'भविष्य में ऐसी हिम्मत मत करना', पूर्व न्यायिक अधिकारी पर टिप्पणी को लेकर वडोदरा कलेक्टर पर भड़का गुजरात हाई कोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने वडोदरा कलेक्टर अनिल धमेलिया को एक हलफनामे में पूर्व न्यायिक अधिकारी पर अनुचित टिप्पणी करने के लिए कड़ी फटकार लगाई है।

वडोदरा कलेक्टर को हाईकोर्ट ने अनुचित टिप्पणी पर फटकारा

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, अहमदाबाद। गुजरात हाईकोर्ट ने वडोदरा कलेक्टर अनिल धमेलिया को कड़ी फटकार लगाई है। उन्होंने एक हलफनामे में गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण के तत्कालीन न्यायिक सदस्य और प्रभारी अध्यक्ष के बारे में गैर-जरूरी और गलत बातें कही थीं।
पिछले हफ्ते शुक्रवार को अपने आदेश में जस्टिस निराल मेहता की एकल पीठ ने कहा कि तत्कालीन न्यायिक अधिकारी के बारे में कलेक्टर द्वारा बताई गई बातें पूरी तरह से अनावश्यक थीं।
27 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे 27 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई तक धमेलिया के खिलाफ आगे की कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार करें।
अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कलेक्टर के 17 अगस्त, 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जो 'गैर-कृषि' उपयोग की अनुमति से जुड़ा था। यह अनुमति 'गुजरात भूमि राजस्व संहिता 1879' की धारा 65 के तहत मांगी गई थी लेकिन कलेक्टर ने इसे खारिज कर दिया था।
उन्होंने कहा था कि गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण के समक्ष पहले से ही तीन पुनरीक्षण आवेदन लंबित हैं। याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के सामने दावा किया कि न्यायाधिकरण के समक्ष कोई भी पुनरीक्षण आवेदन लंबित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके आवेदन को इस आधार पर खारिज करना कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।
इसके बाद हाई कोर्ट ने कलेक्टर को एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसी हलफनामे में उन्होंने तत्कालीन न्यायिक अधिकारी के खिलाफ ऐसी टिप्पणियां कीं, जिससे अदालत नाराज हो गई।
कलेक्टर द्वारा बताई गई बातें पूरी तरह से गलत: हाई कोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि हलफनामे में न्यायाधिकरण के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष के बारे में कलेक्टर द्वारा बताई गई बातें 'पूरी तरह से अनुचित' थीं। पहली नजर में ऐसा लगता है कि उनका मकसद केवल उस अधिकारी की छवि खराब करना था।
हाई कोर्ट की पीठ ने कहा, 'शपथ के तहत इस तरह की पूरी तरह से अप्रासंगिक बातें कहना न केवल परेशान करने वाला है, बल्कि यह अपमानजनक भी है।
जैसा कि पहले बताया गया है, कानून के अनुसार किसी भी आदेश को चुनौती दी जा सकती है; लेकिन, जिस आदेश को चुनौती दी जा रही है, उसके लेखक का नाम किसी दूसरी कानूनी कार्यवाही में घसीटना बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।'
अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि हाई कोर्ट की टिप्पणियों और आलोचनाओं के बाद किसी न्यायिक अधिकारी को सेवा से हटा दिया गया था उसके द्वारा पारित सभी आदेश अपने आप अमान्य नहीं हो जाते। जब तक कि उन्हें कानून के अनुसार रद न कर दिया जाए, वे प्रभावी बने रहेंगे।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी स्थिति में, केवल उस न्यायिक अधिकारी का नाम लेकर उसके द्वारा दिए गए न्यायिक आदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने वर्चुअल तरीके से मौजूद कलेक्टर से कहा कि उनकी माफी स्वीकार नहीं की जाएगी और उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए जाएंगे।
भविष्य में भी ऐसा करने की हिम्मत मत करना: हाई कोर्ट
अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, 'क्या आपको जरा भी अंदाजा है कि आपने क्या किया है? आप एक न्यायिक अधिकारी पर आरोप लगा रहे हैं कि वह मामले को सही नजरिए से नहीं देख रहे थे।
क्या आप ऐसा कर रहे हैं? आप किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ इस तरह की कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। भविष्य में भी ऐसा करने की हिम्मत मत करना।'
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि कलेक्टर की औपचारिक माफी में न तो कोई सच्चा पछतावा दिखता है और न ही इस बात का कोई भरोसा मिलता है कि ऐसी हरकत दोबारा नहीं दोहराई जाएगी।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि कलेक्टर के दर्जनों ऐसे आदेश अदालत के सामने आए हैं, जो गैर-कृषि उपयोग की अनुमति मांगने वाले आवेदनों से जुड़े हैं।
आदेश में कहा गया है कि ऐसे सभी मामलों में उन्होंने इस अदालत द्वारा तय किए गए कानूनी सिद्धांतों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया है और अपनी खुद की समझ के आधार पर आवेदनों पर फैसला लिया है।
पहले से अवमानना की कार्यवाही का सामना कर रहे कलेक्टर
अदालत ने यह भी गौर किया कि कलेक्टर पहले से ही अदालत की अवमानना की कार्यवाही का सामना कर रहे हैं, जिसमें हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 29 अप्रैल के एक आदेश के जरिए उनके खिलाफ आरोप तय किए थे।
हाई कोर्ट ने कहा कि अवमानना की इन कार्यवाहियों के बावजूद कलेक्टर के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। अदालत ने सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को इस मामले में एक पक्ष (प्रतिवादी) के रूप में शामिल किया।
अदालत ने उन्हें निर्देश दिया कि वे सुनवाई की अगली तारीख तक अब तक की गई जांच के निष्कर्षों और कलेक्टर के खिलाफ आगे की जाने वाली किसी भी प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में अदालत को सूचित करें।
यह भी पढ़ें- महिला वकील से 186 बार बात और 3 बेनामी फोन, पूर्व जज को राहत देने से गुजरात हाई कोर्ट का इनकार
यह भी पढ़ें- गुजरात हाई कोर्ट से आप विधायक चैतर वसावा को बड़ा झटका, जमानत और सजा पर रोक की याचिका खारिज
