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उरांव समाज में दो दिनों तक श्रद्धा से मनाया जाता है जिउतिया पर्व, सूर्य और पीपल की पूजा का विशेष महत्व

Published: Sat, 03 Oct 2026 10:23 PM (IST)

Jitiya Festival: बोकारो में सनातनी उरांव आदिवासी समाज द्वारा जिउतिया पर्व दो दिनों तक श्रद्धा और पारंपरिक विधि-विधान से मनाया जाता है।

Jitiya Festival: बोकारो में जिउतिया पर्व मनातीं उरांव समाज की महिलाएं।। (फोटो जागरण)

Jitiya Festival: बोकारो में जिउतिया पर्व मनातीं उरांव समाज की महिलाएं।। (फोटो जागरण)

HighLights

  1. जिउतिया पर्व दो दिनों तक श्रद्धा और विधि-विधान से मनाया जाता है।

  2. सूर्य और पीपल की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

  3. नई पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।

बीके पाण्डेय, बोकारो। सनातनी उरांव आदिवासी समाज में जिउतिया पर्व श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक विधि-विधान के साथ दो दिनों तक मनाया जाता है। नहाय-खाय से पहले घर की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारी की जाती है। पहले दिन व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास रखने के बाद संध्या में सूर्य को अर्घ्य देती हैं।

दूसरे दिन भी व्रती निर्जल उपवास रखकर पीपल की डाली स्थापित कर उसकी पूजा करती हैं। पूजा के दौरान अंकुरित होने वाले अनाज की विशेष रूप से पूजा की जाती है। अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

पर्व की पूजा पद्धति में सूर्य और पीपल की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। यहां समाज के पाहन या महिलाएं वर्तियों को कथा सुनाती हैं।

मड़ुआ, नोनी साग और मौसमी सब्जियों का होता है सेवन

जिउतिया पर्व के दौरान मड़ुआ के आटे, नोनी साग समेत अन्य मौसमी सब्जियों का सेवन पारंपरिक रूप से किया जाता है। व्रती पूजा के दौरान परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की लंबी आयु की कामना करती हैं। समाज के लोगों के अनुसार जिउतिया का संबंध गंधर्वराज जीमूतवाहन की कथा से भी जुड़ा है।

करमा पर्व की तरह जिउतिया भी सनातनी और सरना परंपराओं में आस्था के साथ मनाया जाता है। पर्व के माध्यम से आदिवासी समाज की धार्मिक मान्यताओं, प्रकृति के प्रति आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की झलक मिलती है। सूर्य और पीपल की पूजा प्रकृति के साथ समाज के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।

नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने का माध्यम

समाज की रिंकी देवी ने बताया कि जिउतिया उनके लिए केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और आस्था का प्रतीक है। नहाय-खाय से पहले घर की साफ-सफाई करने के बाद पूरे विधि-विधान से पर्व की शुरुआत की जाती है।

वहीं दुर्गी देवी ने कहा कि जिउतिया के दौरान पीपल की डाली स्थापित कर पूजा करने और अंकुरित अनाज को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है। दोनों ने कहा कि इस पर्व के माध्यम से नई पीढ़ी को आदिवासी समाज की धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का अवसर भी मिलता है।

उन्होंने कहा कि बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद समाज की महिलाएं इस पारंपरिक पर्व की पूजा पद्धति को पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। परिवार की बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी की बेटियों और बहुओं को जिउतिया की विधि, कथा और परंपराओं की जानकारी देती हैं। इससे पर्व की सांस्कृतिक विरासत आगे भी कायम रहने की उम्मीद है।

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