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'जमीन के मालिकाना हक का विवाद होने से मुआवजा नहीं रोक सकते', हिमाचल हाई कोर्ट का फैसला; भवन बनाने वाला हकदार

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sat, 31 Oct 2026 11:31 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जमीन के मालिकाना हक का विवाद होने पर भी अधिग्रहीत ढांचे का मुआवजा उसे मिलेगा जिसने उसे बनाया है।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. अधिग्रहीत ढांचे का मुआवजा उसे मिलेगा जिसने उसे बनाया है।

  2. जमीन के मालिकाना हक विवाद से मुआवजे को नहीं रोका जा सकता।

  3. नेरचौक-मनाली फोरलेन के यज्ञ चंद मामले में आया यह फैसला।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े मामले में स्थिति स्पष्ट की है। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने आदेश दिया कि भले ही जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद अदालत में लंबित हो, लेकिन अधिग्रहीत ढांचे (मकान) का मुआवजा उसी व्यक्ति को दिया जाएगा जिसने उसे अपने पैसे से बनाया है और जो सार्वजनिक रिकार्ड में दर्ज है।

भवन बनाने वाला हकदार

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहीत भूमि पर बने किसी भी भवन, ऊंचे ढांचे या सुधार का मुआवजा स्वतंत्र रूप से देय होता है। जिस व्यक्ति ने उस ढांचे का निर्माण किया जो उस पर काबिज था या जिसने उसका लाभ उठाया, वह उस सीमा तक मुआवजे का हकदार है। केवल जमीन के मालिकाना हक का विवाद होने से ढांचे के मुआवजे को नहीं रोका जा सकता। 

गुरुद्वारा समिति ने केवल जमीन के संबंध में दीवानी मुकदमा दायर किया था, लेकिन उन्होंने अपने दावों में कहीं भी यह नहीं कहा था कि इस विशेष ढांचे का निर्माण गुरुद्वारे द्वारा करवाया गया था।

नेरचौक-मनाली फोरलेन का मामला

वर्ष 2017 में एनएचएआइ द्वारा नेरचौक-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग-21 के फोरलेन निर्माण के लिए भुंतर तहसील के तहत राजस्व ग्राम शिलिहार में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इस दौरान याचिकाकर्ता यज्ञ चंद द्वारा निर्मित ढांचा भी अधिग्रहीत किया था। अवार्ड में आधिकारिक तौर पर यह माना कि इस ढांचे का निर्माण यज्ञ चंद ने किया था और उनके लिए 66,66,000 रुपये का मुआवजा व अन्य खर्चों के रूप में 1,66,650 रुपये तय किए थे। 

मुआवजे की रकम जब भारतीय स्टेट बैंक में जमा करवाई तो गुरुद्वारा गुरु ग्रंथ साहिब भुंतर की प्रबंध समिति ने इस पर आपत्ति दर्ज करवा दी। समिति का दावा था कि यह जमीन और संपत्ति गुरुद्वारे की है और इससे जुड़े मालिकाना हक का विवाद हाई कोर्ट में लंबित है। इस आपत्ति के चलते सक्षम प्राधिकारी ने मुआवजे की राशि को यज्ञ चंद को देने के बजाय एक फिक्स डिपाजिट में रखवा दिया था। 

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