100 मंदिरों के गांव मलूटी में नव पत्रिका से देवी दुर्गा का आह्वान, छय तरफ दी जाती है भैंसे की बलि; विशेष परंपराएं
झारखंड के दुमका स्थित मलूटी गांव में दुर्गा पूजा की अनूठी परंपरा है, जहां महासप्तमी पर देवी दुर्गा का आह्वान ...और पढ़ें
HighLights
मलूटी में नव पत्रिका से देवी दुर्गा का आह्वान।
नौ पत्तियों को देवी दुर्गा का स्वरूप मानकर पूजा।
महा सप्तमी पर पारंपरिक बलि अनुष्ठान संपन्न।
राजीव, दुमका। झारखंड की उपराजधानी दुमका के शिकारीपाड़ा प्रखंड में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों का गांव मलूटी में दुर्गापूजा मनाने की परंपरा भी खास और अनूठी है। तंत्र-मंत्र व साधना की धरती मलूटी गांव के छय तरफ भाग में रहने वाले श्रद्धालु आज भी दुर्गा देवी को भैंसे, भेड़, पाठा, कुमड़ा व गन्ना की बलि देते हैं।
विभिन्न हिस्सों में बंटा मलूटी गांव के ग्रामीण बांग्ला संस्कृति से दुर्गापूजा करते हैं। यहां के सेवानिवृत्त शिक्षक कुमुदवरण राय बताते हैं कि मलूटी में देवी का आह्वान षष्ठी के दिन बोधन पूजन से करने की परंपरा है।
बोधन पूजन में यजमान पूरे विधि-विधान से तीन कलश की स्थापना कर देवी का आह्वान करते हैं। कहा कि रविवार को महासप्तमी के दिन नव पत्रिका अनुष्ठान की परंपरा का निर्वहन पूरे उत्साह व विधि-विधान से किया गया।
कुमुदवरण के मुताबिक मलूटी में शक्ति के संग प्रकृति पूजन की परंपरा है। यजमानों को नव पत्रिका पूजन अनुष्ठान कराने वाले पुरोहित प्रबोध भट्टाचार्य के मुताबिक महा सप्तमी के दिन प्रात:काल के समय तय शुभ मुहूर्त पर नव पत्रिका पूजन अनुष्ठान संपन्न कराया गया।
इसमें नौ तरह की पत्तियों से मिलाकर बनाए गए गुच्छे को तालाब में मंत्रोच्चार के साथ महा स्नान कराने की परंपरा है। इसके माध्यम से ही देवी दुर्गा का आह्वान किया जाता है। नव पत्रिका में केला, दारु हल्दी, हल्दी, जयंती, बेलपत्र, अनार, अशोक, धान व अपराजिता की पत्तियों का गुच्छ बनाया जाता है।
इन्हीं नौ पत्तियों को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर इसे दुर्गा मंडप में पूरे विधि-विधान से स्थापित किया जाता है। यहां मंडपों में दुर्गा की प्रतिमा के बजाए यही नव पत्रिका की ही पूजा-अर्चना होती है।
पारंपरिक तरीके से किया जाता है नव पत्रिका पूजन
मलूटी में नव पत्रिका पूजन अनुष्ठान पारंपरिक तरीके से किया जाता है। महा सप्तमी के दिन रविवार को राजार बाड़ी के यजमान तुषार वरण राय, कुमुद वरण राय समेत कई श्रद्धालु तय मुहूर्त पर ढोल-ढाक के साथ चतुर डोला यानि की डोली को कांधे पर लेकर तालाब पहुंचे जहां पुरोहित प्रबोध भट्टाचार्य मंत्रोच्चार के बीच नव पत्रिका महा स्नान कराने की परंपरा का निर्वहन किया।
इसके उपरांत नव पत्रिका को डोली में रखकर उसे दुर्गा मंडप में लाकर स्थापित किया गया। इस दौरान माता स्वरूप नव पत्रिका को फल, फूल, पुष्प, नारियल, खीर, पूड़ी व कई तरह के मिष्ठान प्रसाद के तौर पर चढ़ाया गया।
परंपरा के मुताबिक पाठा की बलि भी दी गई। इससे पूर्व श्रद्धालुओं ने शनिवार को विधि-विधान से षष्ठी पूजन कर तीन कलश की स्थापित कर देवी का आह्वान किया था। कुमुद वरण राय कहते हैं कि मलूटी के विभिन्न हिस्सों में आठ स्थलों पर दुर्गा पूजा की जाती है।
इसमें छह दुर्गा मंडपों में दुर्गा की प्रतिमा के बजाए नव पत्रिका की पूजा-अर्चना की परंपरा है। जबकि बदलते समय के साथ अब गांव में दो जगहों पर पंडाल बनाकर सार्वजनिक दुर्गा मां की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है।

नौ पत्तियां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक
पुरोहित प्रबोध भट्टाचार्य के मुताबिक दुर्गा पूजा में महा सप्तमी के दिन नव पत्रिका पूजा का विशेष महत्व है। बंगाल में इसे कोलाबोऊ पूजा के नाम से भी पुकारा जाता है। कहते हैं कि नव पत्रिका का पूजन पतरा के अनुसार घोषित समय पर शुरु किया जाता है और इसका समापन भी नियत समय के अंदर कराया जाता है।
महा सप्तमी को मां चामुंडा की पूजा-अर्चना की जाती है। मलूटी में सोमवार को अष्टमी पर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन संधि पूजन अनुष्ठान भी किया जाएगा है जिसमें पाठा की बलि दी जाती है।
जबकि नवमी के दिन पूजन, हवन व बलि की परंपरा है। मलूटी के छय तरफ हिस्से में आयोजित पूजा में गन्ना, कुमड़ा ही नहीं भैंसा, पाठा, भेड़ की बलि देने की परंपरा है।
दशमी के दिन मलूटी मां के प्रागंण मेला का आयोजन और गांव के दोनों सार्वजनिक दुर्गा पूजा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। एकादशी के दिन से विजया प्रणाम की परंपरा शुरू होती है जो काली पूजा तक चलता है।
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सौ मंदिरों का गांव मलूटी
झारखंड के दुमका जिले में स्थित मलूटी को 'सौ मंदिरों का गांव' कहा जाता है क्योंकि कभी यहाँ टेराकोटा शैली में बने 108 प्राचीन मंदिर हुआ करते थे, जिनमें से कई आज भी मौजूद हैं। इतिहास के अनुसार, यह कभी बाज बसांत राजवंश की राजधानी थी, जहाँ के राजा भव्य महल की जगह भगवान शिव के मंदिर बनवाने में आस्था रखते थे।
बंगाल की 'चारीशाला' और 'आठशाला' शैली में बने इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण और महाभारत की कथाओं को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। आज यह ऐतिहासिक धरोहर देश-विदेश के पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है।
