निकिता कुमारी: 17 साल की उम्र, एशियन गेम्स का फाइनल और अंगुली में लगी चोट; फिर जो हुआ वो चमत्कार था
एशियन गेम्स कबड्डी फाइनल में निकिता कुमारी ने अंगुली की चोट के बावजूद मैदान पर डटे रहकर भारतीय टीम को ईरान के खिलाफ स्वर्ण पदक जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

HighLights
एशियन गेम्स कबड्डी फाइनल में निकिता कुमारी चोटिल हुईं।
अंगुली में चोट लगने पर भी निकिता ने हार नहीं मानी।
भारत ने ईरान को 37-34 से हराकर स्वर्ण पदक जीता।
आदित्य राज, गुरुग्राम। अंगुली में लगी चोट का दर्द चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन आंखों में देश के लिए जीत का जुनून उससे कहीं ज्यादा मजबूत था। एशियन गेम्स के कबड्डी फाइनल में ईरान के खिलाफ मुकाबले के दौरान गुरुग्राम की 17 वर्षीय निकिता कुमारी चोटिल हो गईं।
कुछ पल के लिए लगा कि शायद उनका मुकाबला यहीं खत्म हो जाएगा। साथी खिलाड़ी और टीम स्टाफ उनकी चोट को लेकर चिंतित दिखे, लेकिन निकिता ने हार मानने से इनकार कर दिया। उपचार के बाद वह फिर मैदान में लौटीं और आखिरी सीटी तक भारतीय टीम के साथ डटी रहीं।

यह सिर्फ मैदान पर वापसी नहीं थी, बल्कि उस जज्बे की तस्वीर थी जिसमें देश की जर्सी पहनने के बाद खिलाड़ी अपना दर्द भूल जाता है। फाइनल में ईरान ने भारत को कड़ी चुनौती दी। स्कोर लगातार ऊपर-नीचे होता रहा और मुकाबला अंतिम क्षणों तक रोमांचक बना रहा।
गांव के सरकारी स्कूल से शुरू हुआ कबड्डी का अभ्यास
ऐसे दबाव में चोट के बावजूद निकिता का मैदान पर बने रहना भारतीय टीम के संघर्ष को मजबूती देता रहा। आखिरकार भारत ने ईरान को 37-34 से हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया। हरियाणा के हांसी जिले के गांव हसनगढ़ की रहने वाली निकिता वर्तमान में गुरुग्राम के द्रोणाचार्य राजकीय महाविद्यालय में प्रथम वर्ष की छात्रा हैं।
आठ वर्ष की उम्र में गांव के सरकारी स्कूल से कबड्डी का अभ्यास शुरू करने वाली निकिता ने धीरे-धीरे जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं। कम उम्र में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा का ऐसा परिचय दिया कि अंडर-18 भारतीय टीम की कप्तानी करने का अवसर मिला।
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कप्तान के रूप में टीम को स्वर्ण पदक दिलाने के बाद अब पहली बार सीनियर भारतीय टीम के साथ एशियन गेम्स में उतरकर उन्होंने अपने खाते में सबसे बड़ा पदक जोड़ लिया। ग्रुप चरण में भी निकिता का सामना ईरान से हुआ था।
भारत ने उस मुकाबले में ईरान को 37-23 से हराया था। लेकिन फाइनल का दबाव अलग था। मुकाबला करीबी था और हर अंक महत्वपूर्ण। इसी बीच लगी अंगुली की चोट ने चुनौती और बढ़ा दी। निकिता के लिए आसान रास्ता मैदान छोड़ देना था, लेकिन उन्होंने वापसी का रास्ता चुना।
चोट के बावजूद मैदान में डटे रहना जज्बे की मिसाल
कालेज में निकिता को प्रशिक्षित करने वाली कबड्डी विशेषज्ञ, पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सुनील डबास का कहना है कि निकिता ने कम उम्र में जिस तरह बड़े मंच पर खुद को साबित किया है, वह उसकी मेहनत और अनुशासन का परिणाम है। चोट के बावजूद मैदान में डटे रहना उसके मजबूत जज्बे को दिखाता है।
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निकिता की कहानी केवल एक स्वर्ण पदक तक सीमित नहीं है। गांव के छोटे से मैदान से शुरू हुआ सफर एशियन गेम्स के मंच तक पहुंचा है। पढ़ाई के साथ खेल को आगे बढ़ा रही निकिता ने यह साबित किया है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, लक्ष्य बड़ा हो तो चोट भी हौसला नहीं तोड़ सकती।
