[जागरण स्पेशल]। मुंबई में जुहू का इलाका इसलिए भी मशहूर है कि वहां समदंर का किनारा है और इसलिए भी मशहूर है कि समंदर किनारे से कुछ ही दूरी पर सदी के सितारे अमिताभ बच्चन का निवास है। पहले बच्चन अपने बाबूजी और माता जी के साथ प्रतीक्षा बंगले में रहा करते थे। पिछले कई सालों से वे जलसा में रहते हैं। उनका ये बंगला जुहू के समंदर से विले पार्ले जाने वाली सड़क पर बाईं ओर है। इस सड़क पर आने-जाने वाले, खास तौर पर मुंबई से बाहर से आने वाले सैलानियों की नजरें इस उम्मीद में चमक जाती है कि कहीं उनको बच्चन की झलक मिल जाए। लंबे चौड़े गेट पर तैनात सिक्योरिटी गार्डस चौकन्ने रहते हैं, लेकिन बहुधा वे बाहर से आने वालों की जिज्ञासा को शांत करने के लिए उनके कुछ सवालों के जवाब जरुर देते हैं। पहले जलसा के बोर्ड के साथ फोटू और इस दौर में सेल्फी खिंचाने वालों की मुराद होती थी। अब ये काम सिक्योरिटीज वालों की नजरों से बचाकर होता है। अधिकारिक तौर पर इसकी इजाजत नहीं है।

हर रविवार (अगर अमिताभ बच्चन मुंबई में हैं) शाम को चार बजे के बाद 10 मिनट तक महानायक दर्शन देने के लिए अपने गेट पर होते हैं। हाथ जोड़कर और हाथ हिलाकर दोनों तरफ की सड़कों को घेरने वालों का अभिवादन करते हैं। उस पल को कैद करने के लिए तकरीबन हर शख्स का मोबाइल महानायक को अपने मोबाइल में कैद करने के लिए उतावली हो जाती है। अक्सर बच्चन सोशल मीडिया पर रविवार को जनता दर्शन की तस्वीरें शेयर करते हैं। उनके बंगले जलसे से पहले मोड़ पर जुहू के बस डिपो की तरफ जाने वाली सड़क पर दाएं ओर एक बंगले पर नेम प्लेट है जनक। इस बंगले के गेट पर भी सिक्योरिटी तैनात रहती है। ये अमिताभ बच्चन का दफ्तर है। बंगले के आहते में सफेद और महरुम रंग की कारें दिख जाती हैं। बच्चन आने जाने के लिए बहुधा इन दोंनों में से किसी कार का इस्तेमाल करते हैं। बंगले में दाखिल होते ही बाईं ओर कार ड्राइवर से लेकर स्टाफ की टीम के लोग बैठे नजर आते हैं।

दाईं ओर एक लाबी है, जहां ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां और लिफ्ट मौजूद होते हैं। दफ्तर में आने वाले मेहमानों को पहली मंजिल पर बने कक्ष में बैठाया जाता है, वहां सीढ़ियों से ही जाते हैं। लाबी में ही गणेश जी विराजमान दिखते हैं। चाय के मगों का एक सुंदर डिजाइन नजर आता है और सीढ़ियां चढ़ते ही दीवारों पर अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन के अलग अलग मुद्राओं में फोटोज नजर आने लगते हैं। मीडियाकर्मियों को भी इन फोटोज की फोटोज लेने की इजाजत नहीं होती, क्योंकि ये बच्चन की निजी मिल्कियत का हिस्सा है। मेहमान कक्ष में सोफे के साथ साथ सात-आठ केबिन हैं, जहां बच्चन का निजी स्टाफ अपनी जिम्मेदारियों में मशगूल रहता है। कुछ केबिन खाली भी नजर आते हैं। बाईं ओर अमिताभ बच्चन को मिली फिल्मफेयर और दूसरी ट्राफियों की लंबी लाइन है, तो जगह जगह पर उनके और अभिषेक की तस्वीरें नजर आती हैं। ठीक सेंटर में चेन्नई के किसी मंदिर की आकृति एक कपड़े पर नजर आती है, जिसे साउथ की परंपरा के मुताबिक विशाल माला से कवर किया गया है।

