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370 हटने के 7 साल: मीरवाइज से लेकर बिलाल लोन तक... कैसे बदला माहौल, क्यों ठंडा पड़ा कश्मीर बनेगा पाकिस्तान का नारा?

Published: Wed, 05 Aug 2026 08:00 AM (IST)Updated: Wed, 05 Aug 2026 05:08 PM (IST)

अनुच्छेद 370 हटने के सात साल बाद जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और आतंकी हिंसा में भारी कमी आई है, जिससे राजनीतिक विमर्श भी बदल गया है।

अनुच्छेद 370 के 7 साल: कैसे बदला कश्मीर का राजनीतिक विमर्श?

अनुच्छेद 370 के 7 साल: कैसे बदला कश्मीर का राजनीतिक विमर्श?

HighLights

  1. अलगाववाद और आतंकी हिंसा में भारी कमी आई है।

  2. कश्मीर का राजनीतिक विमर्श विकास केंद्रित हो गया है।

  3. लोगों का विश्वास जीतना और राज्य का दर्जा चुनौती।

नवीन नवाज, श्रीनगर। पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35ए के निरस्तीकरण के साथ जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक, सुरक्षा और सामाजिक परिदृश्य में जिस बदलाव की शुरुआत हुई थी, सात वर्ष बाद उसकी तस्वीर पहले से बिल्कुल अलग नजर आती है।

अलगाववाद का प्रभाव सिमटा है, आतंकी हिंसा चार दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंची है और कश्मीर का राजनीतिक विमर्श भी पूरी तरह बदल चुका है। इसके बावजूद राजनीतिक विश्वास, सुरक्षा और शासन से जुड़ी कई चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।

कभी कश्मीर की आजादी का नारा बुलंद करने वाली हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन मीरवाइज मौलवी उमर फारूक अब स्वयं को हुर्रियत का चेयरमैन नहीं बताते। अलगाववादी नेता बिलाल गनी लोन मुख्यधारा की राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं।

प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के कई वरिष्ठ नेताओं ने संगठन से दूरी बनाकर भारतीय संविधान में आस्था जताते हुए जनकल्याण केंद्रित नया राजनीतिक दल गठित किया है। ये घटनाक्रम संकेत देते हैं कि घाटी की राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है।

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4 अगस्त को लाल चौक पर उमड़े लोग। फोटो जागरण

बंद, हड़ताल और पथराव अब अतीत की बात

पांच अगस्त 2019 से पहले कश्मीर में बंद, हड़ताल, पथराव, आतंकियों के जनाजों में पाकिस्तानी झंडे लहराती भीड़ और स्कूल-कॉलेजों पर ताले आम दृश्य थे। आज यह सब लगभग इतिहास बन चुका है।

श्रीनगर के लाल चौक से लेकर नियंत्रण रेखा (एलओसी) तक सामान्य जनजीवन और पर्यटकों की मौजूदगी इस बदलाव की गवाही देती है। अब कश्मीर आतंक, अराजकता और राजनीतिक अस्थिरता की पहचान से धीरे-धीरे बाहर निकलता दिखाई देता है।

बदल चुका है राजनीतिक विमर्श

घाटी की राजनीति में भी बड़ा परिवर्तन आया है। आजादी, पाकिस्तान में विलय, अधिक स्वायत्तता और सेल्फ रूल जैसे मुद्दे अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं हैं। उनकी जगह राज्य का दर्जा, आरक्षण, रोजगार और विकास जैसे विषयों ने ले ली है।

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आज आम लोग पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) की परिस्थितियों से तुलना करते हुए भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के विलय को सही, स्वाभाविक और तर्कसंगत बताते हैं। वे यह भी सवाल उठाते हैं कि जिस पीओजेके की स्थिति आज सामने है, क्या उसी भविष्य के लिए कभी 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' के नारे लगाए जाते थे।

