गुरुग्राम [प्रियंका दुबे मेहता]। इस शादी के सीजन में लोग परिधानों पर खास पैसे नहीं लगाना चाह रहे हैं। कम लोग, शराट्कट शादियां, वक्त और पैसों की कमी, वजह चाहे जो भी हो। लोग इस बार महंगे परिधानों पर पैसे लगाने की बजाए सेविंग करते हुए फैशन में रहने और बेहतर दिखने के नए तरीके तलाश रहे हैं।

पुराने को नया करना, यानी रीफर्बिशिंग या रीस्ट्रक्चरिंग, यही देखने को मिल रहा है पारंपरिक परिधानों के केस में। लोग लहंगे, साड़ियां सूट, शरारा आदि बनवाने की बजाय अब कपड़ों की रिफर्बिशिंग और रिस्ट्रक्चरिंग करवा रहे हैं।

इसमें लोग अपने पुराने लहंगे या पारंपरिक परिधानों को थोड़ा सा ट्विस्ट देकर नए और ट्रेंड के मुताबिक परिधान बनवा रहे हैं। थोड़ा सा वर्क, अलग सेटिंग और लेस लगवा कर कपड़ों की रिस्ट्रक्चरिंग हो रही है। वैसे तो रिस्ट्रक्चरिंग का दौर तब शुरू हुआ था जब तमाम नेताओं और बॉलीवुड अभिनेत्रियों ने अपनी शादियों में अपनी मां के लहंगे पहनकर एक नया ट्रेंड स्थापित किया था, लेकिन अब जरूरत और वक्त ने एक बार फिर से लोगों को इसकी तरफ झुकाया है। अब लोग 20 साल पुरानी साड़ियों लहंगो और सूट शादी को थोड़े से बदलाव से नया लुक दे रहे हैं फैशन डिजाइनर रितिका अग्रवाल का कहना है कि पार्टी और फंक्शनल परिधान होते तो बहुत महंगे हैं लेकिन पहने सिर्फ एक-आध बार ही जाते हैं। खासकर आज के सोशल हैंडल वाले जमाने में लोग एक से अधिक फंक्शन में एक तरह के परिधान नहीं पहनना चाहते। ऐसे में वे अपने फंक्शनल परिधानों में छोटे-छोटे बदलाव करके उसको अलग लुक देने के लिए कहते हैं।

ऐसे हो रही है रिस्ट्रक्चरिंग

लोग अपने पुराने लहंगे के साथ नए पैटर्न का ब्लाउज बनवा रहे हैं। इसमें आफशोल्डर, कोल्ड शोल्डर, बैकलेस और बोट नेक बनवाए जा रहे हैं ताकि स्टाइल लेटेस्ट लगे। इसके अलावा दुपट्टा भी इसी तरह का बनवाया जा रहा है जो कि नए फैशन के अनुसार लगे। इसमें दुपट्टे में सीक्विन वर्क और पेस्टल रंग पसंद किए जा रहे हैं। यह रंग इन दिनों काफी चलन में हैं। इसके अलावा बहुत पुराने लहंगों का पैचवर्क भी उपयोग में लाया जा रहा है। फऐशन डिजाइन सिल्की नंदा का कहना है कि पहले की कशीदाकारी अधिकतर हाथ की होती थी। जोकि बहुत अच्छी क्वालिटी की होती थी। देखने में यह आता है कि कपड़े पुराने होकर फट जाते हैं लेकिन उनकी कशीदाकारी रह जाती है। अब लोग इसके कशीदेवाले हिस्से को काटकर नए कपड़े पर उसे लगाकर परिधान बना रहे हैं। इस तरह के छोटे बदलावों से लोगों को कम पैसों और कम वक्त में नये परिधान मिल रहे हैं। फैशन डिजाइनर्स को भी बदले माहौल का अंदाजा है, ऐसे में वे भी इस तरह के प्रयोगों से गुरेज नहीं कर रहे हैं।

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