Drishyam: The Conclusion Review: अजय का अंदाज, जयदीप का भौकाल... सस्पेंस का बाप निकली 'दृश्यम 3'; पढ़ें रिव्यू
'दृश्यम: द कन्क्लूजन' (Drishyam: The Conclusion) विजय सलगांवकर की कहानी का तीसरा अध्याय है, जिसमें पुलिस एक बार फिर 2 ...और पढ़ें

HighLights
सिनेमाघरों में रिलीज हुई दृश्यम 3
अजय देवगन और जयदीप अहलावत का शानदार अभिनय
सस्पेंस और थ्रिल से भरपूर फिल्म का क्लाइमैक्स
अंकित सिंह तोमर, नई दिल्ली। सच सिर्फ दो तरह के होते हैं, एक वो जो दिखते हैं और दूसरे वो जो दृश्यों के तौर पर हमें नजर आते हैं और फिर वही सच हो जाते हैं... 23 जुलाई को विजय घर आया या नहीं, ये सच और सोच के बीच की वो कड़ी है, जिसे सुलझाने के लिए आपको सिनेमाघरों तक पहुंचना ही होगा। दृश्यम: द कन्क्लूजन आखिरकार सिनेमाघरों तक पहुंच गई है और विजय सलगांवकर की कहानी में इस बार क्या दांव-पेंच हैं। जानने के लिए पढ़िए पूरा रिव्या
क्या है कहानी?
'दृश्यम: द कन्क्लूजन' (Drishyam: The Conclusion Review) में कहानी का सिरा असल में पहली दो कहानियों की झलकियों तक पहुंचता है। इसके बाद तीसरे अध्याय में एक बार फिर से 2 अक्टूबर को क्या हुआ था? ये सवाल सामने आ जाता है। मीरा (तबू) अपने पति महेश देशमुख (रजत कपूर) से कहती है कि उसे अपने बेटे के लिए अभी तक इंसाफ नहीं मिला है। पत्नी को परेशान होता देख फिर से मीरा और महेश पुलिस से केस री-ओपन करनवाने की गुजारिश करते हैं और फिर कहानी में होती है क्राइम ब्रांच के एसपी राजवीर सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) की एंट्री।

इधर विजय सलगांवकर (अजय देवगन) अपनी पत्नी नंदिनी (श्रिया सरण) के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहा है, लेकिन तभी केस की कड़ियां खुलती हैं और कहानी में फिर से ट्विस्ट आते हैं। राजवीर और विजय के बीच जबरदस्त फेस-ऑफ दिखाया जाता है। इसके बाद सवालों का सिलसिला शुरू हो जाता है। 23 जुलाई की रात विजय कहां था और क्या वाकई में वह और उसका परिवार बेकसूर है।
एक तरफ परिवार बचाने की पुरजोर कोशिश तो दूसरी तरफ इस बार पुलिस के पास सबूतों का अंबार है। अब अपने परिवार की सुरक्षा के लिए विजय ऐसा खेल खेलता है कि देखने वालों की आंखें दंग रग जाती हैं। इंटरवल से पहले कहानी में खूब सस्पेंस आता है। कहानी से आप जुड़े रहते हैं और दूसरे हाफ में विजय के चक्रव्यूह का असली खेल शुरू होता है और आखिर में क्लाईमैक्स तक आपकी सांसें मानो थम सी जाती हैं।
कैसा है फिल्म का स्क्रीनप्ले?
दृश्यम सीरीज की ये आखिरी फिल्म है। फिल्म के तीसरे पार्ट से दर्शकों को जितनी उम्मीदें थीं, उन्हें वही मिला है। फिल्म का स्क्रीनप्ले सधा हुआ और बेहद दमदार है। फिल्म (Drishyam: The Conclusion Story) का फर्स्ट हाफ बेहद खूबसूरती और शांति से कहानी को गढ़ता है। सलगांवकर परिवार की पुरानी फाइलें एक बार फिर खुलती हैं।

