विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

शिमला के तारा देवी मंदिर का 350 साल पुराना इतिहास, भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करती हैं मां; नवरात्र में उमड़ी भीड़

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Mon, 12 Oct 2026 02:03 PM (IST)

शिमला से 11 किमी दूर स्थित तारा देवी मंदिर का 350 साल पुराना इतिहास है, जहां मां तारा भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।

शिमला स्थित तारा देवी माता का मंदिर व प्रतिमा।

शिमला स्थित तारा देवी माता का मंदिर व प्रतिमा।

HighLights

  1. शिमला से 11 किमी दूर स्थित 350 साल पुराना मंदिर।

  2. जुन्गा नरेश के समय से जुड़ी है मंदिर की स्थापना।

  3. नवरात्र में श्रद्धालुओं के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था।

जागरण टीम, शिमला। हिमाचल प्रदेश में शिमला शहर से करीब 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तारादेवी मंदिर काफी पुराना है। चोटी पर स्थित मां तारा हर मनोकामना को पूरा करती हैं। हर वर्ष लाखों लोग मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर के एक तरफ जंगल और दूसरी तरफ सड़कें हैं। श्रद्धालुओं के लिए भंडारे की भी व्यवस्था की जाती है।

मंदिर के साथ आधा किलोमीटर की दूरी पर दूधाधारी मंदिर भी स्थित है, जो श्रद्धालु मां तारा के दर्शन करने पहुंचते हैं वे यहां भी जरूर जाते हैं। इस मंदिर की यह विशेषता है कि स्थानीय लोगों की गाय यदि दूध नहीं देती है तो दूधाधारी मां से मन्नत करने पर पूरी हो जाती है।

350 वर्ष पुराना इतिहास

जुन्गा नरेश के राज्य काल में करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व जुग्गर नामक स्थान पर एक दिन राजा भूपेंद्र सेन शिकार खेलने आए तो जंगल से माता ने आवाज दी कि हे राजन तेरी वंश परंपरा बंगाल से चली आ रही है और मैं दश महाविद्याओं में से एक महाविद्या हूं। राजा माता की आवाज सुनकर बोले कि हे माता दर्शन देकर कृतार्थ करो। राजा की आवाज सुनते ही माता ने दर्शन दिए और कहा कि मेरे स्थान का निर्माण करो। मैं हर समय तुम्हारे वंश और राज्य की रक्षा करूंगी। 

मंदिर के लिए दी थी 500 बीघा भूमि 

इस पर राजा ने माता के स्थान निर्माण एवं रक्षार्थ पांच सौ बीघा भूमि दान की। जुग्गर नामक स्थान पर मंदिर बनवाया। कुछ दिन बाद ताराधिनाथ नामक महात्मा यहां आए और उन्होंने राजा जुन्गा के बलवीर सेन महाराजा से यह माता की अष्टधातु की मूर्ति बनवाई और शस्त्रविधि से मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की।

बेहद रोचक है मान्यता

ताराधिनाथ के प्रतिष्ठा करवाने से इस स्थान का नाम तारख रखा गया इसलिए तारा की स्तुति में ताराधिनाथ स्त्राहिमा शरणागतम लिखा है। एक समय राजा जुनगा राजरानी एवं छोटे से राजकुमार को छोड़कर स्वर्गारोहण कर गए तो निकटवर्ती राजा सिरमौर ने जुनगा राजरानी की राजधानी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने तारव आकर मां तारा की स्तुति की। रानी की प्रार्थना सुनकर माता ने दर्शन दिए और कहा कि मेरे झंडे को युद्ध में साथ लेकर शत्रु से लड़ने जा तेरी विजय होगी। मां के वचन सुनते ही राजरानी महासू पर्वत पर शत्रु से घमासान युद्ध करने गई और अंत में विजयश्री रानी जुन्गा की हुई। 

नवरात्र में श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस कर्मी व होमगार्ड तैनात किए हैं। मां के दर्शनों के लिए आने व जाने के लिए अलग-अलग व्यवस्था गई है। मंदिर सरकार के अधिग्रहण में है और यहां का प्रबंध सरकार की ओर से स्थापित ट्रस्ट की परंपराओं एवं रस्मों के अनुकूल किया जाता है।
-अनिल शर्मा, पुजारी, तारादेवी मंदिर।

यह भी पढ़ें: शारदीय नवरात्र के लिए सजा मां चिंतपूर्णी का दरबार, श्रद्धालुओं को ऑनलाइन भी मिलेगी सुगम दर्शन पर्ची; 4 बजे खुलेंगे कपाट