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'साइबर फ्रॉड की जांच के नाम पर सैलरी अकाउंट फ्रीज करना गैरकानूनी', हिमाचल हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 04 Nov 2026 11:29 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने साइबर अपराध जांच में पूरे बैंक खाते फ्रीज करने को अवैध बताया है। कोर्ट ने ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. पूरा वेतन खाता फ्रीज करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन।

  2. केवल विवादित राशि पर ही रोक लगाने का निर्देश।

  3. पटवारी शिव सिंह के मामले में कोर्ट का अहम आदेश।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने साइबर अपराध की जांच के नाम पर आम नागरिकों के पूरे बैंक खातों को फ्रीज करने की पुलिसिया कार्यप्रणाली पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी एक संदिग्ध या विवादित लेनदेन के कारण किसी व्यक्ति का पूरा सैलरी अकाउंट फ्रीज करना उसके जीने के अधिकार और आजीविका के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। 

न्यायाधीश संदीप शर्मा ने पटवारी शिव सिंह द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने एसबीआई गानवी शाखा को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के सैलरी अकाउंट से पूर्ण डेबिट फ्रीज को तुरंत हटाया जाए और केवल जांच के दायरे में आने वाली ₹21,000 की विवादित राशि पर ही रोक बरकरार रखी जाए।

पटवारी के पद पर कार्यरत है याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता शिव सिंह रामपुर तहसील के गानवी में पटवारी के पद कार्यरत हैं, ने मोबाइल फोन पर गेमिंग एप डाउनलोड की थी। इस एप पर गेम खेलकर उन्होंने ₹21,000 जीते, जो नौ जुलाई 2026 को डिजिटल गेटवे के माध्यम से उनके एसबीआइ सैलरी अकाउंट में क्रेडिट हुए। महाराष्ट्र के ठाणे की साइबर क्राइम पुलिस की शिकायत और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के अलर्ट पर बैंक ने शिव सिंह के खाते के लेनदेन पर रोक लगा दी।

इस खाते से उनका परिवार चलता था, बच्चों की स्कूल फीस, घर का किराया, चिकित्सा खर्च और लोन की ईएमआइ जाती थी, जो ठप हो गई। पीड़ित ने साइबर सेल से लेकर बैंक तक गुहार लगाई, लेकिन जब सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।

कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा, साइबर अपराधों में अकसर जालसाज ठगी की रकम से कुछ खरीदते हैं और पुलिस पैसे के इस ट्रेल का पीछा करते हुए सभी संबंधित बैंक खातों को ब्लाक कर देती है। कई बार निर्दोष लोग बिना गलती के इसका शिकार बन जाते हैं।

याचिकाकर्ता मुख्य आरोपित नहीं

याचिकाकर्ता इस मामले में मुख्य आरोपित नहीं बल्कि अनजाने में लाभ पाने वाला हो सकता है। वेतन संपत्ति का एक रूप है और आजीविका का साधन है। बिना कारण बताओ नोटिस या सुनवाई का अवसर दिए पूरे खाते को ब्लाक करना संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 (जीने और गरिमा के अधिकार) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। जब विवादित राशि स्पष्ट रूप से पहचानी जा चुकी है तो पूरे खाते को फ्रीज करने का तार्किक कारण नहीं बनता।

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