आस्था का अनूठा नजारा: मन्नत के लिए सड़क पर दंडवत लेट जाते हैं भक्त, ऊपर से गुजरती है मां दुर्गा की पालकी
ईचागढ़ के डुमरा में दुर्गा पूजा के दौरान एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जहां विजयादशमी पर नवपत्रिका विसर्जन के समय श्रद्धालु रास्ते में दंडवत लेट जाते हैं।

मनोकामना पूर्ण होने और मन्नत मांगने के लिए माता के भक्त करते हैं दंडवत प्रणाम
HighLights
डुमरा में विजयादशमी पर नवपत्रिका विसर्जन की अनोखी परंपरा।
श्रद्धालु दंडवत लेटकर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
पंडित पालकी लेकर भक्तों के ऊपर से गुजरते हैं, अटूट आस्था।
अरुण कुमार माझी, ईचागढ़। आस्था, विश्वास और भक्ति की अनूठी परंपराएं भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर ईचागढ़ प्रखंड के माझी बाड़ी दुर्गा मंदिर डुमरा में ऐसी ही एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां विजयादशमी के दिन नवपत्रिका विसर्जन के दौरान श्रद्धालु रास्ते में दंडवत लेट जाते हैं।
पंडित जब नवपत्रिका को पालकी में लेकर विसर्जन के लिए निकलते हैं, तो श्रद्धालु जमीन पर साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हैं। पालकी लेकर आगे बढ़ते पंडित उनके ऊपर से गुजरते हैं। इस दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा से आशीर्वाद प्राप्त करने और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।
डुमरा में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। विजयादशमी के दिन नवपत्रिका विसर्जन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस अनुष्ठान में भाग लेते हैं। इनमें ऐसे भक्त भी शामिल होते हैं, जिनकी मनोकामनाएं पूरी हो चुकी हैं।
वहीं, कई श्रद्धालु अपनी अधूरी मनोकामनाओं की पूर्ति की आशा लेकर मां के चरणों में नतमस्तक होते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां दुर्गा के प्रति सच्ची श्रद्धा और समर्पण से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
आस्था और समर्पण का अनूठा संगम
नवपत्रिका विसर्जन के दौरान डुमरा की गलियों में भक्ति का विशेष माहौल रहता है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते हैं।
वहीं, दंडवत लेटे भक्तों के ऊपर से नवपत्रिका की पालकी लेकर गुजरते पंडित इस परंपरा को और भी विशिष्ट बनाते हैं। यह दृश्य श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और मां दुर्गा के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। आधुनिकता के दौर में भी डुमरा के लोगों ने अपनी इस पारंपरिक धार्मिक मान्यता को संजोकर रखा है।

विजयादशमी के अवसर पर महिलाओं ने सिंदुर खेला खेल कर मां से सदा सुहागिन करने का रस्म निभाई और नमः आंखों से मां का विदाई किया।
यह परंपरा न केवल स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत की विशिष्ट पहचान भी बनी हुई है।
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