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विश्वास की कमी बनी चुनौती

हालांकि, बदलाव के बावजूद एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। केंद्र सरकार अभी तक बड़ी संख्या में लोगों को यह पूरी तरह विश्वास नहीं दिला सकी है कि पांच अगस्त 2019 के फैसले से उनके व्यक्तिगत जीवन में क्या ठोस परिवर्तन आया।

यही कारण है कि कई क्षेत्रीय दल आज भी अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए हैं। पीडीपी और पीपुल्स कांफ्रेंस जैसे दल पांच अगस्त को विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस भी इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराती है, हालांकि उसका रुख अपेक्षाकृत संतुलित है।

दूसरी ओर आम लोगों की प्राथमिकता राज्य का दर्जा (स्टेटहुड) है। वे इसके राजनीतिक निहितार्थों से अधिक इसकी बहाली की समयसीमा जानना चाहते हैं, क्योंकि इससे प्रदेश के प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे पर सीधा असर पड़ेगा। पंचायत और नगर निकाय चुनाव, नामित विधायकों का मुद्दा तथा बिजनेस रूल भी वर्तमान राजनीतिक चुनौतियों का हिस्सा हैं।

आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं

बदलाव पर सवाल उठाने वाले अक्सर हाल की आतंकी घटनाओं का हवाला देते हैं। पहलगाम में पुलिसकर्मी की हत्या, कुलगाम में छत्तीसगढ़ के दो श्रमिकों की हत्या, 22 अप्रैल 2025 का बैसरन नरसंहार और जम्मू संभाग के राजौरी, पुंछ, डोडा, रामबन तथा कठुआ में हुई आतंकी गतिविधियां सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करती हैं। इन घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन समग्र तस्वीर देखें तो आतंकवाद का प्रभाव उल्लेखनीय रूप से कम हुआ है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार वर्ष 2022 से 2025 के बीच आतंकी घटनाएं 151 से घटकर 35 रह गईं, यानी लगभग 77 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। इसी अवधि में मारे गए आतंकियों की संख्या 93 से घटकर 46 और शहीद सुरक्षा कर्मियों की संख्या 30 से घटकर 17 रह गई।

दीर्घकालिक आंकड़े भी इसी बदलाव की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2009 से चार अगस्त 2019 तक जम्मू-कश्मीर में 1,435 आतंकी घटनाएं हुईं, जिनमें 382 नागरिक, 672 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 1,827 आतंकी मारे गए। वहीं पांच अगस्त 2019 से एक अगस्त 2026 तक 652 आतंकी घटनाओं में 193 नागरिकों की मौत हुई, 213 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 858 आतंकी मारे गए।

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ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का प्रभाव काफी हद तक सिमट चुका है, लेकिन इसे समाप्त मान लेना बड़ी भूल होगी। लक्षित हत्याएं, सीमा पार से घुसपैठ और हथियारों की तस्करी आज भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की ढिलाई पिछले सात वर्षों की उपलब्धियों पर पानी फेर सकती है।

विकास बना बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक

कश्मीर में आए बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक चिनाब नदी पर बना दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल और उस पर दौड़ती वंदे भारत ट्रेन है। शायद ही कोई ऐसा कश्मीरी हो जो इस परियोजना की सराहना न करता हो। यहां तक कि अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करने वाले राजनीतिक दल भी इस उपलब्धि की प्रशंसा करते हैं।

सरकारी तंत्र में कभी प्रभाव रखने वाले अलगाववादी समर्थक अब लगभग गायब हो चुके हैं। राजनीतिक रैलियां खुलकर हो रही हैं, लोग तिरंगा लेकर बिना किसी भय के सड़कों पर निकलते हैं और आम नागरिकों में भविष्य को लेकर नई उम्मीद दिखाई देती है।

फिर भी सबसे बड़ी चुनौती अभी बाकी है। आम लोगों के मन में स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व की निष्ठा और प्रतिबद्धता को लेकर संदेह बना हुआ है। यदि इस अविश्वास को दूर नहीं किया गया तो पिछले सात वर्षों में हासिल कई उपलब्धियां अपेक्षित राजनीतिक स्थिरता में पूरी तरह परिवर्तित नहीं हो पाएंगी।

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