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हिमाचल में दिखने लगा जलवायु परिवर्तन का असर: 4 जिलों की 12 पंचायतों में हुए अध्ययन में दिखे बदलाव

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 01 Nov 2026 01:53 PM (IST)

हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से ग्रामीण आजीविका और खेती के पारंपरिक तरीके बदल रहे हैं, जहाँ किसान सेब की ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। प्रतीकात्मक फोटो

हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. जलवायु परिवर्तन से हिमाचल में ग्रामीण आजीविका, खेती प्रभावित।

  2. किसान सेब की जगह नए फल, जल संरक्षण अपना रहे।

  3. स्थानीय अनुकूलन प्रयासों को सरकारी योजनाओं से जोड़ें: अध्ययन।

राज्य ब्यूरो, शिमला। जलवायु परिवर्तन का असर अब हिमाचल के पहाड़ों में मौसम तक सीमित नहीं रहा है। इससे ग्रामीणों की आजीविका और खेती-बागवानी के पारंपरिक तौर-तरीके भी बदलने लगे हैं। कहीं सेब के बगीचों की जगह जापानी फल और अनार की खेती अपनाई जा रही है, तो कहीं पानी की किल्लत से निपटने के लिए सूखते जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने और वर्षा जल संग्रहण के प्रयास हो रहे हैं। बदलती जलवायु के बीच ग्रामीण समुदाय अपने स्तर पर अनुकूलन के रास्ते तलाश रहे हैं।

अध्ययन रिपोर्ट में सामने आए तथ्य

शिमला में आयोजित हिमालयी समुदायों में जलवायु अनुकूलन और आपदा जोखिम पर राष्ट्रीय संवाद में जारी एक अध्ययन रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आए हैं। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) और इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आइसीआइएमओडी) के अध्ययन में ग्रामीण क्षेत्रों में जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए 25 समाधान सुझाए गए हैं। रिपोर्ट में स्थानीय स्तर पर हो रहे प्रयासों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।

4 जिलों की 12 पंचायतों पर हुआ अध्ययन

सीईईडब्ल्यू की प्रोग्राम लीड श्रेया वधावन ने बताया कि संस्था ढाई साल से हिमाचल के चार जिलों मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला की 12 पंचायतों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रही है। ग्रामीणों से संवाद के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि बदलते मौसम का उनकी आजीविका पर क्या असर पड़ रहा है और वे इससे निपटने के लिए क्या उपाय अपना रहे हैं।

किसान तलाश रहे विकल्प

अध्ययन में सामने आया कि मौसम में बदलाव के कारण किसान फसलों के विकल्प तलाश रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में सेब के स्थान पर जापानी फल की खेती अपनाई जा रही है, जबकि पानी की कमी वाले इलाकों में जल संग्रहण और जलस्रोतों के संरक्षण पर काम हो रहा है।

वधावन ने कहा कि ग्रामीणों के अनुभवों और स्थानीय स्तर पर विकसित समाधानों को सरकारी योजनाओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि इन प्रयासों को व्यापक स्तर पर लागू किया जा सके और प्रभावित समुदायों की आजीविका सुरक्षित रहे।

ग्लेशियरों से पहाड़ों की ढलानों तक बढ़ रहा खतरा

आइसीआइएमओडी की सीनियर लाइवलीहुड्स एंड माइग्रेशन स्पेशलिस्ट और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) की सातवीं आकलन रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका डा. अमीना महर्जन ने कहा कि हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और बारिश व बर्फबारी के पारंपरिक पैटर्न में बदलाव आ रहा है। इसका असर पहाड़ों की ढलानों की स्थिरता पर भी पड़ रहा है, जिससे आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है। 

उन्होंने कहा कि आपदाओं के दौरान लोगों की जान बचाने के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल चेतावनी जारी करना पर्याप्त नहीं है। लोगों को संभावित खतरे की गंभीरता समझाना और समय रहते सुरक्षित कदम उठाने के लिए तैयार करना भी जरूरी है। इसके लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आपदा से निपटने की तैयारी को मजबूत करना होगा।

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