अनुच्छेद 370 हटने के 7 साल: बंदूक-बारूद नहीं, अब UPSC-डॉक्टर की तैयारी, कश्मीर में कैसे बदली युवाओं के सपनों की तस्वीर?
कश्मीर के युवा अब आतंकवाद और अलगाववाद के बजाय यूपीएससी और डॉक्टर बनने जैसे करियर लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर ...और पढ़ें
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4 अगस्त को श्रीनगर के लाल चौक पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और पर्यटक उमड़े। फोटो जागरण
HighLights
कश्मीर के युवा अब करियर पर केंद्रित हैं।
अनुच्छेद 370 के बाद क्षेत्र में शांति बढ़ी।
पत्थरबाजी, हड़ताल की यादें धुंधली पड़ गईं।
नवीन नवाज, श्रीनगर। झेलम में अब खून नहीं बहता, अब पानी बहता है, कश्मीर के गली-बाजारों मे आजादी के नारे लगाती भीड़ और बाारूद की गंध के स्थान पर अब पर्यटकों कों हंसी ठहाके गूंजते हैं। स्कूलों की घंटी अब रोज सुबह बजती है, मां-बाप बच्चों को बिना किसी भय के स्कूल के लिए रवाना कर रहे हैं।
रेस्तरां और पार्क में बैठे युवा अब आकिब नबी की गेंदबाजी, यूपीएससी की तैयारी और जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन की चर्चा के साथ साथ कश्मीर के राजनीतिक दलों की नीतियों पर बहस करता नजर आता है।
किसी भी 17-18 वर्ष के किशोर से पूछो कि कश्मीर में क्या चल रहा है तो वह कहेगा कि सब ठीक है, मस्त चल रहा है। क्या करना चाहते हो तो वह अपने भविष्य की योजनाएं साझा करेगा और राय लेगा। जब उससे पूछोगे कि यहां अंतिम बार हड़ताल कब हुई थी, क्या आजादी का नारा लगाती भीड़ देखी है तो कहेगा कि कुछ-कुछ याद है, लेकिन उसका मुझसे कोई सरोकार नहीं है।
युवाओं की जुबानी, अनुच्छेद 370 की कहानी
मैसूमा का रहने वाला रिजवान इसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जो पैदायश 2008 या उसके बाद हुई है। यह वह पीढ़ी है जो कश्मीर में आतंकवाद, अलगाववाद के दौर और मानसिकता से पूरी तरह स्वतंत्र हो अपने सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रही है।
रिजवान ने कहा कि सच पूछो तो मुझे सिर्फ इतना याद है कि पांच अगस्त 2019 को कर्फ्यू लगा था और सारे फोन बंद थे। हमारे मोहल्ले में जेकेएलएफ के अलावा पीपुल्स पॉलिटिकल पार्टी के लोग रहते थे, उनके घरों में छापे पड़े थे। स्कूल बंद हो गए थे, उससे पहले भी यदा कदा ही खुलते थे। उसके बाद मैने यहां कभी कोई प्रदर्शन नहीं देखा, स्कूल सामान्य रूप से खुलते हैं।
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मैंने कोई कर्फ्यू भी बाद में नहीं देखा। मेरे पिता जो बैंककर्मी हैं, अक्सर कहते हैं कि मैं खुशनसीब हूं जो बिना किसी डर के यहां घूमता हूं। आर्टिकल 370 क्या होता है, यह मुझे तब नहीं पता था, अब पता है और मेरे लिए अब इसका होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। मैसूमा को कभी कश्मीर में गाजा पट्टी कहा जाता था, क्योंकि यहा आए दिन हिंसक प्रदर्शन और पथराव की घटनाएं होती थीं।
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अच्छा! यहां एनकाउंटर होता था
नासिर नामक एक 22 वर्षीय स्थानीय युवक ने हंसते हुए कहा कि मैं तब नौंवी में पढ़ता था और कई बार पत्थरबाजी भी की, लेकिन अब मुझे वह याद ही नहीं है। जब मैंने अपने छोटे भाई-बहनों को या रिश्तेदारी में जो मुझसे छोटे हैं, उनहें बताता हूं तो वह हंसते हैं और कहते हैं कि अच्छा यहां ऐसा था।
आठवीं कक्षा के छात्र आमिर से जब पूछा कि क्या कभी उसने हड़ताल देखी है, उसके स्कूल को कभी किसी ने बंद कराया है तो उसने मन में जवाब देते हुए कहा कि कोरोना में स्कूल बंद हुआ था और अब कुछ दिन पहले बारिश के कारण स्कूल में छुट्टी हुई थी।
