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'संयुक्त भूमि बेचने पर बिना विभाजन विशिष्ट हिस्से पर कब्जा नहीं सौंप सकते', हिमाचल हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 08 Nov 2026 11:37 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संयुक्त खाते की भूमि में सह-साझेदार अपना हिस्सा बेच सकता है, ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. सह-साझेदार संयुक्त भूमि का हिस्सा बेच सकते हैं, पर कब्जा नहीं।

  2. कानूनी विभाजन के बिना खरीदार को विशिष्ट भूमि पर कब्जा नहीं।

  3. हिमाचल हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि कोई भी सह-साझेदार संयुक्त खाते की भूमि में से अपना हिस्सा बेचने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन वह कानूनी विभाजन हुए बिना खरीदार को किसी विशिष्ट टुकड़े का मालिकाना कब्जा नहीं सौंप सकता। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को संशोधित करते हुए विवादित भूमि पर आगामी फैसले तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया है।

शिमला के सुन्नी का मामला

यह मामला शिमला जिले की तहसील सुन्नी के मोहाल बसंतपुर का है। याचिकाकर्ता हंसराज और अन्य ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें अदालत ने स्टे देने का मामला टाल दिया था। विवाद तब शुरू हुआ जब संयुक्त भूमि के एक सह-मालिक ने अपना 7/16 हिस्सा अन्य लोगों को बेच दिया। 

सह-मालिकों ने आपत्ति जताई

राजस्व रिकार्ड और म्यूटेशन में यह दर्ज कर दिया कि खरीदारों को मौके पर कब्जा दे दिया है। इस पर मूल सह-मालिकों (याचिकाकर्ताओं) ने आपत्ति जताई कि बिना बंटवारे के किसी विशिष्ट हिस्से का कब्जा नहीं दिया जा सकता और खरीदार वहां अवैध निर्माण कर सकते हैं।

सिविल जज ने टाल दिया था मामला

इससे पहले सिविल जज शिमला ने इस मामले में अंतरिम स्थगन आदेश जारी करने को सिर्फ इसलिए टाल दिया था क्योंकि मामले में सब-रजिस्ट्रार भी एक पक्ष थे और अदालत राज्य सरकार के जवाब का इंतजार करना चाहती थी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस दीवानी मुकदमे में राज्य सरकार का कोई वित्तीय या मालिकाना हित नहीं जुड़ा है। कोर्ट को उपलब्ध दस्तावेजों (जैसे जमाबंदी और सेल डीड) को देखकर पहली ही तारीख पर मेरिट के आधार पर स्थगन आदेश देने या न देने का निर्णय लेना चाहिए था, न कि सरकारी जवाब के नाम पर मामले को लटकाना चाहिए था।

कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेल डीड या राजस्व रिकॉर्ड में कब्जा सौंपने के जिक्र का मतलब केवल सह-साझेदार के स्वामित्व और पोसेशरी अधिकारों का खरीदार के पक्ष में ट्रांसफर होना है। इसके दम पर खरीदार पूरी जमीन के किसी एक निश्चित हिस्से पर विशेष या अनन्य अधिकार का दावा नहीं कर सकता। खरीदार केवल संयुक्त खाते में नए हिस्सेदार बने हैं। यदि वे जमीन के किसी विशेष टुकड़े पर कोई गतिविधि करना चाहते हैं या निर्माण करना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले राजस्व कानून के तहत जमीन का औपचारिक विभाजन करवाना होगा। 

अदालत ने स्पष्ट किया कि न केवल खरीदार, बल्कि पुराने सह-मालिकों या किसी भी अन्य साझेदार को इस संयुक्त भूमि का विभाजन करवाने का कानूनी अधिकार है।

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