विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जम्मू-कश्मीर: 45 वर्षीय मूक-बधिर रेनू हंस ने 82% अंकों से पास की 10वीं, बेटे ने निभाई 'गुरु' की भूमिका

Published: Mon, 14 Sep 2026 07:34 AM (IST)

45 वर्षीय कश्मीरी हिंदू महिला रेनू हंस ने सुनने और बोलने में अक्षम होने के बावजूद 82% अंकों के साथ ...और पढ़ें

रेनू ने 10वीं बोर्ड में गाड़े सफलता के झंडे।

 रेनू ने 10वीं बोर्ड में गाड़े सफलता के झंडे।

HighLights

  1. रेनू हंस ने 45 वर्ष की आयु में दसवीं की परीक्षा पास की

  2. सुनने और बोलने में अक्षम होने के बावजूद 82% अंक प्राप्त किए

  3. बेटे नमन कौल ने मां की पढ़ाई में महत्वपूर्ण सहयोग दिया

राज्य ब्यूरो, जम्मू। उम्र और परिस्थितियां अगर हौसले के सामने छोटी पड़ जाएं तो कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है। जम्मू की 45 वर्षीय कश्मीरी हिंदू महिला रेनू हंस ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है।

सुनने और बोलने में असमर्थ रेनू ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन की दसवीं कक्षा की परीक्षा 82 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की है। उन्होंने यह उपलब्धि उस सपने को पूरा करने के लिए हासिल की, जिसे वह पिछले 22 वर्षों से अपने मन में संजोए हुए थीं।

रेनू की इस सफलता के पीछे उनके परिवार का मजबूत सहयोग और उनके बेटे नमन कौल की असाधारण भूमिका रही। 12 वीं कक्षा में विज्ञान विषय के छात्र नमन ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मां को भी पढ़ाया, उनकी शंकाएं दूर कीं और परीक्षा की तैयारी में लगातार उनका साथ दिया।

बेटे ने मां को आगे बढ़ने के लिए किया प्रोत्साहित

नमन ने एक न्यूज एजेंसी बताया कि मुझे लगा कि मेरी मां को घर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अगर वह पढ़ेंगी तो जीवन में आगे बढ़ सकती हैं। उनका हमेशा से पढ़ाई करने और अच्छी नौकरी पाने का सपना था।

वह लंबे समय से इस सपने को अपने साथ लेकर चल रही थीं और दसवीं पास करना उस सपने को पूरा करने की पहली सीढ़ी थी। परिवार जम्मू के बाहरी इलाके लोअर रूप नगर में एक सरकारी फ्लैट में रह रहा है।

यह परिवार 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिंदुओं के सामूहिक पलायन के दौरान दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के चावलागाम गांव स्थित अपने पैतृक घर से विस्थापित हुआ था।

परिवार को एक साधारण फ्लैट आवंटित किया गया, जिसमें एक कमरा, लॉबी, रसोई और बाथरूम है। रेनू के पति बबलू कौल भी सुनने और बोलने में असमर्थ हैं और घर से ही सिलाई का काम करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद दंपती ने अपने बेटे नमन को आगे बढ़ने के लिए पूरा सहयोग दिया।

रेनू ने शादी से पहले भी दसवीं कक्षा की परीक्षा दी थी, लेकिन वह उसे उत्तीर्ण नहीं कर सकीं। इसके बाद कई वर्षों तक उनकी औपचारिक शिक्षा आगे नहीं बढ़ पाई। आखिरकार उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया।

अप्रैल में दिया था एग्जाम

नमन के मुताबिक, उनकी मां ने अप्रैल में जम्मू कश्मीर बोर्ड द्वारा आयोजित दसवीं कक्षा की द्विवार्षिक परीक्षा दी थी और 10 सितंबर को परिणाम घोषित हुआ। परीक्षा केंद्र पहुंचने पर रेनू काफी घबराई हुई थीं। नमन ने बताया कि उनके आसपास उनसे काफी कम उम्र के विद्यार्थी भी थे और कुछ बुजुर्ग अभ्यर्थी भी परीक्षा दे रहे थे।

हालांकि धीरे-धीरे वह सहज हो गईं और आत्मविश्वास के साथ परीक्षा पूरी की। रेनू को परीक्षा में शामिल कराने के लिए पंजीकरण कराना भी आसान नहीं था। नमन ने बताया कि उन्हें शुरुआत में उस योजना की जानकारी नहीं थी, जिसके तहत उनकी मां विद्यार्थी के रूप में पंजीकरण करा सकती थीं।

बोर्ड कार्यालय जाने पर उन्हें बताया गया कि योजना बंद हो चुकी है। बाद में योजना से जुड़े घटनाक्रम के बीच परिवार उनकी मां का पंजीकरण कराने में सफल रहा। नमन ने बचपन से ही अपने माता-पिता से इशारों के जरिए संवाद करना सीखा।

अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मां के भी बने गुरु

इसमें उनके नाना-नानी और मौसी ने भी उनकी काफी मदद की। उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे वह इशारों के माध्यम से माता-पिता की बात समझने लगे। 12 वीं कक्षा की विज्ञान की पढ़ाई और मां की तैयारी के बीच संतुलन बनाना भी नमन के लिए चुनौतीपूर्ण था। वह शाम को मां के लिए पढ़ाई का समय तय करते और रात में उनके सवालों के जवाब देते हुए अपनी पढ़ाई भी जारी रखते थे।

रेनू को चित्रकारी में भी विशेष रुचि है। दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद अब वह अपने जीवन में आगे की संभावनाओं को लेकर उत्साहित हैं।
उन्होंने अपनी सफलता के लिए पति का विशेष आभार जताया।

नमन के अनुसार, उनके पिता ने हमेशा मां के पढ़ाई करने के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कभी नाराजगी या आपत्ति नहीं जताई, बल्कि कहा कि अगर रेनू काम करना चाहें तो भी वह उनका पूरा साथ देंगे। उन्होंने रेनू को हमेशा निडर और आत्मविश्वासी बने रहने के लिए प्रेरित किया।

रेनू हंस की कहानी न केवल शिक्षा के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल है, बल्कि यह भी दिखाती है कि परिवार का सहयोग और संकल्प किसी भी उम्र में अधूरे सपने को पूरा करने की ताकत दे सकता है।

यह भी पढ़ें- जम्मू में एनडीए परीक्षा में दिखा युवाओं का जोश, सेना और वायुसेना में अधिकारी बनने के लिए दी परीक्षा