600 करोड़ का मुआवजा बांटने के बाद फोरलेन का प्लान क्यों बदला? हिमाचल हाई कोर्ट ने NHAI से पूछा सवाल
हिमाचल हाई कोर्ट ने शिमला के संजौली में ट्विन ट्यूब टनल निर्माण पर NHAI से जवाब मांगा है। कोर्ट ने ...और पढ़ें

शिमला के संजौली में बन रहा फोरलेन।
HighLights
हाई कोर्ट ने NHAI से टनल योजना बदलने का कारण पूछा।
₹600 करोड़ मुआवजे के बाद बाईपास योजना बदलने पर सवाल।
संजौली टनल से घरों में दरारें, निर्माण कार्य फिलहाल रुका।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने शिमला के संजौली में बन रही ट्विन ट्यूब चलोंठी-संजौली-भट्टाकुफर' टनल के निर्माण को लेकर एनएचएआई को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने एनएचएआई से जवाब मांगा है कि जब शिमला बाईपास परियोजना के लिए पहले ही भूमि अधिग्रहण करके 600 करोड़ का मुआवजा बांटा जा चुका था, तो अचानक उस योजना को छोड़कर घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग बनाने का फैसला क्यों लिया गया।
यह आदेश न्यायाधीश संदीप शर्मा ने संजौली के प्रभावित स्थानीय निवासियों (विनीत शर्मा व अन्य) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से इस असुरक्षित निर्माण कार्य को तुरंत रोकने की गुहार लगाई थी, क्योंकि सुरंग की वजह से उनके घरों में दरारें आ गई हैं और कई मकानों को असुरक्षित घोषित कर दिया गया है।
एनएचएआई ने कोर्ट में रखा पक्ष
सुनवाई के दौरान एनएचएआई की ओर से कोर्ट को आश्वस्त किया गया कि स्थानीय लोगों की सुरक्षा चिंताओं और तकनीकी टीम के इनपुट के बाद 18 सितंबर 2026 से सुरंग का काम पूरी तरह निलंबित है। उन्होंने कहा कि जब तक आईआईटी रुड़की की तकनीकी टीम अपनी सुरक्षा रिपोर्ट नहीं सौंप देती और स्थानीय मकानों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हो जाते, तब तक काम शुरू नहीं किया जाएगा।
अगली सुनवाई तक निर्माण न हो
इस बयान के मद्देनजर कोर्ट ने औपचारिक रोक तो नहीं लगाई, लेकिन उम्मीद जताई कि अगली सुनवाई तक वहां कोई निर्माण गतिविधि नहीं होगी।
जवाब में स्पष्ट करें
हाई कोर्ट ने एनएचएआई को अपने जवाब में स्पष्ट करने को कहा है कि मूल योजना के तहत छकड़ेल, भट्टाकुफर और ढली से होकर एक सरफेस हाईवे (सतही मार्ग) बनना था। इसके लिए लगभग 88 परिवारों को विस्थापित कर उनके घरों को तोड़ा गया और ₹600 करोड़ का भारी-भरकम मुआवजा बांटा गया।
600 करोड़ की भरपाई कौन करेगा
कोर्ट ने पूछा है कि इस योजना को बिना किसी ठोस वजह के छोड़ने से सरकारी खजाने को जो ₹600 करोड़ का नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा। याचिका में पेश दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने पहले ही इस घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग न बनाने की सलाह दी थी, जिसे कथित तौर पर नजरअंदाज कर दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, सिमेट्री (कब्रिस्तान) और विशाल मेगा मार्ट जैसे कुछ स्थानों पर सुरंग और ऊपर बनी सतह (जहां सैकड़ों मकान हैं) के बीच की दूरी महज 14 मीटर है। सुरंग के दोनों तरफ से भारी मात्रा में पानी का रिसाव हो रहा है। इससे पहले शिमला के उपायुक्त ने भी शिकायतों के बाद ब्लास्टिंग के काम को रोकने के निर्देश दिए थे।
अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार और एनएचएआई समेत अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई अब 17 नवंबर 2026 को होगी।