बताया जाता है कि अमिताभ बच्चन दूसरे मंजिल पर हैं और वहीं मुलाकात होनी है। मुलाकात का वक्त आने पर पहले मंजिल से दूसरे मंजिल पर पंहुचने में तमाम तस्वीरों के बीच राज ठाकरे द्वारा बनाए गए अमिताभ बच्चन के कार्टून भी फ्रेम में नजर आ जाते हैं। दूसरे मंजिल पर दरवाजा खुलते ही जोरदार आवाज आती है- आइए..... दरवाजे के करीब ही सिंगल सीट वाले तीन सोफो पर से एक पर सफेद पठानी सूट और उसके ऊपर हल्के पीले रंग की डिजाइनिंग चादर में लपेटे महानायक नजर मिलते ही उठ खड़े होते हैं और हाथ जोड़कर अभिवादन के साथ इंतजार करने के लिए क्षमा मांगते हैं और बैठने का आग्रह करते हैं। नजर दौड़ती है, तो दाईं ओर एक दिलचस्प बोर्ड नजर आता है, जहां साइलेंस साइलेंस लिखा हुआ है। उसके बगल में ही एक लंबी कांच की टेबल के इर्दगिर्द एक दर्जन कुर्सियां नजर आती हैं, जहां मुमकिन है कि बच्चन परिवार ज्यादा लोगों के साथ मीटिंग करता है। इस हाल में इस मुलाकात को कवर करने के लिए एक वीडियोग्राफर और फोटोग्राफर की मौजूदगी भी नजर आती है। पिछले कई सालों से बच्चन मीडिया के साथ अपने हर इंटरव्यू को इसी अंदाज में रिकार्ड कराते हैं और मुलाकात करने वाले पत्रकारों के फोटोज भी रिकार्ड में रखते हैं।

बच्चन के दाईं ओर उनका मोबाइल, इंटरनेट कनेक्शन और सामने लंबी सी टेबल पर खाने के लिए ढोकला, बिस्कुट और डोसा सहित तमाम चीजें दिखती हैं। बातचीत शुरु करने से पहले वे अपने स्टाफ से तुरंत पानी लाने को कहते हैं और पेपर डोसा खाने का आग्रह करते हैं, जो उनको पसंद है। वे मानते हैं, ये खाने से पेट ठीक रहता है। इन औपचारिकताओं के बीच चाय भी मंगवाई जाती है और बातचीत का सिलसिला आरंभ हो जाता है। साथ ही बच्चन का वीडियोग्राफर अपने कैमरे को काम पर लगा देता है। ये मुलाकात उनकी हालिया रिलीज फिल्म 102 नाट आउट के प्रदर्शन से कुछ दिनों पहले हुई थी और उस दिन बच्चन सुबह से लगातार अखबारी प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे थे। फिर भी उनके चेहरे पर थकावट का नामोनिशान नहीं था। यहीं से सवाल-जवाबों का सिलसिला शुरु हुआ

फिल्म को लेकर लगातार एक जैसी बातचीत और सवालों से आपको थकान महसूस होने लगती होगी?

- अरे नहीं, फिल्म एक होती है, लेकिन बातचीत करने वाले पत्रकार अलग होते हैं। हर कोई अपने अंदाज में सवाल करता है। टॉपिक वही हो, फिर भी सवाल में कुछ न कुछ बदलाव होता है और हमें भी सुविधा होती है ये समझने की कि कैसे एक ही सवाल के अलग-अलग जवाब दिए जा सकते हैं। ये भी हमारे लिए सीखने वाली बात होती है, इसलिए हम कभी थकान महसूस नहीं करते।

बादूंबा.. ये शब्द आप अब तक अपने ब्लाग में और टिवटर पर इस्तेमाल किया करते थे। अब इस पर आपने गाना भी बना दिया.. ये आविष्कार आपने कैसे किया। इसका कोई ओरिजन?

न तो इसका कोई ओरिजन है और न ही हमने आविष्कार किया। क्या आप बता सकते हैं कि जब कोई खुश होकर येयेयेयेये... करता है, तो इसका ओरिजन कहां से होगा। या जब वाह वाह करते हैं, तो इसका ओरिजन कहां से होगा। (एक हल्के से पॉज के बाद वे जवाब को आगे बढ़ाते हैं) हम जब किसी बात को लेकर बहुत खुश होते हैं। इंडिया की टीम क्रिकेट में जीत गई या फिर दूसरे खेलों में हमारे भारतीय खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया, तो हम ऐसे अवसरों पर उनकी तारीफ करने के लिए, अपनी खुशी को व्यक्त करने के लिए इस शब्द का प्रयोग करने लगे। ये शब्द कहां से आया, ये तो हमें भी नहीं पता और न हमने कभी पता लगाया। बस अच्छा लगा, तो हम ये प्रयोग करने लगे।

इसे फिल्म के गाने से जोड़ने की बात कहां से और कैसे हुई?

