जम्मू-कश्मीर विधानसभा से पास हुआ स्टेटहुड का प्रस्ताव, अब मुख्य सचिव के पाले में गेंद; क्या होगा केंद्र का फैसला?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव पारित होने के बाद अब यह मामला प्रशासनिक गलियारों में पहुंच गया है।

अमित शाह और उमर अब्दुल्ला (फाइल फोटो)
HighLights
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाली प्रस्ताव पारित
मुख्य सचिव अटल डुल्लू की भूमिका पर सबकी निगाहें
अधिकारियों ने प्रस्ताव पर चर्चा का पहले किया था विरोध
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी प्रस्ताव पारित होने के बाद अब विवाद का केंद्र विधानसभा से निकलकर प्रशासनिक गलियारों तक पहुंच गया है।
प्रस्ताव पारित होने के बावजूद सबसे बड़ा सवाल यह है कि विधानसभा सचिवालय से प्राप्त प्रस्ताव पर मुख्य सचिव अटल डुल्लू आगे क्या कार्रवाई करते हैं और क्या इसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा।
क्योंकि सोमवार को प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान स्वयं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने खुलासा किया था कि मुख्य सचिव अटल डुल्लु और विधि एवं संसदीय मामलों के सचिव अचल सेठी ने अलग अलग पत्र लिखकर विधानसभा स्पीकर को राज्य के दर्जे की बहाली के प्रस्ताव पर सदन में चर्चा कराने या पारित करने के लिए स्वीकार न करने की सलाह दी थी। दोनों अधिकारियों ने स्टेटहुड संबंधी मामले के अदालत में विचाराधीन होने का तर्क दिया है।
भारत सरकार को भेजा जाएगा प्रस्ताव
हालांकि, विधानसभा सचिवालय के मनोज पंडित ने स्टेटहुड बहाली के प्रस्ताव को सदन द्वारा स्वीकार किए जाने की औपचारिक जानकारी के साथ प्रस्ताव को आवश्यक कार्रवाई” के लिए भेज दिया है। हालांकि, पत्र में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि प्रस्ताव को भारत सरकार को भेजा जाए। इसी शब्दावली ने अब प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है।
दो वरिष्ठ नौकरशाहों ने स्टेटहुड बहाली के प्रस्ताव को सदन में पेश किए जाने का विरोध किया है, यह रहस्य ही रहता, यदि स्वयं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी सरकार के पास सीमित अधिकारों और बीते दो वर्ष से बिजनेस रुल्स को मंजूरी न मिलने से होने वाली दिक्कतों का जिक्र न करते।
उन्होंने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश होने का क्या मतलब होता है, यह इस बात से पता चलता है कि एक मुख्य सचिव और विधि सचिव मेरी जानकारी के बिना ही सीधे स्पीकर को पत्र लिखकर कहते हैं कि स्टेटहुड के प्रस्ताव पर चर्चा नहीं होनी चाहिए, इसे पारित नहीं किया जाना चाहिए।
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सीएम के पास कानून विभाग का प्रभार भी
उमर अब्दुल्ला के पास कानून विभाग का प्रभार भी है। उन्होंने विधानसभा में कहा कि उन्हें अधिकारियों द्वारा भेजे गए पत्र की पहले से जानकारी नहीं थी और विधानसभा सचिवालय से जानकारी मिलने के बाद उन्हें इसका पता चला। मुख्यमंत्री ने सवाल किया कि जब वह मुख्यमंत्री होने के साथ कानून मंत्री भी हैं, तो उनकी जानकारी के बिना कानून विभाग के अधिकारी उनके द्वारा विधानसभा में पेश किए गए प्रस्ताव के संबंध में सदन को अपनी राय कैसे भेज सकते हैं।
अब्दुल्ला ने इस घटनाक्रम को जम्मू-कश्मीर के मौजूदा संवैधानिक दर्जे से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी स्थिति किसी पूर्ण राज्य में संभव है या नहीं, इस पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिलाना लोगों की मांग और अधिकार से जुड़ा विषय है।
विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने अधिकारियों की ओर से भेजे गए पत्रों पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि विधानसभा के विधायी कामकाज को प्रभावित करने के लिए नौकरशाही की ओर से इस तरह का पत्र भेजे जाने की कोई मिसाल उनके सामने नहीं है।
सदन के समक्ष रखना जरूरी
राथर ने यह सवाल भी उठाया कि यदि किसी मामले को लेकर प्रशासनिक या कानूनी आपत्ति थी तो उसे सरकार के राजनीतिक नेतृत्व के माध्यम से विधानसभा के समक्ष रखा जाना चाहिए था।उनके अनुसार, विधानसभा के कामकाज में इस प्रकार का हस्तक्षेप सदन की संस्थागत स्वायत्तता से जुड़े सवाल खड़े करता है।
कश्मीर मामलों के जानकार रमीज मखदूमी ने कहा कि जिस तरह से मुख्यसचिव और विधि सचिव ने प्रस्ताव पर सदन मे ंचर्चा न कराने की सलाह दी है, उसे देखते हुए अब सभी की नजर , पारित प्रस्ताव को लेकर प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ी है।
विधानसभा सचिवालय ने प्रस्ताव मुख्यसचिव को भेजा है,लेकिन उसे केंद्र सरकार को भेजने की बात उसमें स्पष्ट नहीं है। कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने से जम्मू कश्मीर का दर्जा बहाल नहीं होगा,यह तभी होगा जब केंद्र सरकार इसके लिए कानून लाए, उसे संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इन सभी बाताें के बीच मुख्य सचिव इस पर क्या रुख अपनाते हैं, यह भी देखना होगा, लेकिन इस प्रकरण ने नौकरशाही की ओर से प्रस्ताव की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए जाने से प्रशासनिक प्रक्रिया पर बहस को जन्म दिया है।क्या प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा? क्या इस संबंध में कानून विभाग से कोई नई राय ली जाएगी? और क्या सब-ज्यूडिस का तर्क आगे भी प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित करेगा?
