जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : आदिवासी हो समाज मागे पर्व के माहौल में रंगने लगा है। मागे मिलन समारोह का दौर तो पिछले हफ्ते से ही शुरू हो गया था और आगे भी चलेगा, लेकिन अब बस्तियों, गांवों में मागे पर्व मनाने का सिलसिला शुरू हो गया। शुक्रवार को इसी कड़ी में मानगो के उलीडीह समेत बागुननगर, बागनुहातु आदि बस्तियों में मागे पर्व के गीत गूंजने लगे और लोग मागे की मस्ती में झूमने लगे।

मागे पर्व हो समाज के लोग फसलों के कटने तथा खेत खलिहान के कार्यो को समाप्त करने के बाद मनाते हैं। कृषि कार्यो से फुर्सत मिलने के बाद यह पर्व मनाने की परंपरा है। इस मौके पर ग्राम देवता की पूजा गाजे-बाजे के साथ नाचते-गाते हुए धूम-धाम से की जाती है। हो परंपरा व संस्कृति के जानकार जेनाराम बोदरा बताते हैं-'मागे पर्व मनाने के पीछे अनेक कहानियां प्रचलित हैं। इनमे से नए जगह में गांव बसाने की कथा भी एक है।' बोदरा बताते हैं-'हो भाषा में मागे का अर्थ होता है- 'मांआग् गे' अर्थात 'मां का ही'। कहा जा सकता है कि यह धरती माता का पर्व है और साथ ही यह गो माता का भी पर्ब है। इसलिए इस पर्व को हो समाज में इसी के महत्व के आधार पर मनाया जाता है।

'मागे पोरोब' मुख्यत: कई चरणों में मनाया जाता है। अनादेर, ओतेइली, तूमुटु, लोयो-गुरि, मरंग पोरोब, बसि मुसिंग व हर मगेया। शुक्रवार को उलीडीह व बागुननगर में आदिवासी हो समाज समिति की ओर से मनाये गये मागे पर्व में श्याम गोयपाय, मुनू होनहागा, रितु सोय, सुरता सिरका आदि मुख्य रूप से शामिल थे।