'सरकारी कर्मचारी होने या पेंशन मिलने से मुआवजा हक खत्म नहीं होता', हिमाचल हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी होने या पेंशन मिलने से मुआवजे का हक खत्म ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव
HighLights
सरकारी कर्मचारी होने से मुआवजा हक खत्म नहीं।
जलशक्ति विभाग के फिटर की मौत पर फैसला।
परिवार को ₹3.12 लाख मुआवजा देने का आदेश।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी होने या पेंशन मिलने से मुआवजे का हक खत्म नहीं होता। कोर्ट ने जलशक्ति विभाग की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें एक नियमित सरकारी फिटर की मौत के बाद उसके परिवार को मुआवजा देने का विरोध किया गया था।
मुआवजा कानून की परिभाषा में
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही कर्मचारी सिविल सेवा नियमों के तहत आता हो और उसके परिवार को ग्रेच्युटी, जीपीएफ और अनुकंपा नौकरी जैसे लाभ मिल चुके हों, फिर भी वह मुआवजा कानून के तहत वर्कमैन (कर्मचारी) की परिभाषा में आता है।
फिटर के पद पर तैनात थे जसवंत
जसवंत सिंह विभाग में फिटर के पद पर तैनात थे और पाइप ठीक करते समय ऊंचाई से गिरने के कारण उनकी मृत्यु हुई थी, जोकि इस कानून के तहत कवर्ड है।
3.12 लाख मुआवजे का फैसला सही
न्यायाधीश योगेश जसवाल ने सरकाघाट के वर्कमैन कमिश्नर द्वारा सुनाए फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने मृतक की पत्नी और बेटी के पक्ष में ₹3,12,940 रुपये का मुआवजा और दुर्घटना की तारीख से अंतिम भुगतान तक 12 प्रतिशत सालाना की दर से साधारण ब्याज देने के आदेश को बरकरार रखा है।