घाटी में कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों का नंबर और गाड़ी की डिटेल लीक, नौकरी छोड़ने की धमकी; जांच में जुटीं एजेंसियां
कश्मीर में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत विस्थापित कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों को यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूएलसी) से धमकी भरे पत्र मिल रहे हैं।

कश्मीर में कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों को यूएलसी की धमकी, सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी चिंता।
HighLights
विस्थापित कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों को यूएलसी से धमकी भरे पत्र।
पत्रों में कर्मचारियों की निजी जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की गई।
सुरक्षा एजेंसियां इसे लश्कर-ए-तैयबा का छद्म संगठन मान रही हैं।
राज्य ब्यूरो, जम्मू। घाटी में विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की वापसी और पुनर्वास के दावों के बीच एक बार फिर आतंक की छाया गहराती दिख रही है। प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीर में सरकारी सेवाएं दे रहे विस्थापित कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों को यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूएलसी) के नाम से धमकी भरे पत्र जारी कर नौकरी छोड़ने का फरमान सुनाया गया है।
इन पत्रों में कर्मचारियों की निजी जानकारियां ऑनलाइन सार्वजनिक किए जाने से सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। एजेंसियां अब पत्रों के डिजिटल ट्रेल, स्थानीय संपर्क और इनके पीछे सक्रिय नेटवर्क की गहन जांच कर रही हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यूएलसी पिछले करीब डेढ़ महीने से लगातार धमकी भरे पत्र जारी कर रहा है। एजेंसियां इसे लश्कर ए तैयबा का छद्म संगठन मान रही हैं। अगस्त में ही ऐसे चार पत्र सामने आए। सात अगस्त के पत्र में प्रधानमंत्री के विशेष पैकेज के तहत सरकारी विभागों में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाने की धमकी दी गई।
इसमें कर्मचारियों के नाम, फोन नंबर और पते सार्वजनिक किए गए। 23 अगस्त को जारी दूसरे पत्र में निजी जानकारियों के साथ वाहनों के नंबर भी साझा किए गए। अगस्त के अंतिम दिनों में जारी दो अन्य पत्रों में भी कर्मचारियों और स्थानीय पुलिसकर्मियों को चेतावनी दी गई।
एजेंसियां इन पत्रों के स्रोत का पता लगाने में जुटी हैं। प्राथमिक जांच में इनका संबंध पाकिस्तान से जुड़ा प्रतीत होता है, हालांकि देश के भीतर से किसी खुफिया नेटवर्क या स्थानीय सहयोगी के जरिए इन्हें भेजे जाने की आशंका की भी जांच की जा रही है।
अधिकारियों के मुताबिक, कर्मचारियों के पते, फोन नंबर और वाहन संबंधी संवेदनशील जानकारी संगठन तक पहुंचना इस मामले में स्थानीय लिंक की संभावना को गंभीर बनाता है।
अधिकारियों का मानना है कि धमकी पत्रों की बढ़ती आवृत्ति महज डर पैदा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा भी हो सकती है। इसका उद्देश्य लोगों में भय पैदा करना, सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव बढ़ाना और घाटी में सामान्य होते हालात को प्रभावित करना हो सकता है।
वर्तमान घटनाक्रम ने कश्मीर में विस्थापित हिंदुओं की वापसी और पुनर्वास को लेकर पुराने सवाल भी फिर खड़े कर दिए हैं। करीब 6,000 प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारी पिछले 15 वर्षों से घाटी में सेवाएं दे रहे हैं। इनमें कई कर्मचारी किराए के मकानों में रह रहे हैं। श्रीनगर के जेवन तथा अनंतनाग के मट्टन और वेरिनाग में 6,042 क्वार्टर बनाए गए हैं, लेकिन तीन वर्षों में करीब 800 ही आवंटित हो सके हैं।
विस्थापित कश्मीरी हिंदू प्रतिनिधि सुनील कौल ने सुरक्षा आडिट कराने, धमकियों के स्रोत की जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। उनका कहना है कि वापसी को केवल नौकरी और मकान तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि सुरक्षा और भूमि अधिकारों के साथ समग्र पुनर्वास जरूरी है।
केंद्र ने 2008 में वापसी और पुनर्वास के लिए पैकेज घोषित किया था, जिसमें 3,000 नौकरियां शामिल थीं। नवंबर 2015 में प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत 3,000 और पद मंजूर किए गए। हालांकि रोजगार के अवसर बढ़े, लेकिन सुरक्षा को लेकर सवाल बने रहे। 2022 में चडूरा तहसील कार्यालय में राहुल भट्ट की हत्या ने घाटी में काम कर रहे विस्थापित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता और गहरा दी थी।
धमकियों के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने सवाल उठाया कि विस्थापित कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि भय का माहौल बनाकर उपराज्यपाल प्रशासन पर दबाव और राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी की कोशिश हो सकती है।
भाजपा ने पलटवार करते हुए इसे आतंकवाद के प्रति नरम रवैया बताया। पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया सह-प्रभारी प्रदीप भंडारी ने आरोप लगाया कि ऐसी बयानबाजी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है और विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की पीड़ा को दबाती है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने धमकियों को गंभीर बताते हुए सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों से इनके स्रोत का पता लगाने को कहा है। अब जांच का केंद्र यूएलसी के डिजिटल नेटवर्क के साथ-साथ उस स्थानीय कड़ी पर भी है, जो कर्मचारियों की संवेदनशील जानकारी उपलब्ध करा रही है।
