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क्या सिर्फ फाइलों में हरा-भरा है जम्मू-कश्मीर? 7,087 वर्ग किमी वन भूमि पर पेड़ ही नहीं, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Published: Mon, 12 Oct 2026 12:09 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हजारों वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर पेड़ों का आवरण नहीं है। राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर की 7,087 वर्ग किमी वन भूमि पर पेड़ नहीं होने का दावा।

जम्मू-कश्मीर की 7,087 वर्ग किमी वन भूमि पर पेड़ नहीं होने का दावा।

HighLights

  1. 7087 वर्ग किमी वन भूमि पर हरियाली नहीं।

  2. आरजीआइसीएस रिपोर्ट ने किया चौंकाने वाला खुलासा।

  3. प्रकृति बहाली को ₹19,131 करोड़ निवेश का प्रस्ताव।

राहुल शर्मा, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में सरकारी रिकॉर्ड में जंगल के रूप में दर्ज हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पर पेड़ों का आवरण नहीं है। राजीव गांधी इंस्टीट्यूट फॉर कंटेम्पररी स्टडीज (आरजीआइसीएस) की एक हालिया रिपोर्ट ने इस पर बड़ा खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्र शासित प्रदेश में 7087 वर्ग किलोमीटर दर्ज वन भूमि पर वृक्ष मौजूद ही नहीं हैं। यह आंकड़ा जंगलों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की रणनीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत को सामने लाता है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष यह नहीं है कि पूरी जमीन पर हाल ही में पेड़ काटे गए हैं। बल्कि यह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि और वास्तव में पेड़ों से ढके क्षेत्र के बीच अंतर को दर्शाता है।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इन इलाकों में पेड़ों का क्षेत्र कहां कम है, इसके पीछे क्या परिस्थितियां हैं और प्राकृतिक हरियाली को बहाल करने के लिए कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं।

वन भूमि का बड़ा हिस्सा अब भी वृक्ष क्षेत्र से बाहर

'ए न्यू विजन फॉर जेएंडके एंड ए न्यू स्ट्रैटेजी फॉर रियलाइजिंग दैट विजन' शीर्षक वाली रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर के पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था का व्यापक आकलन करती है। इसमें पर्यावरणीय गिरावट को क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, जंगलों के साथ ग्लेशियरों, झीलों, झरनों और जल संसाधनों पर भी दबाव बढ़ रहा है। हिमालयी क्षेत्र में इन प्राकृतिक संसाधनों का महत्व और अधिक है, क्योंकि इनका संबंध जल सुरक्षा, स्थानीय आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन से है।

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं। वे जलग्रहण क्षेत्रों की रक्षा करने, मिट्टी के कटाव को कम करने और पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जंगलों पर दबाव बढ़ने से इन कार्यों की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

प्रकृति पर निर्भर कई परिवारों की आजीविका

जम्मू-कश्मीर में कृषि, बागवानी, पशुपालन और वन संसाधनों पर निर्भर अनेक परिवारों की आजीविका प्रकृति से जुड़ी है। ऐसे में प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन पर भी पड़ सकता है।

प्रकृति की बहाली के लिए 19131 करोड़ रुपये का प्रस्ताव

रिपोर्ट में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के लिए पांच वर्षों में 19,131 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया गया है। यह राशि रिपोर्ट के व्यापक विकास ढांचे में प्रकृति के पुनरुद्धार के लिए निर्धारित अनुमानित जरूरत है, न कि सरकार की ओर से स्वीकृत या जारी धनराशि।

अध्ययन में खराब हो चुके वन क्षेत्रों को बहाल करने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल देशी प्रजातियों के मिश्रित पौधे लगाने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट व्यावसायिक उद्देश्य से बड़े क्षेत्र में एक ही प्रजाति के पौधे लगाने के बजाय विभिन्न देशी प्रजातियों को प्राथमिकता देने पर जोर देती है।

संरक्षण के साथ निगरानी भी जरूरी

रिपोर्ट जलग्रहण क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत करने और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने की जरूरत भी रेखांकित करती है। इसका उद्देश्य वन संरक्षण को जम्मू-कश्मीर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा से जोड़ना है।

7087 वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा इस दिशा में विस्तृत आकलन की जरूरत बताता है। अब चुनौती यह समझने की है कि दर्ज वन भूमि के किन हिस्सों में प्राकृतिक रूप से पेड़ नहीं उग सकते और कहां बहाली के प्रयास उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसके लिए क्षेत्रवार आकलन, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं और उनके परिणामों की नियमित निगरानी जरूरी होगी।

जम्मू-कश्मीर की प्राकृतिक संपदा उसकी बड़ी ताकत है। इस संपदा को सुरक्षित रखने के लिए केवल वन भूमि का रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक वृक्ष आवरण, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति और संरक्षण के प्रयासों के नतीजों पर भी बराबर ध्यान देना होगा।

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