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ऊना के किसान पराली से उगा रहे आलू, बिना सिंचाई और जुताई के खास तकनीक से शुरू की खेती

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 04 Nov 2026 02:09 PM (IST)Updated: Wed, 04 Nov 2026 02:25 PM (IST)

ऊना के किसान धान की कटाई के बाद बिना जुताई और सिंचाई के आलू की खेती कर रहे हैं। यह ...और पढ़ें

ऊना में पराली से आलू की खेती करते किसान। जागरण

ऊना में पराली से आलू की खेती करते किसान। जागरण

HighLights

  1. धान कटाई के बाद बिना जुताई आलू की बुवाई।

  2. पराली का मल्च के रूप में उपयोग, नमी संरक्षण।

  3. कम लागत, जल संरक्षण, अतिरिक्त आय का स्रोत।

सुरेश बसन, ऊना। हिमाचल प्रदेश में जिला ऊना में धान की कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ने और अगली फसल की बुवाई के लिए जुताई व सिंचाई पर खर्च करने की परंपरागत व्यवस्था अब बदली नजर आएगी। किसान धान की कटाई के तुरंत बाद खेत में मौजूद नमी का उपयोग कर बिना जुताई किए आलू की बुवाई कर रहे हैं। मिट्टी के बजाय पराली से ढककर बढ़िया उत्पादन कर रहे हैं। खेती की यह नई तकनीक किसानों को कम लागत में दूसरी फसल लेने का विकल्प दे रही है।

कृषि अनुसंधान उपकेंद्र अखरोट की ओर से इस विधि को किसानों के खेतों तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में नंदपुर में रंजना देवी के खेत में शून्य जुताई विधि से आलू की बुवाई सफलतापूर्वक की गई है।

पराली का भी सदुपयोग

इस तकनीक की खासियत यह है कि धान की कटाई के बाद खेत की जुताई करने की जरूरत नहीं पड़ती। खेत में पहले से मौजूद अवशिष्ट नमी का इस्तेमाल कर आलू की बुवाई की जाती है। इसके लिए धान के बचे हुए पराली को मल्च के रूप में खेत में इस्तेमाल किया जाता है। इससे मिट्टी की नमी को संरक्षित रखने में मदद मिलती है और धान के अवशेषों का भी सदुपयोग होता है।

शून्य जुताई विधि से आलू उत्पादन

रंजना देवी ने बताया कि उन्होंने कृषि अनुसंधान उपकेंद्र अखरोट से शून्य जुताई विधि से आलू उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। साथ ही अनुसंधान केंद्र के रिसर्च फार्म का दौरा कर इस तकनीक की जानकारी हासिल की। इसके बाद इस वर्ष उन्होंने अपने खेत में इसे अपनाया है। वह अन्य किसानों के खेतों में भी इस विधि से आलू की बुवाई करवा रही हैं, ताकि दूसरे किसान भी इस नई तकनीक से जुड़ सकें।

इस विधि के फायदे

इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि धान की कटाई और आलू की बुवाई के बीच खेत को खाली रखने की जरूरत नहीं रहती। जुताई और सिंचाई पर होने वाला खर्च कम किया जा सकता है। साथ ही पराली जलाने या उसके निपटान की समस्या से भी किसानों को राहत मिल सकती है। मिट्टी की संरचना और स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी यह तकनीक सहायक है।

कृषि अनुसंधान उपकेंद्र अखरोट की ओर से किसानों के खेतों में इस तकनीक का प्रदर्शन और प्रसार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को कम लागत वाली, जल संरक्षण आधारित और जलवायु अनुकूल खेती के लिए प्रोत्साहित करना है। यदि इस विधि के परिणाम बेहतर रहते हैं तो धान के बाद आलू की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी और संसाधनों की बचत का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

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