पहले हाफ में बना माहौल दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखता है, लेकिन असली खेल इंटरवल के बाद आता है। जैसे-जैसे परतें खुलती हैं और यह समझ आता है कि 'विजय सलगांवकर' ने आखिरकार इस बार क्या गेम खेला है, आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। कहानी की राइटिंग इतनी चुस्त और धारदार है कि आप एक सेकंड के लिए भी स्क्रीन से नजरें नहीं हटा सकते। फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले अभिषेक पाठक, आमिल कीयान खान और परवीज शेख ने मिलकर तैयार किया है।

फिल्म के डायलॉग्स की जिम्मेदारी आमिल के कंधों पर आईं और फिल्म देखते वक्त डायलॉग्स को सुनकर आप आमिल के लिए सीटियां जरूर बजाएंगे। अजय देवगन के फिल्म में डायलॉग्स जितने दमदार है, उसका पूरा श्रेय आमिल को जाता है। फिल्म की कहानी और इसके स्क्रीनप्ले में कुछ भी एक्सट्रा नहीं डाला गया। चाहे बात फनी डायलॉग्स की हो या फिर इंटेसिटी की, इसमें मेकर्स पूरे नंबर्स के साथ पास होते हैं।
कैसा है फिल्म का निर्देशन?
दृश्यम 2 (Drishyam 3 Review) के बाद फिल्म के तीसरे पार्ट से दर्शकों की उम्मीदें ज्यादा थीं। अभिषेक पाठक ने ही फिल्म के तीसरे पार्ट यानि दृश्यम 3 को भी डायरेक्ट किया है और इस बार अभिषेक ने जो पिछली बार की शिकायतें थीं, वह भी दूर कर दीं। अभिषेक पाठकर एक बेहतरीन कहानीकार होने के साथ एक उम्दा निर्देशक भी हैं। उन्हें दर्शकों की नब्ज टटोलनी आती है और यही वजह है कि उन्होंने दृश्यम: द कन्क्लूजन को डायरेक्ट करते वक्त ध्यान में रखी।

अभिषेक ने दृश्यम के पुराने फॉरमेट को दोहराया नहीं है। उन्होंने एक कदम आगे आकर कहानी लिखी और उस कहानी को पन्ने से पर्दे पर खूबसूरती के साथ उतार दिया। अजय देवगन के किरदार में उतना ही सस्पेंस गढ़ा गया, जिसकी जरूरत थी। ना फालतू के डायलॉग्स जोड़े गए और ना ही बेतुके सीन्स। जयदीप अहलावत को भी उन्होंने उतनी ही मजबूती के साथ पर्दे पर दिखाया है। फिल्म का क्लाईमैक्स अभिषेक ने कमाल का गढ़ा है।
कोर्टरूम के सीन्स पर आप कई बार सीटियां मार देंगे। सबसे ज्यादा दर्शकों की उम्मीद फिल्म के क्लाईमैक्स से ही थी और अभिषेक दर्शकों की उन उम्मीदों पर खरे उतरे। उन्होंने कहानी को सही मोड़ और सही जगह पर खत्म किया, जहां दर्शक के दिल में कोई संशय नहीं रह जाता है।

कैसा है सितारों का काम?
अच्छी फिल्म के लिए कहानी और निर्देशन के साथ कलाकारों का अच्छा काम भी जरूरी होता है। पहले बात अजय देवगन (Ajay Devgn) की करते हैं। विजय सलगांवकर के किरदार में अजय देवगन ने जान फूंक दी। अगर आप ध्यान से फिल्म देखेंगे तो समझ पाएंगे कि फिल्म में अजय के सीन्स से ज्यादा उनके एक्सप्रेशन्स जबरदस्त हैं।
उनके हिस्से में इस बार डायलॉग्स और सीन्स से कहानी को आंखों से कहने का जिम्मा मिला है। अजय ने बड़ी ही खूबसूरती के साथ हर दृश्य को पर्दे पर उतारा है। उनकी आंखें मानो पूरी कहानी को बयां करती हैं।

वहीं फिल्म में परिवार को बचाने के लिए उनकी बैचेनी हो या फिर सबूतों को हटाने की उलझन, हर भावना वो संजीदगी के साथ पर्दे पर उकेरते हैं। अजय को बराबरी की टक्कर देने आए जयदीप अहलावत (Jaideep Ahlawat)। फिल्म में राजवीर सिंह तोमर के किरदार को जीने के लिए जयदीप से बेहतर शायद ही कोई हो सकता था। स्क्रीन पर जिस अंदाज में वो सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाते हैं, ठीक वैसे ही वो अपनी एक्टिंग से दर्शकों के दिलों में खौफ और रोमांच का धुआं उड़ा देते हैं। उनका किरदार बेहद कड़क और रौबदार है।

