IIT मंडी का अहम शोध: हनीपॉट तकनीक से साइबर गिरोहों को भटकाने में मिलेगी मदद
IIT मंडी के शोध से पता चला है कि हैकर अब संगठित होकर काम करते हैं, जिससे उनकी सक्रियता बढ़ती ...और पढ़ें

आईआईटी मंडी ने साइबर गिरोह से निपटने को लेकर अहम शोध किया है। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
संगठित हैकर टीम बनाकर अधिक सक्रियता से काम करते हैं।
IIT मंडी शोध ने हनीपॉट की साइबर सुरक्षा क्षमता जांची।
हनीपॉट तकनीक असली सिस्टम को बचाने में सहायक हो सकती है।
हंसराज सैनी, मंडी। साइबर अपराध की दुनिया में हैकर अब संगठित होकर काम कर रहे हैं। वे सूचनाएं साझा करते हैं और मिलकर रणनीति बनाते हैं। आइआइटी मंडी के शोध से पता चला है कि टीम बनाकर काम करने से हैकरों की सक्रियता बढ़ती है और वे ज्यादा सिस्टम को निशाना बनाते हैं, लेकिन असली और नकली सिस्टम (हनीपाट) की पहचान करने में अधिक सफल नहीं हो पाते हैं।
यह शोध आइआइटी मंडी के स्कूल आफ कंप्यूटिंग एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर वरुण दत्त के नेतृत्व में किया गया। शोध टीम में शुभम शर्मा, शुभम ठाकुर और अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ टेक्सास एट एल पासो की पल्लवी अग्रवाल शामिल थे।
किस तरह हुआ शोध
अध्ययन को ह्यूमन फैक्टर्स एंड एर्गोनामिक्स सोसायटी की 70वीं अंतरराष्ट्रीय वार्षिक बैठक की कार्यवाही में प्रकाशित किया गया है। शोध के लिए टीम ने हैकआइटी सिमुलेशन प्लेटफार्म का इस्तेमाल किया। कंप्यूटर साइंस के 40 स्नातक विद्यार्थियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह के प्रतिभागियों ने अकेले काम किया, जबकि दूसरे समूह के प्रतिभागियों ने टेक्स्ट चैट के माध्यम से एक-दूसरे से सहयोग करते हुए काम किया।
उनके सामने रिंग संरचना में जुड़े 40 सिमुलेटेड कंप्यूटर सिस्टम का नेटवर्क था, जिसमें 75 प्रतिशत सिस्टम नकली यानी हनीपाट थे। प्रतिभागियों को बताया गया कि नेटवर्क में नकली सिस्टम मौजूद है, लेकिन उनकी सही स्थिति नहीं बताई गई। हर प्रतिभागी को प्रयोग के लिए 10 मिनट मिले।
अकेले काम करने वालों ने औसतन 4.45 हनीपाट पर हमले किए, जबकि टीम में काम करने वालों ने औसतन 7.85 नकली सिस्टमों को निशाना बनाया। कुल एक्सप्लाइट गतिविधियां भी अकेले काम करने वालों में 6.60 और टीम में काम करने वालों में 9.95 रही। वास्तविक सिस्टम पर हमले के मामले में दोनों समूहों का प्रदर्शन लगभग समान रहा।
कुल एक्सप्लाइट गतिविधियां बढ़ीं
अकेले काम करने वालों ने औसतन 2.15 और टीम में काम करने वालों ने 2.10 वास्तविक सिस्टम पर एक्सप्लाइट गतिविधियां कीं। इस प्रयोग में सहयोग से कुल एक्सप्लाइट गतिविधियां बढ़ीं, लेकिन वास्तविक सिस्टम को निशाना बनाने में सुधार नहीं दिखा। सहयोग वाली स्थिति में प्रतिभागी टेक्स्ट चैट से जानकारी साझा कर सकते थे और उन्होंने अधिक खोजपरक एक्सप्लाइट गतिविधियां कीं। शोधार्थियों के अनुसार, सामूहिक अति-आत्मविश्वास और गलत धारणाएं इस व्यवहार की संभावित व्याख्याएं हो सकती हैं।
अध्ययन के अनुसार, साइबर सुरक्षा में हनीपाट तकनीक प्रभावी हो सकती है। नकली सिस्टम के जाल में हमलावरों को उलझाकर असली सिस्टम की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त समय मिलने की संभावना है। हालांकि, अध्ययन विद्यार्थियों, रिंग संरचना वाले छोटे सिमुलेटेड नेटवर्क और टेक्स्ट चैट आधारित सहयोग तक सीमित था। यह अध्ययन संगठित साइबर हमलों से निपटने की दिशा में नई राह दिखाता है।
-प्रोफेसर वरुण दत्त, आइआइटी मंडी।
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