दरअसल जब फिल्म की आखिरी दिनों की शूटिंग हो रही थी, तो तो हमने उमेश जी से ( फिल्म के निर्देशक उमेश शुक्ला) से कहा कि फिल्म में कोई गाना होना चाहिए, क्योंकि आजकल हमारी युवा जनता गाने सुनकर ही किसी फिल्म को देखने का मन बनाती है, उनके लिए कुछ नहीं है, तो एक गाना रखना चाहिए। उमेश जी का कहना था कि फिल्म की कहानी में तो गाने के लिए कोई जगह नहीं है। हमने कहा कि हम एक गाने के लिए कुछ करते हैं, आप सुन लीजिए, फिर जैसा आपको ठीक लगे। हमने अपने गीतकार (अमिताभ भट्टाचार्य) से कहा कि क्या इस शब्द (बादुंबा..) का इस्तेमाल गाने में हो सकता है। उन्होंने ऐसा कर दिया। हमने एक धुन बनाई, म्यूजिक अरेंज भी कर दिया। गाकर रिकार्ड भी कर लिया। जब उमेश जी को सुनाया, तो उनको पसंद आ गया। जब उमेश जी को लगा कि ये तो अच्छा गाना बन गया, तो प्रमोशन के लिए वे इसका प्रयोग करने के लिए तैयार हो गए। हम इसके लिए उनके आभारी हैं।

इस फिल्म के लिए आपके संगीतबद्ध गाने में ऋषि कपूर को जोड़ने का विचार कैसे आया?

ये भी हमारा ही विचार था। उन्होंने हमारे साथ फिल्म नसीब में काम किया था, तो एक गाना था फिल्म का चल चल मेरे भाई.., रफी साहब ने गाया था। उस गाने में हमारी भी लाइन थी और ऋषि साहब की भी। हमने ही उनसे अनुरोध किया कि इस फिल्म (102 नाट आउट) के लिए वे भी कुछ गाएं और वे मान गए।

आपने कलाकार के रुप में तो अपनी कई फिल्मों में आपने गाने भी गाए हैं, लेकिन ये धुनें बनाने में आपकी दिलचस्पी कब से होने लगी?

देखिए, हमने कहीं से संगीत सीखा नहीं है। (शरारती मुस्कान) आप जानते ही नहीं कि ये काम तो हम बहुत पहले से करते आए हैं,

आपने पहले कभी ये बताया नहीं..

आप नहीं पूछेंगे, तो हम कैसे बताएंगे। हर चीज को कैसे खुद से बता सकते हैं। क्या हम जोर जोर से नारे लगाएं कि सुनो सुनो, ये गाना हमने गाया है।

आज पूछ लेते हैं, अब बता दीजिए..

-कालिया फिल्म में गाना था, जहां तेरी ये नजर है... इसकी धुन पर हमने आर डी (बर्मन) के साथ काम किया था। करण जौहर की फिल्म कभी खुशी कभी गम में शाबा शाबा... हमारी धुन पर बना था। उसके लिए तो करण जौहर ने अलग धुन पर गाना बनाई वो हमें नहीं जंचा, तो हमने करण जौहर से कहा कि आप एक दिन का वक्त दीजिए, हम आपको एक नया गाना बना देते हैं। हमने आदेश (दिवंगत संगीतकार आदेश श्रीवास्तव) के साथ ट्यून तैयार की और वही गाना बना। बागवां में हमारी धुनों पर तीन गाने बने। टेलीफोन पर जो हमारा गाना था, वो हमने ही गाया था और ट्यून भी हमने तैयार की थी। बाबुल में भी एक गाना हमने कंपोज किया। ये धुनें बनाने का शौक हमने आदेश के म्यूजिक स्टूडियो में बहुत बार पूरा किया है। कई बार रातों को हम वहां पंहुच जाते थे।

तो क्या उम्मीद की जाए कि आप भविष्य में बतौर संगीतकार-गायक अपना एक सिंगल एलबम भी लेकर आएं?

