हिसार, [पवन सिरोवा]। आज विकास और आधुनिकता के दौड़ में हमारी सामाजि‍क विरासत और संस्‍कृति पीछे छूटती जा रही हैं। ऐसे माहौल में हिसार की कुछ म‍हिलाएं संस्‍कृति की सारथी बनी‍ हैं। उन्‍होंने एक अनोखा ग्रुप बनाया है और इसका नाम भी संस्‍कृति रखा है। इसमें हर वर्ग की महिलाएं शामिल हैं और सांस्‍कृतिक धरोहरों को खास अंदाज में संजा रही हैं।

दरअसल, पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग इतने व्यस्त हैं कि संस्कृति पीछे छूट रही है। जिस विरासत के बदौलत हमारी अलग पहचान बनी है, उसे सहेजने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम ही रही है। ऐसे में हिसार की महिलाओं का एक समूह अनमोल सभ्यता और संस्कृति को संजोने के लिए सभी त्योहार मनाता है।

ये महिलाएं गृहिणी से लेकर कारोबारी हैं जो देश के अलग-अलग राज्यों के त्योहारों को परंपरागत तरीके से मनाती हैं। हर त्योहार में नई पीढ़ी की युवतियों को भी साथ जोड़कर कार्यक्रम किया जाता है ताकि वे संस्कृति और विरासत से रूबरू हो। इसके लिए महिलाओं ने बकायदा संस्कृति नाम की संस्था बना रखी है जिसके जरिए पारंपरिक वेशभूषा में त्योहार मना वे सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा सकें।

ऐसे बनी संस्था

शहर के धनाढ्य परिवार से जुड़ी रेनू लाहौरिया और विनीता जैन दोनों एक दूसरे से कई सालों से परिचित हैं। दोनों चाय पार्टी के दौरान बातचीत कर रही थीं कि बातचीत का केंद्र बिंदु सांस्कृतिक भटकाव पर आकर ठहर गया। नियोजन किया कि समृद्ध परिवारों की जो महिलाएं अपनी दिनचर्या से बाहर नहीं निकल पा रही हैं उन सबको साथ लेकर देश की सभ्यता और संस्कृति से रूबरू करवाया जाए।

उन्होंने शहर के समृद्ध परिवारों की गृहिणी, चिकित्सक, शिक्षिका और कारोबारी महिलाओं से बातचीत की और विचार साझा किए। अगस्त 2019 में संस्कृति नाम की एक संस्था बनाई। जिसकी प्रधान विनीता जैन और उपप्रधान रेनू लाहौरिया है। बाद में इसका और विस्तार किया गया। अब संस्था से 270 परिवारों की महिलाएं सीधे जुड़ चुकी हैं जो त्योहार व कार्यक्रम एक साथ मिलकर आयोजित करती हैं। इन कार्यक्रमों में शहर के प्रतिठति लोग शिरकत करते हैं। कोरोना में कार्यक्रमों का आयोजन ऑनलाइन हो गया है।

स्वदेशी को दे रहीं बढ़ावा

भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संजोने के साथ-साथ ये स्वदेशी को भी बढ़ावा दे रही हैं। साल 2020 में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर संस्था से जुड़ी चिकित्सक, कारोबारी, शिक्षिका और गृहिणी सभी ने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने के स्वयं तैयार की। मिठाई भी घर पर ही बनाई। उन्होंने संस्था के माध्यम से स्वदेशी सामान को अपनाया और दूसरों से भी स्वदेशी अपनाने की अपील की।

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'' हमारी संस्कृति को कुछ लोग टेलीविजन पर हो रहे कार्यक्रमों के हिसाब से समझने लगे थे। समाज का यह प्रभावी वर्ग था लिहाजा खतरा बड़ा था। इसे समझते हुए हम सबने मिलकर संस्कृति नामक संस्था बनाई जिसके माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा सकें।

                                                                                                  - विनीता जैन, प्रधान, संस्कृति ग्रुप।

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