लद्दाख कैसे बना भारत का हिस्सा? चीन की भी थी इस पर नापाक नजर, 2000 साल पुराना है इसका इतिहास
लद्दाख का 2000 साल पुराना इतिहास बताता है कि कैसे यह क्षेत्र तिब्बत, चीन और भूटान के प्रभाव से निकलकर भारत का अभिन्न अंग बना।
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लद्दाख के इतिहास के बारे में विस्तार से।
HighLights
लद्दाख का 2000 साल पुराना रणनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास
जोरावर सिंह ने लद्दाख को जम्मू-कश्मीर का अभिन्न अंग बनाया
2019 में लद्दाख जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्र शासित प्रदेश बना
डिजिटल डेस्क, जम्मू। लद्दाख में इन दिनों 'पूर्ण राज्य' और अपनी विधानसभा की मांग को लेकर हलचल तेज है। सोनम वांगचुक इस मुद्दे को लेकर पद यात्रा करने वाले हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा 2,000 साल पुराना यह खूबसूरत भू-भाग कभी भारत का हिस्सा ही नहीं था?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो लद्दाख पर कभी तिब्बत, कभी चीन तो कभी भूटान का गहरा प्रभाव रहा। 19वीं सदी में डोगरा सेनापति जोरावर सिंह के शौर्य से लेकर 1947 में पाकिस्तानी हमलावरों को खदेड़ने और 1962 के भारत-चीन युद्ध तक जानिए लद्दाख के भारत संघ में शामिल होने और इसके रणनीतिक इतिहास की पूरी रोमांचक दास्तान।
2,000 साल पुराना इतिहास
हिमालय और काराकोरम की बर्फीली चोटियों के बीच बसा लद्दाख सदियों से अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण पड़ोसी देशों के आकर्षण का केंद्र रहा है। 17वीं सदी के अंत में तिब्बत के साथ गहरे सीमा विवाद और युद्ध के चलते लद्दाख ने खुद को कूटनीतिक रूप से भूटान के साथ जोड़ा था। बाल्टिस्तान, तिब्बत, चीन और कश्मीर के साथ लगातार संघर्षों के बीच लद्दाख की अपनी एक अलग स्वायत्त पहचान और तिब्बती-बौद्ध संस्कृति रही, जो इसे बाकी पड़ोसी क्षेत्रों से अलग बनाती थी।
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जोरावर सिंह ने लद्दाख को कश्मीर से जोड़ा
19वीं सदी की शुरुआत में लद्दाख का भाग्य तब बदला जब 1834 में सिख साम्राज्य के तहत महाराजा रणजीत सिंह के पराक्रमी सेनापति जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया ने लद्दाख पर आक्रमण किया।
जोरावर सिंह ने लद्दाखी सेना को हराकर इसे डोगरा शासन के अधीन ला खड़ा किया। 1842 में लद्दाखियों के विद्रोह को कुचलकर इसे पूर्ण रूप से जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा बना लिया गया।
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1947 का बंटवारा- जब पाकिस्तानी कबाइलियों को खदेड़कर भारत में हुआ विलय
1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तो जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह ने शुरुआती दौर में स्वतंत्र रहने का रुख अपनाया। इसी का फायदा उठाकर 1948 में पाकिस्तानी हमलावरों (कबाइलियों) ने लद्दाख के कारगिल और जांस्कर तक घुसपैठ कर ली।
भारतीय सेना के वीर जवानों ने समय रहते पराक्रम दिखाते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को लद्दाख की सीमाओं से खदेड़ बाहर किया। इसके बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसिन' (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर किए, और लद्दाख भी जम्मू-कश्मीर राज्य के हिस्से के तौर पर आधिकारिक रूप से भारत का अभिन्न अंग बन गया।
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चीन की भी थी नापाक नजर
1949 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद चीन ने नूब्रा और शिनजियांग के बीच का ऐतिहासिक व्यापारिक बॉर्डर बंद कर दिया। 1950 में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद लद्दाख की सीमाओं पर तनाव काफी बढ़ गया।
चीन ने भारत के बड़े भू-भाग अक्साई चिन पर अवैध कब्जा कर लिया और झिनजियांग से तिब्बत को जोड़ने के लिए सड़कें बनाईं। इसके जवाब में भारत ने श्रीनगर से लेह तक हाईवे का निर्माण किया, जिससे लेह पहुंचने का समय 16 दिनों से घटकर मात्र 2 दिन रह गया।

अलग UT बनने का ऐतिहासिक सफर
लद्दाख का कारगिल क्षेत्र 1947, 1965, 1971 और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान हमेशा युद्ध का मुख्य केंद्र बना रहा। प्रशासनिक सुविधा के लिए लद्दाख को लेह (बौद्ध बहुल) और कारगिल (मुस्लिम बहुल) दो जिलों में बांटा गया।
1989 में उभरे तनाव के बाद लद्दाख के लोगों ने कश्मीर से अलग होकर पृथक केंद्र शासित प्रदेश (UT) की मांग तेज कर दी। भारत सरकार ने 1993 में 'लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद' (LAHDC) की स्थापना कर क्षेत्र को स्थानीय स्तर पर स्वायत्तता प्रदान की।
5 अगस्त 2019 को हुआ बड़ा फैसला
भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को हटाकर लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से पूरी तरह अलग कर बिना विधानसभा वाला पृथक केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) बना दिया।
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