अरे नहीं, ये तो बहुत बड़ी नाइंसाफ हो जाएगी। जनता पर ये अत्याचार हम कभी नहीं करेंगे।

ये आपका हमेशा से रवैया रहा है कि आप खुद को कभी गायक नहीं मानते, फिर भी आप गाते हैं। लावारिस, सिलसिला, मि. नटवरलाल में आपकी आवाज में गीत लोकप्रिय रहे। सिलसिला का गाना.. नीला आसमां तो आपने स्टेज पर लता मंगेशकर के साथ भी गाया है..

इस दौर में मशीने ऐसी बन गई हैं कि हम जैसे बेसुरे भी ये शौक पूरा कर लेते हैं। जनता के आभारी हैं, जो हमें झेल लेती है। सिलसिला के जिस गाने की आप बात कर रहे हैं, स्टेज पर हमने गाया नहीं था, सिर्फ पंक्तियों को बोल दिया था। मैं इतनी बड़ी होशियारी नहीं कर सकता कि लता जी के समक्ष गाने की हिमाकत करुं। हां, शौकिया तौर पर हम अपने गानों के साथ तोड़ मरोड़ करते रहते हैं।

क्या माना जाए, कि संगीत के प्रति ये आपका लगाव कुदरती है या...

मैं ऐसा मानता हूं कि हर इंसान के अंदर संगीत को लेकर एक गुण होता है, वरना वो बोल नहीं पाता। बोलने में एक सुर होता है। दो लोग बोलते हैं, तो उनके सुर अलग अलग होते हैं। ये सुर नहीं होगा, तो कोई बोल नहीं पाएगा। अब इसको कौन कैसे इस्तेमाल करता है, ये अलग बात हो जाती है।

(इस फिल्म को लेकर बातचीत शुरु होती है।)

किसी भी कलाकार के लिए अपनी उम्र के किरदारों को जीना अलग बात होती है और अपने उम्र से आगे के किरदारों को जीना बहुत अलग बात हो जाती है। पहली बार आपने ऐसा किरदार किया है। ये अनुभव कैसा रहा आपके लिए?

मेरा हमेशा मानना रहा है कि जो फिल्म का लेखक होता है, वो सबसे महत्वपूर्ण इंसान होता है, किसी भी फिल्म के लिए। उसके बिना कोई फिल्म नहीं बन सकती। वो पटकथा बनाता है। सारे चरित्र उसके दिमाग में होते हैं। वो सब कुछ बताता है कि क्या किरदार है, क्या उम्र है इत्यादि-इत्यादि। उमेश जी और उनके लेखक (सौम्या जोशी) के साथ जब मुलाकात हुई, तो उन्होंने हमें कहानी के बारे में बताया कि ये 102 साल का इंसान है, जिसका 75 साल का बेटा है। पिता अपने बेटे को इसलिए वृद्धाश्रम भेजना चाहता है, क्योंकि उसे महसूस होता है कि उसका बेटा अपने जीवन को सही तरीके से नहीं जी रहा है। ये हुई कहानी। हम कलाकार हैं। प्रोफेशनली काम करते हैं, तो निर्देशक के कथनानुसार, अपनी क्षमता के साथ निभाने का प्रयत्न करते हैं। हम किसी भी फिल्म में इतना ही योगदान कर पाते हैं। जैसे इस फिल्म के लिए उमेश जी ने बताया कि हम चाहते हैं कि ये किरदार भले ही 102 साल का है, लेकिन न तो ये लाचार है, न दुखी है, न ही किसी बात में किसी से कम है। न कांपता है, न चलने के लिए किसी छड़ी का सहारा लेता है। हमें एक हंसता-खेलता इंसान चाहिए था, जिसके लिए हमने प्रयत्न किया।

मेकअप के लिए भी आपने कुछ खास किया होगा 102 साल का व्यक्ति दिखने के लिए?

पहले के जमाने में मेकअप मैन हुआ करते थे, जो ये सब किया करते थे। अब ये सब स्टाइलिश हो गया है। एक एक्सपर्ट होता है, जिसके साथ लंबी बातचीत होती है और फिर वो तय करता है कि लुक क्या होगा। कोई इनपुट हुआ, तो दे दिया जाता है, वरना जैसा आदेश होता है, हम वैसे कर देते हैं।

इस फिल्म में कोई महिला पात्र नहीं है..

