वैष्णो देवी धाम जाने का है एक और मार्ग, अधिकतर लोग नहीं जानते ये बात; रास्ते में आते हैं कई प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर
माता वैष्णो देवी धाम जाने का एक और प्राचीन मार्ग है, जो जम्मू के नगरोटा स्थित कोल कंडोली मंदिर से शुरू होकर कटड़ा तक जाता है।

फोटो एआई की मदद से जनरेट की गई है।
HighLights
कोल कंडोली से कटड़ा तक 48 किमी प्राचीन मार्ग
मार्ग पर कई ऐतिहासिक मंदिर और मनोरम स्थल मौजूद
सरकार ने विकास के लिए 15 करोड़ रुपये मंजूर किए
अशोक शर्मा, जम्मू। नवरात्र पर माता वैष्णो देवी के यात्रा मार्ग पर कटड़ा से भवन तक श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा है, लेकिन आज भी अधिकांश भक्तों को यह पता नहीं है कि यात्रा का पारंपरिक व प्राचीन मार्ग जम्मू के नगरोटा स्थित कोल कंडोली मंदिर से शुरू होता है, जो बमियाल, ओली व देवा माई होते हुए कटड़ा जाता है।
48 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर कई प्राचीन व ऐतिहासिक मंदिर हैं। इसके अलावा रास्ते में कई मनोरम स्थल, पहाड़ व ऊंचे-ऊंचे पेड़ श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। मान्यता है कि माता इसी प्राचीन मार्ग से होते हुए त्रिकुटा पर्वत पर पहुंची थीं।
हालांकि बीच-बीच में कई स्थानीय श्रद्धालु इस मार्ग से होते और मंदिरों के दर्शन करते वैष्णो देवी की यात्रा पर जाते हैं, लेकिन अब इस रास्ते को नई पहचान देकर देशभर के श्रद्धालुओं के लिए भी शुरू करने का काम जारी है।
कटड़ा से भवन तक मार्ग को ही माना जाता है पारंपरिक
हालांकि अधिकतर श्रद्धालु कटड़ा से भवन तक मार्ग को ही पारंपरिक मार्ग मानते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत नगरोटा से होती है। जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से हाल ही मां वैष्णो देवी के इस पारंपरिक मार्ग को विकसित करने के लिए 15 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
जम्मू के नगरोटा से आगे बमियाल और कटड़ा में नोमाईं क्षेत्र तक इस प्राचीन मार्ग को चौड़ा व कच्चा तैयार कर दिया गया है। कई जगह पुलियां भी डाली गई हैं। अब इस पर तारकोल डालने का काम बाकी है।
नोमाईं क्षेत्र से आगे कटड़ा तक रास्ता फोरलेन है। हालांकि पारंपरिक मार्ग अभी पूरी तरह तैयार नहीं है, लेकिन आना-जाना संभव है। उम्मीद है कि जल्द यह मार्ग आकार ले लेगा।
बता दें कि पिछले वर्ष उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की ओर से कोल कंडोली मंदिर से इस पारंपरिक मार्ग से होते हुए एक छड़ी यात्रा को भी रवाना किया गया था।
धार्मिक पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
गांव गुंडला के बृज मोहन शर्मा ने कहा कि इस प्राचीन मार्ग पर ऐसे अनेक मंदिर, शिवालय, बावड़ियां और सराय हैं, जो श्रद्धालुओं का यात्रा का नया अनुभव देंगे।
वहीं, श्री माता वैष्णो देवी श्राइन संस्था के प्रधान हरबंस लाल ने कहा कि यह मार्ग शुरू होने से क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे यात्रा के पहले पड़ाव कोल कंडोली और देवामाई की लोप्रियता भी बढ़ेगी।
धार्मिक स्थलों को मिलेगी विशेष पहचान
देवयानी नगरोटा की विधायक देवयानी राणा ने कहा कि उनके पिता व पूर्व स्व. भाजपा विधायक देवेंद्र राणा ने प्राचीन मार्ग को दोबारा शुरू करने का बीड़ा उठाया था। 15 करोड़ की मंजूरी से लगता है कि उनका सपना पूरा होगा। इससे पूरे क्षेत्र के धार्मिक स्थलों को विशेष पहचान मिलेगी।
...आइए ले चलें पारंपरिक मार्ग से मां के भवन
जम्मू-श्रीनगर हाईवे बनने से पहले इसी प्राचीन मार्ग से श्रद्धालु मां वैष्णो देवी की यात्रा पर जाते थे। समय के साथ यात्रा के साधन और रास्ते बदल गए, लेकिन प्राचीन मार्ग पर ऐतिहासिक स्थलों व मंदिरों का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व आज भी कायम है।
- जम्मू से करीब 14 किलोमीटर दूर नगरोटा में कोल कंडोली मंदिर को माता वैष्णो देवी की यात्रा का पहला दर्शन माना जाता है। मान्यता है कि मां यहां पांच वर्ष की आयु में कन्या के रूप में प्रकट हुईं और 12 वर्ष तक यहां तपस्या की। यहां मां पिंडी रूप में विराजमान हैं।
- जगदंबा मंदिर इस प्राचीन मार्ग का एक अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव है। मान्यताओं के अनुसार, कोल कंडोली से आगे बढ़ने के बाद मां ने यहां विश्राम किया था। यहां बनी सीढ़ीदार बावड़ी कभी श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के लिए पानी का प्रमुख स्रोत थी।
- पंगाली गांव में स्थित मां दुर्गा का मंदिर और इसकी पांच कक्षों वाली बावड़ी इस क्षेत्र की जल-संरक्षण परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1909 के आसपास लाला सुरजन मल ने श्रद्धालुओं को पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बावड़ी और मंदिर का निर्माण करवाया था।
- दराबी गांव के प्राचीन शिव मंदिर को स्थानीय रानी द्वारा श्रद्धालुओं के लिए बनवाया था। इसके निकट खत्रियां दा खूह नामक कुआं है।
- गुंडला का काली मां का मंदिर और शिव शक्ति मंदिर इस मार्ग की धार्मिक विविधता को दर्शाते हैं। मंदिर के आसपास पुरानी सराय और अन्य निर्माणों के अवशेष इस बात के संकेत करते हैं कि तीर्थयात्रियों के ठहरने और सुविधाओं के लिए भी इस मार्ग पर व्यवस्थाएं मौजूद थीं।
- बमियाल क्षेत्र का ऊपरी शिव मंदिर अपनी चित्रकला के लिए विशेष महत्व रखता है। मंदिर की दीवारों पर बने चित्रों में भगवान शिव को नंदी पर विराजमान तथा मां गौरी और मां गंगा के साथ दर्शाने वाला चित्र विशेष उल्लेखनीय हैं। स्थानीय पत्थरों और चूने के गारे से निर्मित मंदिर डोगरा क्षेत्र की पारंपरिक निर्माण शैली और कलात्मक अभिव्यक्ति का परिचायक है।
- छपानू क्षेत्र में ओली महालक्ष्मी मंदिर इस प्राचीन तीर्थ परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 1878 में निर्मित इस मंदिर की वास्तुकला में देवी लक्ष्मी की प्रतिमा उल्लेखनीय हैं।
- कटड़ा से सात किमी पहले नोमाईं में देवा माई के मंदिर को माता की यात्रा का दूसरा दर्शन माना जाता है। मंदिर में काले पत्थर से निर्मित आठ भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा है। धार्मिक परंपरा में कोल कंडोली मंदिर के बाद देवा माई, चरण पादुका, आद्कुंवारी, भवन और भैरव घाटी के दर्शन की मान्यता है।
