गुलाम जम्मू-कश्मीर में 100 दिन से भारी उबाल! 500+ गिरफ्तारियां और 100 मौतों का दावा, यूरोप तक गूंजा विरोध
गुलाम जम्मू-कश्मीर में 100 दिनों से जारी जनआंदोलन पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दावों पर सवाल उठा रहा है, जिसमें राजनीतिक अधिकारों और जवाबदेही की मांग की जा रही है।

पाकिस्तान के दोहरे नैरेटिव पर खड़े हुए गंभीर सवाल।
HighLights
गुलाम जम्मू-कश्मीर में 100 दिनों से जनआंदोलन जारी है
500 से अधिक गिरफ्तारियां और 100 मौतों का दावा किया गया
विरोध प्रदर्शन अब यूरोप तक पहुंच गया है
नवीन नवाज, जागरण। गुलाम जम्मू कश्मीर में पिछले करीब 100 दिनों से जारी जनआंदोलन अब पाकिस्तान की सत्ता और उसके लोकतांत्रिक दावों के सामने एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जवाबदेही, आर्थिक अधिकार, बेहतर शासन और पहले किए गए समझौतों को लागू करने की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन लगातार फैल रहा है।
इसके जवाब में प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग, गिरफ्तारियों, संचार प्रतिबंधों और आतंकवाद विरोधी कानूनों के इस्तेमाल के आरोपों ने पाकिस्तान के लोकतंत्र और कश्मीर नीति के बीच मौजूद विरोधाभास को और उजागर कर दिया है। यह आंदोलन अब यूरोप में भी अपना असर दिखा रहा है।
गुलाम जम्मू कश्मीर में जारी घटनाक्रम पाकिस्तान के उस राजनीतिक नैरेटिव पर सीधा सवाल खड़ा करता है, जिसके तहत वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों के अधिकार, आत्मनिर्णय और लोकतंत्र की बात करता है।
पाकिस्तान का दावा रहा है कि वह कश्मीरियों के राजनीतिक अधिकारों का समर्थक है। लेकिन उसके नियंत्रण वाले गुलाम जम्मू कश्मीर में जब नागरिक उन्हीं राजनीतिक अधिकारों, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की मांग करते हैं, तो उनके सामने गिरफ्तारी, प्रतिबंध और बल प्रयोग की तस्वीर क्यों दिखाई देती है?
5 जून से इंटरनेट बंद
मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की रिपोर्टों के मुताबिक, गुलाम जम्मू कश्मीर के कई हिस्सों में लंबे समय से इंटरनेट और अन्य संचार सेवाएं प्रभावित हैं। कार्यकर्ताओं का दावा है कि पांच जून 2026 से रावलकोट, सुधनोती और आसपास के इलाकों में संचार प्रतिबंधों का असर बना हुआ है।
इससे न केवल प्रदर्शनकारियों की गतिविधियां प्रभावित हुई हैं, बल्कि पत्रकारों के लिए घटनाओं की रिपोर्टिंग, नागरिकों के लिए घटनाओं का दस्तावेजीकरण, विद्यार्थियों की पढ़ाई और कारोबार भी प्रभावित हुआ है।
इस आंदोलन का सबसे गंभीर पहलू पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी कानूनों के कथित इस्तेमाल से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, जम्मू कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) को एजेके एंटी टेरेरिज्म एक्ट, 2014 के तहत प्रतिबंधित किया गया।
इसके बाद कम से कम 157 राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान के फोर्थ शेड्यूल में शामिल किए जाने की खबर सामने आई। बाद की रिपोर्टों में यह संख्या 290 से अधिक होने का दावा भी किया गया है।
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फोर्थ शेड्यूल के तहत रखे गए लोगों की गतिविधियों और आवाजाही पर विभिन्न तरह के प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब नागरिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और आर्थिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं, तो उन्हें आतंकवाद विरोधी कानूनों के दायरे में लाने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
500 से अधिक गिरफ्तारियां
गुलाम जम्मू कश्मीर और पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में 500 से अधिक एक्टिविस्ट, आयोजक, छात्र, पत्रकार और स्थानीय लोगों को गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है। प्रदर्शनकारी समूहों ने अशांति के दौरान करीब 100 आम नागरिकों की मौत का दावा भी किया है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा जेएएसी से मिली जानकारी का हवाला देते हुए जुलाई में हुई कार्रवाई में 19 लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की बात कही गई थी। वहीं, अल जज़ीरा की रिपोर्टिंग में 14 जुलाई की झड़पों में कम से कम नौ लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई थी।
मानवाधिकार आयोग पाकिस्तान (एचआरसीपी) ने भी पाकिस्तान सरकार के तौर तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे बेहिसाब बल प्रयोग वाला बताया है। आयोग के मुताबिक ऐसी कार्रवाई ने लोगों में गुस्सा बढ़ाने के साथ साथ जनता के भरोसे को कमजोर करने का काम किया है।
सवाल यह भी है कि यदि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी स्वतंत्र जांच कौन करेगा? नागरिकों की मौतों की जवाबदेही किसकी होगी? बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का हिसाब कौन देगा? और यह तय कौन करेगा कि आतंकवाद विरोधी कानून वास्तव में आतंकवाद से लड़ने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं या राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए?
संचार प्रतिबंधों और कथित गिरफ्तारियों के बावजूद आंदोलन पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। रावलकोट, सुधनोती और मुजफ्फराबाद इसके प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। 9 सितंबर के बंद ने कथित तौर पर मुजफ्फराबाद, पुंछ और मीरपुर डिवीजनों के बड़े हिस्से को प्रभावित किया।
गुलाम जम्मू कश्मीर से जुड़े मुद्दों को लेकर ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड में भी पाकिस्तान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी रहने की खबरें हैं। प्रदर्शनकारियों की मांगों में राजनीतिक अधिकार, प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और राजनीतिक गतिविधियों की स्वतंत्रता प्रमुख हैं।
इससे साफ है कि आंदोलन केवल किसी एक शहर या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। पाकिस्तान के भीतर से लेकर विदेशों तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है।
गुलाम जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति पाकिस्तान के लिए सिर्फ कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि उसके लोकतांत्रिक दावों की परीक्षा भी है।
तमाम दबाव, गिरफ्तारियों, संचार प्रतिबंधों और कथित बल प्रयोग के बावजूद वहां के लोग अपने अधिकारों की मांग से पीछे हटते नजर नहीं आ रहे हैं।गुलाम जम्मू कश्मीर के लोग अपने अधिकारों, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के लिए आवाज उठा रहे हैं—और फिलहाल झुकते नजर नहीं आ रहे हैं
