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देशभर में दीवाली की धूम, हिमाचल के इन गांवों में महीने बाद मनाया जाता है पर्व; अनोखी परंपरा के पीछे रोचक तथ्य

By Jaswant ThakurEdited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 08 Nov 2026 01:51 PM (IST)Updated: Sun, 08 Nov 2026 02:50 PM (IST)

देशभर में दीपावली धूमधाम से मनाई जा रही है, लेकिन हिमाचल के कुल्लू, मनाली और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में 'बूढ़ी दीवाली' एक महीने बाद मनाई जाती है।

हिमाचल के दुर्गम गांवों में मशालें लेकर बूढ़ी दीवाली मनाते लोग। जागरण आर्काइव

हिमाचल के दुर्गम गांवों में मशालें लेकर बूढ़ी दीवाली मनाते लोग। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. हिमाचल के कुछ क्षेत्रों में बूढ़ी दीवाली एक माह बाद।

  2. भगवान राम के लौटने की खबर देर से पहुंचने की मान्यता।

  3. मशालें जलाकर, पारंपरिक नृत्य और रस्साकशी से मनाते हैं।

जसवंत ठाकुर, मनाली। देशभर में एक ओर जहां दीपावली पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में एक महीने बाद यह उत्सव मनाया जाएगा। जिला कुल्लू में मनाली घाटी और निरमंड-आनी जैसे दुर्गम क्षेत्रों में ठीक एक महीने बाद कार्तिक मास की अमावस्या को बूढ़ी दीवाली मनाई जाएगी। 

कुल्लू के अलावा मंडी के कुछ ग्रामीण क्षेत्र में, सिरमौर जिले के गिरीपार इलाके में, साथ ही शिलाई, संगड़ाह और राजगढ़ में, शिमला जिले के चौपाल, खाटनोल पंचायत के पंजियाली गांव सहित कई ऊपरी पर्वतीय गांवों में भी बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है। 

पटाखों से भी दूरी

इन क्षेत्रों के लोग पटाखों से भी दूरी बनाए रखते हैं। हालांकि युवा पीढ़ी अब दिवाली पर्व भी मना रही है, लेकिन असली दीवाली जिसे स्थानीय भाषा में लोकल दियाली या बूढ़ी दियाली कहते हैं, उसकी धूम एक महीने बाद होगी।

लोकल दीवाली पर्यावरण फ्रेंडली होती है, जबकि दीवाली में पटाखे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। यही कारण है कि यहां के लोग अपनी पुरानी परंपरा को आज भी पूरी आस्था के साथ निभा रहे हैं।

एक महीने बाद मनाने के पीछे मान्यता

मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे, तो इसकी सूचना दुर्गम और बर्फ से ढके पहाड़ी इलाकों तक एक महीने बाद पहुंची थी। इसी कारण यहां मुख्य दीवाली के एक महीने बाद यह त्योहार मनाया जाता है।

मुख्य परंपराएं

  • रात के समय देवदार और चीड़ की लकड़ी से बनी बड़ी मशालें (दाव) जलाई जाती हैं। पूरा गांव मशालों की रोशनी से जगमगा उठता है।
  • पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर नाटी, हुड़क, बुढ़ियात और बड़ेचू नृत्य किए जाते हैं। गांव के बूढ़े-बच्चे, जवान सभी इन नृत्यों में भाग लेते हैं।
  • कौरव और पांडवों के प्रतीक के रूप में मुंज घास की रस्सी से रस्साकशी (टग-ऑफ-वार) का आयोजन होता है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।

परंपरा और पर्यावरण का संगम

बूढ़ी दिवाली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, आस्था और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। इस दौरान स्थानीय लोग तरह तरह के पारंपरिक व्यंजन बनाते है। बिना पटाखों, बिना धुएं के, सिर्फ मशालों की रोशनी, लोकनृत्य और सामूहिक उल्लास के साथ मनाई जाने वाली यह दीवाली आज के दौर में भी लोगों को प्रकृति के करीब रहने का संदेश देती है।

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