'सबसे ज्यादा टाइपकास्टिंग...', Narayani Shastri ने खोली टीवी इंडस्ट्री की पोल; महादेव एंड संस में किया खूब ड्रामा
टीवी इंडस्ट्री में 10 साल से अधिक समय बिता चुकीं नारायणी शास्त्री ने बताया कि वह बॉलीवुड से दूर क्यों ...और पढ़ें

नारायणी शास्त्री के साथ खास बातचीत/ फोटो- इंस्टाग्राम
HighLights
इस शब्द से होती है नारायणी शास्त्री को नफरत
टीवी में टाइपकास्ट करने पर दिया बेबाक बयान
बॉलीवुड से दूर रहने का एक्ट्रेस ने बताया कारण
प्रियंका सिंह, मुंबई। टेलीविजन में अपनी अलग पहचान बनाने वाली अभिनेत्री नारायणी शास्त्री हमेशा से अपने पात्रों के साथ प्रयोग करने में विश्वास रखती आई हैं। करियर की शुरुआत में करीब दस साल तक मुख्य भूमिकाएं निभाने के बाद उन्होंने निगेटिव रोल की ओर भी रुख किया। हाल ही में कलर्स चैनल के शो महादेव एंड संस में उनकी एंट्री ड्रामा पैदा करने के लिए हुई है।
शो में ड्रामा पैदा करने के लिए अक्सर नए पात्रों की एंट्री कराई जाती है। निजी जिंदगी में आपको ड्रामा कितना पसंद है?
मेरा बड़ा परिवार है, उसमें अगर लड़ाईयां होती हैं तो मैं उससे भी दूर रहती हूं। निजी जिंदगी में ड्रामा बिल्कुल पसंद नहीं है। शो में ड्रामा न हो तो लोग क्यों देखेंगे। मेरा पात्र भानू ड्रामा लाती नहीं है, वह स्वयं ही ड्रामा है। जहां तक बात है, बीच शो में आने की तो मैं ऐसा नहीं सोचती हूं। हां, शुरुआत से जब कोई किसी शो से जुड़ता है तो चीजें आसान हो जाती हैं, क्योंकि आप स्वयं उस किरदार को गढ़ रहे होते हैं।

आपने कहा था कि आपको बतौर कलाकार सुरक्षित रास्ता चुनना पसंद नहीं है…
मैंने अच्छे मौकों के लिए हमेशा इंतजार किया है। इसलिए मेरे शो के बीच अंतराल ज्यादा हो जाता है। ऐसा काम करना है, जिसमें मेरा योगदान हो। मैं बतौर कलाकार स्वयं को जिम्मेदार मानती हूं, जो मुझे पसंद करते हैं, मैं उन्हें कुछ अच्छा दूं ताकि कोई यह न कहे कि क्या बकवास काम किया है। इसलिए मैं सुरक्षित रास्ता न चुनकर अच्छे काम का इंतजार करना पसंद करती हूं।
जब भी आप एक अंतराल के बाद आती हैं तो उसे कमबैक कहा जाता है, क्या यह बात खराब लगती है?
मेरे साथ तो यह कई बार हुआ है। जब भी मैं कोई नया शो करती हूं तो उसे मेरा कमबैक कह देते हैं। इस शब्द का प्रयोग बंद होना चाहिए। किसी अभिनेत्री ने अपनी मर्जी से ब्रेक लिया, अच्छे काम का इंतजार किया या अपनी जिंदगी में किसी दूसरी चीज को समय दिया तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह वापस लौट रही है। मुझे लगता है कि महिलाओं के लिए कमबैक शब्द का इस्तेमाल बहुत आसानी से कर लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए।

