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गुमला में 290 हेक्टेयर में होगी सरसों की खेती, किसानों को प्रति एकड़ 20 हजार तक मुनाफा

Published: Tue, 03 Nov 2026 04:41 PM (IST)

गुमला जिले में किसानों की आय बढ़ाने के लिए 290 हेक्टेयर में सरसों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा ...और पढ़ें

290 हेक्टेयर में होगी सरसों की खेती (एआई जेनरेटेड तस्वीर)

290 हेक्टेयर में होगी सरसों की खेती (एआई जेनरेटेड तस्वीर)

HighLights

  1. गुमला में 290 हेक्टेयर में सरसों की खेती को प्रोत्साहन।

  2. किसानों को उन्नत बीज, खाद और प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

  3. प्रति एकड़ 18-20 हजार रुपये तक शुद्ध आय का अनुमान।

जागरण संवाददाता,गुमला। जिले में किसानों की आमदनी और आजीविका बढ़ाने के उद्देश्य से सरसों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, सेवर, भरतपुर (राजस्थान) की परियोजना के तहत कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला (विकास भारती, बिशुनपुर) द्वारा वर्ष 2026-27 में 290 हेक्टेयर में सरसों की खेती कराई जा रही है। इसके लिए घाघरा, बिशुनपुर, सिसई, रायडीह और बसिया प्रखंड के विभिन्न गांवों का चयन किया गया है। 

परियोजना के तहत कलस्टर अग्रिम पंक्ति प्रत्यक्षण एवं आईआईआरएमआर-एसटीसी प्रत्यक्षण के माध्यम से किसानों को उन्नत खेती से जोड़ा जा रहा है। सात से 29 अक्टूबर तक किसानों को एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। 

साथ ही उन्हें सरसों के उन्नत बीज के अलावा यूरिया, डीएपी, एमओपी और सल्फर जैसे जरूरी खाद उपलब्ध कराए गए हैं। 

डीआरएमआर-150-35 और बीबीएम-1 प्रभेद का चयन

खेती के लिए डीआरएमआर-150-35 और बीबीएम-1 प्रभेद का चयन किया गया है। कृषि विज्ञान केंद्र के अनुसार इन प्रभेदों में तेल की मात्रा क्रमशः लगभग 39.8 और 40.03 प्रतिशत है। इससे किसानों को तेल उत्पादन में भी फायदा होगा। 

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पहले जहां एक किलो तेल निकालने के लिए लगभग तीन किलो सरसों की जरूरत पड़ती थी, वहीं नई किस्मों से 2.5 से 2.75 किलो सरसों में एक किलो तेल प्राप्त किया जा सकेगा। सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6200 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है। इस फसल में अपेक्षाकृत कम पानी और उर्वरक की जरूरत पड़ती है। 

खरपतवार प्रबंधन में भी कम मेहनत

खरपतवार प्रबंधन में भी कम मेहनत करनी होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के आकलन के मुताबिक किसानों को प्रति एकड़ 18 से 20 हजार रुपये तक शुद्ध आमदनी हो सकती है। इस पहल से किसानों की आय बढ़ने के साथ खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है। वहीं, स्थानीय स्तर पर सरसों उत्पादन बढ़ने से किसानों को अपने घर के लिए शुद्ध खाद्य तेल उपलब्ध कराने का विकल्प भी मिलेगा।

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