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काली पूजा की रात किसी घर नहीं बनता चावल: झारखंड के मलूटी गांव में 'लुची-माछेर झोल' की है अनोखी परंपरा

Published: Fri, 06 Nov 2026 07:17 PM (IST)

दुमका के ऐतिहासिक मलूटी गांव में काली पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं, जहां 108 मंदिरों के बीच तांत्रिक साधना और विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

HighLights

  1. मलूटी गांव में 108 मंदिरों के बीच काली पूजा की तैयारी।

  2. तांत्रिक साधना और भैंसा-भेड़ की बलि की प्राचीन परंपरा।

  3. लुची-माछेर झोल और जलेबी की विशेष मांग मेले में।

राजीव, दुमका। दुमका के शिकारीपाड़ा प्रखंड में स्थित ऐतिहासिक 108 मंदिरों का गांव मलूटी। पूरा गांव अभी काली पूजा की तैयारियों में डूबा है। शिल्पकार कल्याण सूत्रधार व उनके साथ मां काली की आकर्षक प्रतिमा को अंतिम रूप देने में तल्लीन हैं।

गांव की महिला रात्रि राय काली पूजा में काली मां को लगने वाले सात तरह के साग को इकट्ठा करने में जुटी हैं। काली पूजा पर लगने वाला मेला के लिए पंडाल व दुकानों का भी निर्माण अंतिम चरण में है।

तंत्र-मंत्र की साधना भूमि मलूटी गांव के अलग-अलग हिस्सों में मां काली की आठ मंदिरों के अलावा मलूटी पंचायत के प्रतापपुर गांव में भी पूरे विधि-विधान से काली की पूजा की परंपरा वर्षों से कायम है।

मलूटी के श्मशान काली में तांत्रिक तंत्र साधना से मां काली की पूजा-अर्चना करते हैं। यहां काली पूजा के दौरान तारापीठ समेत कई इलाकों से तांत्रिकों का आगमन होता है।

अधिकांश तांत्रिकों का जमावड़ा श्मशान काली मंदिर में ही होता है। मलूटी गांव के छय तरफ में भैंसा व भेड़ की बलि देने की परंपरा आज भी जारी है। जबकि शेष हिस्सों में पाठा, ईख व कोहड़ा की बलि दी जाती है।

काली पूजा की रात में यहां सैकड़ों पाठों की बलि होती है। विशिष्ट बात यह कि मां काली को निशा बलि देने की परंपरा है। इसकी वजह से बलि का प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा अगले दिन की है।

Maluti Kali Puja

मलूटी में काली की प्रतिमा तैयार करते मूर्ति कलाकार।

जबकि प्रतिमा विसर्जन से पूर्व भी यहां अल सुबह मां काली को भोग लगता है। काली पूजा की रात में मलूटी गांव के किसी भी घर में चावल बनाने की परंपरा नहीं है। काली पूजा की रात गांव के हरेक घर में लुची-माछेर झोल के अलावा चना का दाल, कोहड़ा की सब्जी व घर में बनाया गया नारियल का लड्डू, छेना व बेसन की मिठाई खाने व खिलाने का प्रचलन है।

अमेरिका से आएंगे डॉ. कानन चटर्जी तो कलिंगपोंग से अभिजीत मुखर्जी

देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में बसे मलूटी के लोग काली पूजा में अपने घर पहुंचने लगे हैं। अमेरिका में बसे डॉ. कानन चटर्जी आठ नवंबर को मलूटी पहुंच रहे हैं।

कोलाकाता से डॉ. देवजीत बनर्जी अपने पूरे परिवार के साथ यहां आएंगे। जमशेदपुर से नीरद वरण राय पूरे परिवार के साथ पहुंचेंगे।

बोलपुर से सुब्रता मुखर्जी, धनबाद से दुलाल चंद राय, दुर्गापुर से बैंक अधिकारी राजू मुखर्जी, गुवाहाटी से नंदिता भट्टाचार्य, अगरतल्ला से विज्ञानी पार्थो राय, सोमनाथ मंडल, कलिंगपोंग से अभिजीत मुखर्जी पूरे परिवार से साथ मलूटी पहुंचेंगे।

गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक कुमुदवरण राय बताते हैं कि मलूटी में काली पूजा विशिष्ट है। देश-विदेश में जाकर बसे यहां के तकरीबन ढ़ाई से तीन हजार लोगों का जुटान काली पूजा में होता है।

जबकि सात दिवसीय मेला में हजारों की संख्या में जुटान होता है। मेला में पश्चिम बंगाल से लेकर झारखंड समेत आसपास के कई गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

मलूटी के काली पूजा में कोलकातारे रासोगुल्ला से ज्यादा डिमांड में जलेबी

पश्चिम बंगाल व खासकर बंगाली समुदाय में रसगुल्ला काफी पसंदीदा मिठाई है लेकिन मलूटी के काली पूजा में कोलकातारे रासोगुल्ला से ज्यादा जलेबी की डिमांड रहती है।

यहां मां मौलीक्षा के मंदिर प्रांगण में तीन दिन और बांदार काली परिसर में सात दिनों मेला लगता है। इस दौरान यहां सर्वाधिक डिमांड जलेबी की रहती है। सात दिनों में तकरीबन 25 से 30 क्विंटल जलेबी की खपत होती है।

यही वजह है कि बड़ी संख्या में कारीगर अपनी दुकान लगाते हैं। मेला में मनीहारी सामग्रियों और आइसक्रीम भी खूब बिकता है। तारामाची और अन्य झूले लगाने वालों को भी अच्छी आमदनी होती है।

इस मेला में खास तौर पर पश्चिम बंगाल के मसरा, कास्टकोला, हस्तीकोदा, मल्लारपुर, रामपुरहाट के अलावा शिकारीपाड़ा प्रखंड के धानधड़ा, कुसंदा समेत मलूटी पंचायत के अधिकांश गांवों के ग्रामीणों की भीड़ यहां उमड़ी है जिसमें आदिवासियों की भी भीड़ जबरदस्त होती है।

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मलूटी में काली पूजा विशिष्ट है। काली पूजा में सात समंदर पार रहने वाले भी अपने गांव जरूर आते हैं। काली पूजा में यहां के तकरीबन ढ़ाई से तीन हजार लोग अपने पूरे परिवार के साथ आते हैं। यही वह अवसर होता है जब गांव के लोग व परिवार के सदस्य एक-दूसरे से मिल-जुल कर त्योहार को उत्सवी बना देते हैं।

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माधव चटर्जी, वयोवृद्ध ग्रामीण, मलूटी

काली पूजा के दौरान मलूटी पंचायत के आस-पास के ग्रामीण बड़ी संख्या में मेला देखने आते हैं। ऐसे में दूर-दराज के लोग गांव में आकर अपने रिश्तेदार के यहां ठहर जाते हैं। आदिवासी समुदाय के लोग मेला के दौरान अपने रिश्तेदारों के यहां आकर अवश्य ठहरते हैं।

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कुमुदवरण राय, सेवानिवृत्त शिक्षक, मलूटी

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