यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 27, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
टाटा स्टील को बचाने के लिए दोराबजी ने गिरवी रखे थे पत्नी के गहने
सर दोराबजी ने टाटा स्टील को बचाने के लिए अपनी पत्नी तक के गहने को गिरवी पर रख दिया था।

सुधीर पांडेय, जमशेदपुर। टाटा समूह के पहले चेयरमैन सर दोराबजी टाटा ने शुरुआती दौर में कंपनी को बचाने के लिए अपनी पत्नी तक के गहने को गिरवी पर रख दिया था। यह बात उन दिनों की है जब जमशेदपुर में टाटा स्टील कंपनी आकार ले रही थी। दरअसल, कंपनी की स्थापना के प्रारंभिक दिन कठिनाइयों से भरे थे। 1920 के दौरान बढ़ती महंगाई के साथ मंदी का दौर आ गया था।
परिवहन और श्रमिक उपलब्धता में दिक्कतों के अलावा जापान, जोकि उस समय टिस्को का सबसे बड़ा ग्राहक था, वहां भूकंप ने तबाही मचा दी थी। इस कारण कंपनी को इस अवधि में अपने लाभांश को स्थगित करना पड़ा और 1924 में इसके बंद होने तक की नौबत आ गई थी। ऐसे में दोराबजी टाटा को टाटा स्टील कंपनी को बचाने को बैंकों से लोन लेने के लिए अपनी पत्नी के गहने और निजी संपत्ति तक को गिरवी रखना पड़ा था।
टाटा परिवार की परंपराओं का निर्वाह करने वाले हीराबाई और जमशेदजी नसरवानजी टाटा के ज्येष्ठ पुत्र दोराबजी टाटा की दूरदर्शिता ने उन्हें अपने पिता द्वारा देखे गये सपने को साकार करने के लायक बनाया। उनके देखे गये सपनों में भारत में एक विश्र्वस्तरीय स्टील संयंत्र, मुंबई के निकट एक महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजना और बेंगलुरु के पास एक विश्र्वस्तरीय अनुसंधान संस्थान को स्थापित करना शामिल था।
सर दोराबजी टाटा द्वारा रखी गयी मजबूत नींव ने राष्ट्र निर्माण और उनके सामाजिक विकास की विरासत को संजोये रखा।टाटा स्टील की ओर से सर दोराबजी टाटा की 158वीं जयंती रविवार को मनायी जाएगी। सुबह 8.30 बजे सर दोराबजी टाटा पार्क में होने वाले जयंती समारोह में मुख्य अतिथि टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन होंगे। इस उपलक्ष्य में सेंटर फॉर एक्सीलेंस में 27 से 29 अगस्त तक सर दोराबजी टाटा की जीवनी पर आधारित एक प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। इसका अवलोकन सुबह 9.00 बजे से शाम 5.00 बजे तक शहर की जनता कर सकती है।
टाटा समूह के पहले चेयरमैन थे सर दोराबजीसर
दोराबजी टाटा, जमशेदजी नसरवानजी व हीराबाई के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म 27 अगस्त 1859 को बंबई में हुआ था। अपने योग्य और अनुभवी पिता के मार्गदर्शन में सर दोराबजी ने भारतीय उद्योग और व्यापार का व्यापक अनुभव प्राप्त किया। 1904 में जमशेदजी टाटा की मृत्यु के बाद उन्होंने पिता के सपनों को साकार करने का बीड़ा उठाया। लोहे की खानों का ज्यादातर सर्वेक्षण उन्हीं के निर्देशन में पूरा हुआ। 1907 में टाटा स्टील और 1911 में टाटा पॉवर की स्थापना में सर दोराबजी की अहम भूमिका रही। वे टाटा समूह के पहले चैयरमैन बने और 1908 से 1932 तक इस पद को सुशोभित किया।
मेहरबाई से 1898 में हुआ था विवाह
1898 में सर दोराबजी टाटा ने 38 साल की आयु में मेहरबाई भाभा से विवाह किया। लेकिन कोई संतान नहीं हुई। मेहरबाई तत्कालीन मैसूर राज्य के शिक्षा विभाग के महानिरीक्षक एचजे भाभा की पुत्री थी।
ब्रिटिश सरकार ने दी थी नाइटहुड की उपाधि
साकची को एक आदर्श शहर के रूप में विकसित करने में सर दोराबजी की मुख्य भूमिका रही, जो बाद में जमशेदपुर के नाम से जाना गया। 1910 में उन्हें एडवर्ड सेवन द्वारा नाइटहुड की उपाधि से नवाजा गया। ट्रस्ट की स्थापना के बाद वे अप्रैल 1932 में यूरोप गए, जहां 3 जून 1932 को जर्मनी के किसिंग्रन में उनकी मृत्यु हो गई।