उसने अपने पिता शब्बीर हुसैन की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वह कभी-कभी बातचीत में बताते हैं कि यहां एनकाउंटर होता था, यहां टीयरगैस चलती थी कई बार हमारे घर में धुंआं-धुआं हो जाता था। शाम को घर से नहीं निकलते थे।
लेकिन अब तो लगभग हर रात हम सभी लालचौक में आइसक्रीम का मजा लेने जाते हैं या फिर डल की तरफ घूमन जाते हैं। यह पूछे जाने पर कि वह आगे क्या करना चाहता है तो उसने कहा कि मैं यूपीएससी की तैयारी करूंगा या फिर डॉक्टर बनूंगा।
अब हम करियार की बात करते हैं, आजादी की नहीं
यूपीएससी की तैयारी कर रहे गुफरान नामक एक युवक ने हंसते हुए कहा कि जब अनुच्छेद 370 हटा था, मैं दसवीं में था। मैंने आतंकी बुरहान के मारे जाने पर यहां हुई हड़ताल, पत्थरबाजी को देखा है, तब मैं सातवीं का छात्र था।
अब सच पूछो तो वह दौर हमें तभी याद आता है, जब कोई हमउम्र या हमसे बड़ा कोई हमारे साथ कश्मीर के हालात पर चर्चा करता है। अब वह किस्से कहानियों का दौर हो चुका है। उसने कहा कि अगर आप कहेंगे कि यहां हम आज राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा नहीं करते या फिर आतंकी हिंसा या अलगाववाद को लेकर बात नहीं होती तो गलत होगा।
हमारे मां-बाप या हम जैसे कइयों के जीवन तो पत्थरबाजी, आतंकवाद से प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से जुड़ा रहा है। हम लोग भी राजनीतिक मुद्दों पर बात करते हैं, लेकिन उससे ज्यादा हमारी प्राथमिकता करियर है। हम उस पुराने दौर को अपने साथ लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहते।
अब हम तिरंगे की बात करते हैं
कश्मीर मामलों के जानकार सलीम रेशी ने कहा कि बच्चे जो देखते हैं, उसका उन पर असर होता है। वर्ष 2014 मेरी छोटी बेटी नारा लगाती थी अब की बार मोदी सरकार, मैंने चुनाव लड़ा तो मेरे समर्थक नारा लगाते थे अब की बार सलीम की सरकार, मेरी बेटी भी यही कहती थी।
वर्ष 2016 के हिंसक प्रदर्शनों का उस पर असर हुआ था। वह भी कई बार आजादी का नारा लगाती थी, क्योंकि बाहर गली में यही गूंज रहा था। आज मेरी बेटी तिरंगे की बात करती है, दिल्ली में लाल किले की बात करती है, डॉक्टर कैसे बनते हैं, यह पूछती है। हम उस समय तरसते थे कि हमारे बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे, आज बेखौफ स्कूल जा रहे हैं।
चिंता बंदूक नहीं, बेरोजगारी की है
कश्मीर मामलों के एक अन्य जानकार रमीज मखदूमी ने कहा कि कश्मीर की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां अतीत की त्रासदियां और वर्तमान की आकांक्षाएं आमने-सामने दिखाई देती हैं।
तीन दशक से अधिक समय तक हिंसा, उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता ने जिस पीढ़ी को गढ़ा, उसकी जगह अब ऐसे युवा ले रहे हैं जिनकी सबसे बड़ी चिंता बंदूक नहीं, बल्कि बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं और भविष्य की अनिश्चितता है।
यह बदलाव केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। सत्ता और अलगाववादी विमर्श, दोनों लंबे समय तक भावनात्मक स्मृतियों पर टिके रहे, लेकिन नई पीढ़ी रोजगार, निवेश, शिक्षा और सुशासन के ठोस सवाल पूछ रही है।
इसका अर्थ यह नहीं कि अनुच्छेद 370, राज्य का दर्जा या राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे विवाद अप्रासंगिक हो गए हैं। बल्कि चुनौती यह है कि क्या राजनीति इन मुद्दों के साथ-साथ युवाओं की आर्थिक आकांक्षाओं का भी विश्वसनीय जवाब दे पाएगी।
यही परिवर्तन कश्मीर की नई राजनीतिक दिशा तय करेगा, जहां अतीत की स्मृतियां प्रभावशाली रहेंगी, लेकिन भविष्य का एजेंडा युवाओं की आकांक्षाएं निर्धारित करेंगी।
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