निजी जीवन में तो महिलाओं का होना नितांत आवश्यक है, ये तो मानता हूं, लेकिन इस कहानी में ऐसी कोई आवश्यकता नहीं थी। ऐसा नहीं है कि कहानी में महिलाओं का कोई जिक्र नहीं है। एक महिला के किरदार का उल्लेख है, जिसके साथ इन दोनों (पिता-पुत्र) का गहरा नाता है। ये भी तो दिलचस्प हो सकता है।

27 साल बाद ऋषि कपूर के साथ काम करना.. उम्र के अलावा क्या बदलाव महसूस हुआ?

उम्र बढ़ गई है और उनका आकार भी थोड़ा सा बदल गया है। हमारा भी आकार बदल गया है। इसके अलावा कुछ और नहीं बदला। उनके साथ लंबे समय से काम नहीं किया, ये अलग बात है, लेकिन उनके साथ हमारा संपर्क रहा है। लगातार मिलते रहते हैं। वे तो हमारे घनिष्ठ मित्र होने के साथ-साथ समधी भी हैं। उनकी बहन (रीमा जैन) के परिवार में हमारी बेटी (श्वेता बच्चन) की शादी हुई है।

शूटिंग के दौरान आप दोनों सेट पर पुराने दिनों की यादों को ताजा करते रहे होंगे..

जी बिल्कुल। सेट पर जब शूटिंग नहीं होती थी, तो हम अपनी पुरानी यादों में खो जाते थे। अब इस उम्र में हम पुरानी यादों को ही ताजा कर सकते हैं। हमारे पास ये ही तो खजाना है। जहां भी शूटिंग के लिए जाते हैं, तो कुछ न कुछ पुरानी यादें ताजा हो ही जाती है।

आम तौर पर कलाकार अपनी उम्र के किरदारों को करना पसंद करता है। इस फिल्म में आपने अपनी उम्र से आगे के किरदार को निभाया है। ये कितना चुनौती भरा था?

हमने तो अपनी प्रत्येक फिल्म के प्रत्येक चरित्र को हमेशा चुनौती भरी माना है और हर चरित्र से ही सीखा है। कहानी तो आप जानते ही होंगे कि उसका ७५ साल का बेटा है, जो अपनी जिंदगी से परेशान रहता है और उसका पिता, यानी मैं सोचता हूं कि अगर इसे ऐसे ही जीना है, तो क्यों न इसे वृद्धाश्रम भेज दिया जाए। बस, इसी को लेकर फिल्म बन गई। संवेदनशील फिल्म है। उमेश जी प्रतिभाशाली निर्देशक हैं। बहुत लगन के साथ काम करते हैं।

ये फिल्म एक गुजराती प्ले पर बनी है। आपने किरदार को समझने के लिए वो प्ले देखा?

नहीं नहीं। आज तक नहीं देखा और इसलिए नहीं देखना चाहते थे कि हमें इस पर काम करना है। हमारा मानना है कि जब आप ये करते हैं, तो आपका एक्ट इससे प्रभावित होता है, जो हमारे हिसाब से नहीं होना चाहिए। वो प्ले था, ये फिल्म है। इस अंतर को समझना चाहिए।

हाल ही में आपके ब्लाग के दस साल पूरे हुए हैं। आपने इसे लेकर एक विशेष ब्लाग भी लिखा, जो अंग्रेजी में था।

जब कभी अवसर मिलता है, तो हिंदी में भी लिखते हैं, लेकिन ये ज्यादातर अंग्रेजी में ही लिखते हैं। हमारे ब्लाग से जुड़ी टीम का भी आग्रह रहता है कि अंग्रेजी में हो। इसकी दो वजह हैं, एक तो हमारी टीम के लोगों को भी हिंदी बहुत अच्छी नहीं आती और दूसरी बात ये है कि अंग्रेजी विश्व भर में पढ़ी जाती है, समझी जाती है। हम कई और भाषाओं में भी लिख देते हैं। अरब देशों से हमारे चाहने वाले हैं, तो उनके लिए कई बार अरबी भाषा में टिवटर पर पोस्ट लिख देते हैं। बंगाली में लिख देते हैं। ऊर्दू में भी लिख देते हैं।, मराठी, तमिल में भी लिख देते हैं। अन्यत्र भाषाओं में भी लिखते हैं। इन भाषाओं में गूगल से बहुत सहारा मिलता है।

उम्मीद की जा रही थी आप इस अवसर पर हिंदी में भी कुछ लिखेंगे..