आपने सिनेमा में कम, टेलीविजन पर काफी काम किया है। क्या टीवी पर काम करना ज्यादा सुरक्षित है?
अभिनय मेरे जीवन में संयोग से आया, लेकिन जो भी अच्छे अवसर मिले, मैंने किया। फिल्मों से दूर रहने की भी अपनी वजहें हैं। फिल्म में कई बार एडिटिंग के दौरान आपका काफी काम काट दिया जाता है और वह रोल वैसा नहीं रह जाता, जैसा आपने सोचा था। ऐसी स्थिति में कलाकार भी निराश होता है। टेलीविजन में मुझे पता होता है कि मैं क्या शूट कर रही हूं। मैंने दो-तीन फिल्में की हैं, जिनमें मैं हीरोइन थी। ऐसे में मुख्य अभिनेत्री को पूरी तरह गायब कर देना आसान नहीं होता। इसलिए मुझे ऐसी परेशानी नहीं हुई, लेकिन मैंने अपने बहुत करीबी दोस्तों के साथ यह देखा है कि अच्छे काम के बावजूद रोल कट जाता है। मैं दूसरों की गलतियों से सीखने में विश्वास रखती हूं।
इंस्टाग्राम पर आपने कई कॉमेडी रील्स बनाई हैं। क्या कभी मलाल रहा कि अभिनय में आपकी इस प्रतिभा को दिखाने का मौका नहीं मिला?
मैं अपने लिए स्वयं रास्ते बनाने में विश्वास रखती हूं। टेलीविजन पर लोगों ने वाकई नहीं सोचा कि मैं कॉमेडी भी कर सकती हूं। इंटरनेट मीडिया पर मुझे खुलकर काम करने की स्वतंत्रता मिली। इसका यही फायदा है कि मैं अपने उन पहलुओं को भी सामने ला पा रही हूं, जिन्हें अब तक काम के जरिये दिखाने का मौका नहीं मिला था।

कॉमेडी के मौके नहीं मिले, इसका मतलब टेलीविजन में भी टाइपकास्टिंग होती है?
बिल्कुल होती है। टेलीविजन में तो सबसे ज्यादा टाइपकास्टिंग होती है। किसी कलाकार की एक छवि बन जाती है और फिर उसे उसी तरह के पात्र मिलने लगते हैं। उदाहरण के लिए, उर्वशी ढोलकिया को कसौटी जिंदगी की धारावाहिक से कोमोलिका वाले पात्र से इतनी मजबूत पहचान मिली कि उन पर निगेटिव भूमिकाओं की छवि ही हावी रही। यही वजह है कि फिल्म निर्माता भी कई बार टेलीविजन के कलाकारों को दूसरी तरह के रोल देने में हिचकिचाते हैं।
कलाकार को इससे निकलने के लिए स्वयं भी समझदारी से काम लेना पड़ेगा। मैंने करियर के शुरुआती करीब दस साल मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। मुख्य अभिनेत्री को अक्सर अच्छी लड़की की छवि में ही रखा जाता है। ऐसे में ज्यादा प्रयोग करने का अवसर नहीं मिल पाता। मैंने पिया का घर जैसे शो में काम करते हुए ही कुसुम में निगेटिव भूमिका निभाई थी। उस समय मुझे निर्माता एकता कपूर का साथ मिला।एक कलाकार के लिए आलोचना सुनना भी जरूरी है।

आप रचनात्मक आलोचना और नकारात्मक टिप्पणियों के बीच अंतर कैसे करती हैं?
अगर कोई मुझे अच्छे शब्दों में, शालीनता से और सही तरीके से कोई बात समझाता है तो मुझे रचनात्मक आलोचना से कोई परेशानी नहीं है। मैं उसे खुशी-खुशी स्वीकार करूंगी, लेकिन अगर कोई बदतमीजी से कमेंट करता है तो मैं उसे ब्लॉक कर देती हूं। मुझे ऐसे फालोअर्स नहीं चाहिए, जिन्हें बात करने की तमीज न हो। आप असहमति जता सकते हैं, लेकिन अच्छे शब्दों में।
