क्या एसडीएम और जज भी सीधे ही बन सकते हैं? हिमाचल में डायरेक्टर डीएसपी बनाने की परंपरा उठा रही सवाल
यह लेख हिमाचल प्रदेश में खिलाड़ियों को सीधे डीएसपी बनाने की परंपरा पर सवाल उठाता है, इसकी तुलना अन्य क्षेत्रों ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश में सीधे डीएसपी बनाने की परंपरा सवाल उठाती है। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
खिलाड़ियों को सीधे डीएसपी बनाने की प्रथा पर सवाल।
सीएम सुक्खू ने सहायक जिला खेल अधिकारी बनाने की घोषणा की।
खेल कोटे से पुलिस में नियुक्ति की उपयोगिता पर बहस।
नवनीत शर्मा, धर्मशाला। क्या कोई सीधे जज बन सकता है? क्या किसी को सीधे एसडीएम नियुक्त किया जा सकता है ? क्या बिना परीक्षा दिए किसी को अध्यापक नियुक्त किया जा सकता है ? यदि नहीं, तो सीधे डीएसपी कैसे बनाया जा सकता है? यह ठीक है कि यदि कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत कर लौटा है तो यह प्रदेश का कर्तव्य है कि उसे सम्मानित किया जाए। लेकिन फिर आग्रह होता है कि क्यों न इन्हें डीएसपी बनाया जाए?
संदेह नहीं कि पदक जीतने वाले युवा प्रदेश और देश का भविष्य, गौरव और मान हैं। उत्कृष्टता का स्वागत किंतु यह उपलब्धि निजी है या सामूहिक? और खेल में उपलब्धि ही नौकरी के लिए एकमात्र उपलब्धि मानी जाए, तो अन्य क्षेत्रों की उपलब्धि के मानक क्या होंगे? यह परंपरा कर दी गई है कि जैसे ही कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा जीत कर आए, उसे डीएसपी बना दो।
सीएम ने किया बदलाव
किंतु अब मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने इन्हीं खिलाड़ियों के सम्मान समारोह में घोषणा की है कि उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को सहायक जिला खेल अधिकारी बनाया जाएगा। पद सृजित किए जाएंगे और वाक इन इंटरव्यू के आधार पर सब अवसर पाएंगे।
सरकारी नौकरी ही क्यों और डीएसपी ही क्यों?
सवाल दो हैं। पहला, सरकारी नौकरी ही क्यों? इसलिए, क्योंकि सरकारी नौकरी को इस पर्वतीय प्रदेश में अब भी चतुर्थ श्रेणी सरकारी नौकरी को भी वास्तविक और प्रथम श्रेणी रोजगार माना जाता है। डीएसपी तो बहुत ऊपर की बात है। मुहावरा है न, 'कच्चों में ही फंसा दो सर, आगे देखा जाएगा।' दूसरा सवाल यह है कि पुलिस में और वहां भी डीएसपी ही क्यों? इनके हुनर का अधिकाधिक लाभ डीएसपी बना कर मिलेगा या अभिरुचि के अनुसार समायोजित करके? क्या यह तय है कि कुशल खिलाड़ी ही कुशल प्रशासक भी होगा? आखिर पुलिस के बारे में यह किसकी मानसिकता है कि किसी को भी डीएसपी बना दो।
जिस व्यक्ति ने अपने 25 हरे वर्ष खेल को दिए हैं, वे पुलिस में जाकर कानून व्यवस्था संभालेगा, अपराधों की गुत्थी सुलझाएगा या खेल में अगली पीढ़ी तैयार करेगा। जितनी संवेदनशील ये सेवाएं हैं, क्या मानस उसके अनुरूप बन पाता है? 'लापता लेडीज' फिल्म में रवि किशन अपने सहयोगी पुलिस कर्मी के बारे में ताना मारने वाले भाव में कहते हैं, ‘ स्पोटर्स कोटा से आए हो न!’
खेल कोटे से जुड़े लोगों ने पुलिस को क्या दिया?
सवाल यह भी कि खेल है क्या? क्रिकेट? जिसके दीवाने तो कई हैं लेकिन खेलते बहुत कम देश हैं। या कबड्डी है, जिसे मूलत: भारतीय खेल समझा जाता है। जिन्हें सब स्थानों पर खेला जाए, उन खेलों में हम कहां हैं। वालीबाल, फुटबाल, हैंडबाल आदि में ढूंढिए न हमें। एक लेखा परीक्षण इस बिंदु का भी होना चाहिए कि आज तक खेल कोटे से जुड़े लोगों ने हिमाचल पुलिस को क्या दिया। हिमाचल प्रदेश में जिन दो लोगों ने बाक्सिंग में भी नाम चमकाया और पुलिस अधिकारी के रूप में भी नाम कमाया, उनमें भगत सिंह ठाकुर हैं या वीरेंद्र शर्मा हैं। दोनों संभवत: सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
पुलिस विभाग में खेल के वातावरण का आलम यह है कि पुलिस मीट के लिए पंद्रह दिन य एक पखवाड़े का प्रशिक्षण हो गया, बाकी सारा साल सन्नाटा। जबकि सेना या रेलवे में इस निमित्त जो संकाय हैं वे एक निश्चित कैलेंडर के अनुसार निरंतर अभ्यास करते हैं।
हिमाचल प्रदेश में डीएसपी बनने का अर्थ है, न पुलिस का ही हो पाना और न खेलों के ही रह जाना। कुछ ऐसे भी दिखे हैं जो रील तो वर्दी में बनाएंगे लेकिन अपराध के पश्चात घटनास्थल पर ट्रैक सूट या साड़ी में पहुंचेंगे।
यदि देश के लिए कुछ करना, कोई पदक जीत कर लाना डीएसपी की नौकरी के योग्य बना देता है तो किसी इंटरनेशनल जर्नल में छपे शोध के बाद शोधार्थी को सीधे ही प्रोफेसर क्यों नहीं बना दिया जाता। नेट, सेट का झंझट ही क्यों हो मीलार्ड? दोहराना आवश्यक है इसी तर्ज पर हर विभाग में नियुक्तियां हों। कोई वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रदेश या देश का प्रतिनिधित्व कर दे तो इन मानकों के अनुसार वह अच्छा वकील या जज हो सकता है?
कोटा और नियमों पर विचार आवश्यक
समय के साथ कोटा और नियमों पर विचार करना आवश्यक है कि कोई समय था जब उपलब्ध में से बेहतर की प्रशंसा करना आवश्यक था। अब समय बदला है, जो लोग अच्छा कर रहे हैं, उनसे यह उम्मीद करनी चाहिए कि वे औरों को भी अच्छा बनाएं, स्वयं जैसा, अपितु स्वयं से भी बेहतर बनाएं। लेकिन एक ईमानदार हिसाब यह भी हो कि कितनी आज तक कितनी डिकी डोलमा और सुमन रावत मिली हैं प्रदेश को?
रोजगार के संकट का सत्य यह है कि प्रदेश हो या देश, यह संकट कुशल या हुनरमंद लोगों के लिए नहीं है। जो केवल शिक्षित हैं, उनके बारे में क्या कहें? अब तो यह देखने का समय भी है कि हर विभाग या कार्यक्षेत्र में क्या वास्तव में वही लोग हैं, जिन्हें वहां होना चाहिए या फिर वे कच्चे से पक्के होने के पथ पर चले भावहीन पथिक हैं?
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