से पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होता है।
त्योहार का अंतिम दिन यानी विजया दशमी 'दासाय पर्व' का सबसे महत्वपूर्ण और खास दिन होता है। इस दिन परिवार के प्रत्येक सदस्य अपने आस-पड़ोस में जाकर बड़े-बुजुर्गों का चरण स्पर्श करते हैं और उनसे दीर्घायु होने का आशीर्वाद लेते हैं। पर्व का यह अंतिम दिन मौज-मस्ती और मेल-मिलाप का प्रतीक होता है, जिसमें हर घर में स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं।
एक महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारी
आदिम जनजातियों के बीच आज भी 'दासाय पर्व' को मनाने की परंपरा बेहद अनूठी है। पर्व से एक महीने पहले से ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। गांवों में घूम-घूमकर संगीत और नृत्य के माध्यम से 'दासाय पर्व' का आमंत्रण दिया जाता है।
टोलों और गांवों के बीच पारंपरिक संगीत व नृत्य प्रस्तुत कर नम्रतापूर्वक दासाय पर्व को आमंत्रित किया जाता है। इस दौरान ग्रामीण प्रत्येक परिवार से चावल, तेल और नगद सहयोग स्वरूप देते हैं। इन सामग्रियों से चावल की हड़िया (पारंपरिक पेय) बनाकर सामूहिक रूप से प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है, जिसके बाद सामूहिक नृत्य का आयोजन होता है।
मेलों और सामूहिक नृत्य का होता है आयोजन
दासाय के अवसर पर कई गांवों में दस दिवसीय मेलों का भी आयोजन किया जाता है, जहाँ पारंपरिक दासाय गीत और नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। इन सामूहिक नृत्य-संगीत कार्यक्रमों में युवक-युवतियां किसी भी भेदभाव से ऊपर उठकर बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। हालांकि, विभिन्न आदिम जनजातीय समूहों के बीच दासाय पर्व मनाने की अपनी-अपनी स्थानीय परंपराएं भी प्रचलित हैं।
