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कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार: 'मुआवजा मिला पर यादों की कीमत कौन चुकाएगा', घर छोड़ते भावुक हुए लोग; 12 मकान खाली

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 21 Oct 2026 12:21 PM (IST)Updated: Wed, 21 Oct 2026 12:35 PM (IST)

कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार के चलते रछियालू और कियोड़िया के परिवार अपने घर खाली कर रहे हैं। मुआवजे के बावजूद, लोग ...और पढ़ें

रछियालू में घर छोड़ते प्रभावित परिवार व तोड़ा गया मकान। जागरण

रछियालू में घर छोड़ते प्रभावित परिवार व तोड़ा गया मकान। जागरण

HighLights

  1. कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार के लिए घर खाली।

  2. मुआवजा मिला, पर यादों का दर्द गहरा।

  3. बुजुर्गों को पुराने घर छोड़ने की भारी पीड़ा।

राजकुमार चौधरी, चैतड़ू (कांगड़ा)। घर केवल ईंट, सीमेंट और पत्थरों से नहीं बनता। उसमें परिवार की वर्षों की मेहनत, जीवनभर की कमाई और पीढ़ियों की यादें जुड़ी होती हैं। ऐसे में जब अपनी आंखों के सामने घर टूटने लगे तो दर्द दीवारों के गिरने तक सीमित नहीं रहता। यह पीड़ा तब और भी बढ़ जाती है जब अपना घर खुद तोड़ना पड़े। गगल स्थित कांगड़ा एयरपोर्ट के विस्तारीकरण के लिए रछियालू और कियोड़िया गांव में इन दिनों ऐसा ही भावुक दृश्य देखने को मिल रहा है।

मुआवजा मिलने के बाद खाली कर रहे घर

भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (आरएंडआर) के तहत मुआवजा मिलने के बाद प्रभावित परिवार घर खाली कर रहे हैं। कई परिवार अपने हाथों से ही मकानों को डिस्मेंटल करने में जुटे हैं। दोनों गांवों में 12 मकान खाली हो चुके हैं और कई परिवारों की जिंदगी का एक पुराना अध्याय समाप्त होने की ओर है।

मुआवजा मिला, लेकिन यादों की कीमत कौन चुकाएगा

एयरपोर्ट विस्तार के लिए प्रभावित परिवारों को भूमि अधिग्रहण और आरएंडआर प्रक्रिया के तहत मुआवजा मिला है। कई परिवार भविष्य को ध्यान में रखते हुए नए मकान भी तैयार कर चुके हैं। इसके बावजूद पुराने घरों से बिछड़ने का दर्द कम नहीं हुआ है। नई जगह पर जीवन शुरू करने की चुनौती के बीच उनका मन अब भी पुराने घरों और गांव में अटका है।

बुजुर्गों के चेहरे पर पीड़ा

घर छोड़ने की पीड़ा उन बुजुर्गों के चेहरों पर खासतौर पर दिख रही है, जिन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा इन्हीं घरों में बिताया है। रछियालू गांव के 80 वर्षीय पुरुषोत्तम चंद के लिए यह विदाई केवल मकान से दूर होने की नहीं, बल्कि जीवनभर की यादों से अलग होने जैसी है।

बिताए थे सुख-दुख के पल

रेखा देवी और 45 वर्षीय परवीन समेत अन्य प्रभावित परिवार भी पुराने घर छोड़ने की पीड़ा से गुजर रहे हैं। जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं और जिन कमरों में कई पीढ़ियों ने सुख-दुख के पल बिताए, आज उन्हें खाली करना पड़ रहा है।

80 साल की जिंदगी की यादें समेटना आसान नहीं

पुरषोत्तम चंद जैसे बुजुर्गों के लिए घर सिर्फ रहने की जगह नहीं होता। उसकी हर दीवार, कोना और आंगन जीवन के कई दशक समेटे रहता है। बचपन से बुढ़ापे तक का सफर, त्योहारों की खुशियां, रिश्तेदारों का आना-जाना और कठिन समय में अपनों का साथ-ये सभी यादें घर से जुड़ी होती हैं। उम्र के इस पड़ाव पर पुराने घर को छोड़ने की नौबत आने पर एक ओर नए स्थान पर बसने की मजबूरी है तो दूसरी ओर उस जगह से बिछड़ने की कसक, जहां पूरी जिंदगी गुजरी। 

रछियालू के 65 वर्षीय मस्त राम, रेखा और अन्य प्रभावित परिवारों के लिए भी यह समय आसान नहीं है। घर खाली करना केवल सामान समेटने तक सीमित नहीं, इसके साथ उन यादों से भी विदा लेनी पड़ती है जो लंबे समय से जीवन का हिस्सा रही हैं।

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