खासकर अजय के साथ उनकी टक्कर सोने पर सुहागा है। मीरा के किरदार को जीते हुए तबू (Tabu) के हिस्से में जो आया, वो उन्होंवने पूरी ईमानदारी के साथ किया है। फिल्म में सबसे मजेदार किरदार लक्ष्मीकांत सावंत का है, जिन्होंने गायतोंडे के किरदार को और भी शानदार बना दिया। सस्पेंस और इंटेस के बीच लक्ष्मीकांत ने हंसी के ठहाकों और अपने डायलॉग्स से जो संतुलन बनाया वो पहले हाफ में सराहनीय है।
श्रिया सरण (Shriya Saran) नंदिनी के किरदार में हमेशा की तरह इस बार भी पावरफुल लगीं। वहीं प्रकाश राज ने भी इंद्रजीत शेट्टी के किरदार को शानदार तरीके से निभाया। रजत कपूर, इशिता दत्ता और मृणाल जाधव अपने-अपने किरदारों में सही लगे।

कैसा है फिल्म का म्यूजिक?
दृश्यम 3 में इस बार तारीफ फिल्म के म्यूजिक की भी बनती है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक सस्पेंस को कई गुना बढ़ा देता है और जब-जब विजय सलगांवकर की चाल सामने आती है, बीजीएम आपके सीधे रोंगटे खड़े कर देता है। फिल्म में कोई बेवजह के गाने नहीं हैं। बस फिल्म में का बीजीएम और म्यूजिक की फिल्म के सस्पेंस में चार चांद लगाता है। रवि बसरुर, रोचक कोहली और कर्मा ने अपने हिस्से का काम अच्छे से किया है।
क्या है कमियां और खूबियां?
फिल्म के फर्स्ट हाफ में कहानी (Drishyam 3 Story) थोड़ी देर से मुद्दे पर आती है। हालांकि इस बीच में थोड़ा मन भटकने की स्थित में पहुंचता है, मगर फिर कहानी में आने वाले ट्विस्ट थोड़े बेहतर हो जाते हैं। तबू के किरदार को थोड़ा और सस्पेंस के लिहाज से गढ़ा जा सकता था। फिल्म की खूबियों की बात करें तो ओरिजिनल दृश्यम के तीसरे पार्ट से इस बार कहानी काफी हटकर है, जिसके लिए अभिषेक पाठक (Abhishek Pathak) की तारीफें बनती हैं।

संदीप (Sandeep Francis) ने फिल्म की एटिडिंट बहुत शार्प और सही ढंग से की है, जो सराहनीय है। वहीं सुधीर के. चौधरी की सिनेमैटॉग्राफी भी तारीफ के काबिल है। अजय और जयदीप के बीच की टक्कर इस बार दर्शकों के लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है।
देखें या नहीं?
'दृश्यम: द कन्क्लूजन' (Drishyam The Conclusion) यानि इस तीसरे पार्ट के साथ फिल्म की कहानी खत्म हो गई। इस फ्रैंचाइजी के लिए दर्शकों के दिलों में अलग जगह है। शायद इस कहानी के साथ लोगों को जुड़ाव, विजय और उसके परिवार के लिए बढ़ती लोगों की दिलचस्पी इसे मजेदार बनाती है।
अब सैम को इंसाफ मिला या नहीं और इस बार विजय सलगांवकर ने शनि की नजर से भी तेज नजर रखने वाले एसपी तोमर से कैसे अपने परिवार को बचाया या फिर कहानी में कोई और ही मोड़ है? यह सब जानने के लिए आपको सिनेमाघरों तक पहुंचना होगा। आखिर में यह फिल्म सस्पेंस-थ्रिलर सिनेमा का एक अनूठा मास्टरपीस है और इसे मिस करने की गलती बिल्कुल नहीं की जा सकती है।
