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वैष्णो देवी-अमरनाथ धाम सहित 15 स्थलों पर सीमित होगी श्रद्धालुओं की संख्या, जम्मू-कश्मीर में नई पर्वतीय नीति तैयार

Published: Fri, 30 Oct 2026 08:37 AM (IST)

जम्मू-कश्मीर के नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों को प्राकृतिक आपदाओं और बढ़ते पर्यटन से बचाने के लिए नई 'सतत पर्वतीय विकास नीति' तैयार की गई है।

जम्मू-कश्मीर में नई पर्वतीय नीति तैयार, सीमित होगी यात्रियों की संख्या (जागरण ग्राफिक्स)

जम्मू-कश्मीर में नई पर्वतीय नीति तैयार, सीमित होगी यात्रियों की संख्या (जागरण ग्राफिक्स)

HighLights

  1. पर्वतीय क्षेत्रों को आपदा व पर्यटन दबाव से बचाने की नीति

  2. प्रमुख धार्मिक व पर्यटन स्थलों पर संख्या सीमित करने का प्रस्ताव

  3. अनियंत्रित निर्माण पर रोक और हिमनद संरक्षण के उपाय

नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों को प्राकृतिक आपदाओं और बढ़ते पर्यटन के दबाव से बचाने के लिए नई ‘सतत पर्वतीय विकास नीति’ तैयार की गई है।

इस नीति में प्रमुख पर्यटन स्थलों और धार्मिक यात्रा मार्गों पर प्रतिदिन पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करने, अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाने तथा हिमनदों के संरक्षण के लिए विशेष उपाय करने का प्रस्ताव है। 

यह नीति शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर और नई दिल्ली स्थित इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव (आइएमआइ) ने तैयार की है।

इसके मसौदे में विश्वविद्यालय के कुलपति सहित कम से कम आठ प्राध्यापकों का योगदान रहा है। नीति की समीक्षा शिमला स्थित भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद, गुजरात के अटल बिहारी वाजपेयी नीति अनुसंधान एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, उत्तराखंड के जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान और ब्रिटेन की संस्था सिस्टमइक ने की है।

विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, नीति के मसौदे को आम जनता की राय एवं सुझावों के लिए सार्वजनिक किया जा रहा है। हिमालयी क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और पूर्वोत्तर के कई राज्य शामिल हैं। नीति में पूरे क्षेत्र को एशिया का महत्वपूर्ण जल स्रोत, वैश्विक जैव विविधता का केंद्र और करोड़ों पर्वतीय निवासियों की सांस्कृतिक विरासत का आधार बताया गया है।

जम्मू-कश्मीर को इस पहल को प्रायोगिक मॉडल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है, ताकि अन्य हिमालयी राज्य और केंद्र सरकार भी इससे सीख लेकर ऐसी नीतियां अपना सकें।

नीति का क्रियान्वयन तीन चरण में होगा। पहले 100 दिनों में शुरुआती कदम, एक वर्ष में कानूनी एवं संस्थागत ढांचा और पांच वर्षों में मापने योग्य बदलाव लाने का लक्ष्य तय किया है।

पर्वतीय क्षेत्रों में नदी-नालों के तल, जल निकासी मार्गों, हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों और भूस्खलन के अत्यधिक जोखिम वाले लाल संकेतित क्षेत्रों में शिविर, लंगर, तंबू और दुकानें लगाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है।

 

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एक वर्ष के भीतर कानून बनाने का प्रस्ताव

प्रस्तावित नीति को मंत्रिमंडल से मंजूरी के बाद अधिसूचित किया जाएगा। साथ ही, अगले एक वर्ष के भीतर ‘जम्मू-कश्मीर सतत पर्वतीय विकास अधिनियम’ लाने का प्रस्ताव है।

इसके तहत जम्मू-कश्मीर पर्वतीय विकास परिषद गठित की जाएगी, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करेंगे। परिषद के कार्यकारी निकाय के रूप में एक समर्पित पर्वतीय विकास प्राधिकरण बनाने का भी प्रस्ताव है।

नीति में पर्वतीय क्षेत्रों को संवेदनशीलता के आधार पर चार क्षेत्रों में बांटने और प्रत्येक प्रमुख पर्यटन एवं तीर्थस्थल की पर्यावरणीय क्षमता के अनुसार श्रद्धालुओं की संख्या निर्धारित करने की सिफारिश की गई है।

श्रीअमरनाथ और मां वैष्णो देवी यात्रा पर भी विशेष व्यवस्था

नई नीति में प्रमुख धार्मिक यात्राओं के लिए वैज्ञानिक आधार पर प्रतिदिन श्रद्धालुओं की संख्या निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य तीर्थयात्राओं को पर्यावरण के अनुकूल बनाना है।

इसमें श्रीअमरनाथ यात्रा, श्री माता वैष्णो देवी यात्रा, मचैल माता, शिवखोड़ी, बुड्ढा अमरनाथ, कैलाश कुंड, सरथल देवी, कौसर नाग, बाबा रेशी, चरार-ए-शरीफ, बाबा जैनुद्दीन वली, तत्ता पानी और हरमुख-गंगबल सहित अन्य पर्वतीय तीर्थ मार्गों को शामिल किया गया है।

15 प्रमुख पर्यटन स्थलों की क्षमता का होगा आकलन

नीति के अनुसार, पर्यटन, वन, सड़क एवं भवन निर्माण विभाग और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को एक वर्ष के भीतर अधिक दबाव वाले पंद्रह प्रमुख पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का अध्ययन करेगा।

इनमें गुलमर्ग, पहलगाम के अरू, बीटाब घाटी और चंदनवाड़ी, सोनमर्ग का थाजीवास, दूधपथरी, युसमर्ग, गुरेज, बंगस, सिंथनटाप, पटनीप, कटड़ा, पाडर, बसोहली, भद्रवाह और ग्रेट लेक्स पदयात्रा मार्ग सहित अन्य प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।

अध्ययन पूरा होने तक प्राधिकरण को सौ दिनों के भीतर अस्थायी दैनिक सीमा निर्धारित करनी होगी। यह सीमा पार्किंग, सड़क व्यवस्था और स्वच्छता सुविधाओं की क्षमता के आधार पर तय की जाएगी। प्रस्तावित नीति में सभी आगंतुकों के पंजीकरण के लिए एक साझा ऑनलाइन 'जम्मू-कश्मीर पर्वतीय प्रवेश-पत्र' मंच बनाने की भी सिफारिश की गई है।

इसके माध्यम से पर्यटक और श्रद्धालु पंजीकरण कर सकेंगे। व्यस्त पर्यटन स्थलों के लिए समय निर्धारित कर सकेंगे और इलेक्ट्रानिक प्रवेश-पत्र प्राप्त कर सकेंगे। इस मंच पर पर्यावरण उपकर जमा करने, मौसम एवं आपदा संबंधी चेतावनियां जारी करने और आगंतुकों का अभिलेख रखने की सुविधा भी प्रस्तावित है।

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