फिर भी जब महसूस होता है कि हिंदी में कुछ लिखा जाए, तो अवसर को समझते हुए लिखने का प्रयास जरुर होता है। जैसे कि बाबूजी की कविताओं को लेकर कुछ लिखने का मन होता है, तो सदैव हिंदी में ही लिखता हूं। दरअसल समस्या ये होती है कि अनुवाद का मामला फंस जाता है। हमने बाबूजी से ये सीखा था कि सीधे तौर पर अनुवाद न करके भावार्थ कर दिया जाए, तो बेहतर रहता है। बाबूजी ने शेक्सपीयर की पांच रचनाओं का हिंदी में भावार्थ किया। वे हमेशा कहा करते थे कि शब्दों का अनुवाद मत कीजिए।

इतनी व्यस्तता में इसके लिए वक्त निकालना भी आपके लिए आसान नहीं रहता होगा

हम इनको अपने काम का हिस्सा मानते हैं, इसलिए रात को सोने से पहले ब्लाग लिखना या कोई पोस्ट करने का काम पूरा कर लेते हैं। अगर हम चूक जाएं तो वहां से (डिजिटल टीम) शिकायतें आने लगती हैं कि आपने कुछ क्यों नहीं लिखा। एसएमएस भेजेंगे, ईमेल भेजेंगे कि कुछ लिखिए। कई बार तो वो डांट भी देते हैं कि कहां हैं आप, अब तक आपका ब्लाग नहीं आया। अब हम कोशिश करते हैं कि उनको शिकायत का मौका नहीं दें। रात को लिखने का एक कारण ये भी होता है कि जब हमारे यहां रात होती है, तो दूसरे देशों में दिन होता है और इसका भी डिजिटल की दुनिया में महत्व है। इन बातों का भी ध्यान रखा जाता है।

सोशल मीडिया पर कई मौकों पर आप विवादों में आ जाते हैं, कई बार कई मुद्दों पर आपकी चुप्पी भी खलती है।

हम ऐसा मानते हैं कि सबको अपनी बातें व्यक्त करने का अधिकार है। ये मंच इसीलिए है, कि इसका जो जैसे चाहे प्रयोग करे। जहां तक विवादों की बात है, तो हम बहुत गंभीरता से नहीं लेते और जहां लगता है कि खामोश रहना उचित है, हम खामोश रहते हैं। ये हमसे उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि हम हर विषय पर कुछ न कुछ कहें। हमारी निजता भी तो है। हमारा मानना है कि कई बार कुछ न कहना ज्यादा उचित रहता है।

बलात्कार की घटनाओं पर आपकी खामोशी..

हम इसे लेकर अपनी बात कह चुके हैं। इसे लेकर अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

आपकी आने वाली फिल्मों की चर्चा की जाए, तो आमिर खान के साथ ठग आफ हिंदोस्तां है। आमिर के साथ काम करने का अनुभव किस तरह का रहा?

अभी हमें इस फिल्म को लेकर ज्यादा कुछ कहने की इजाजत नहीं है। इतना बता सकते हैं कि हमने इस फिल्म की शूटिंग पूरी कर ली है। आमिर का कुछ दिनों का काम बाकी है। आमिर के साथ काम करने का अवसर हमें अब मिला। काफी बरसों पहले एक फिल्म शुरु होने वाली थी, जिसे इंद्र कुमार बनाने वाले थे। नाम था रिश्ते। आमिर और हमारे अलावा माधुरी दीक्षित भी उसमें काम करने वाली थीं। दुर्भाग्यवश वो फिल्म शुरु नहीं सकी। लगान के वक्त आमिर ने अनुरोध किया था कि हम सूत्रधार बनें, तो हमने सहर्ष स्वीकार किया। अब साथ में काम किया है, तो अच्छा लगा। बहुत उम्दा किस्म के अभिनेता हैं और वे जिस शिद्दत से अपनी भूमिका करते हैं, वो काबिले तारीफ है।

इस फिल्म की शूटिंग के दौरान आपको चोट भी लगी थी। अब वो चोट ठीक है?

हमारा तो पूरा शरीर टूटा हुआ है। अब भी है, लेकिन इलाज चलता रहता है। ट्रीटमेंट तो बंद नहीं होता। जब ठीक हो जाते हैं, तो काम आगे बढ़ा देते हैं। अब तो इसी प्रकार काम करना होता है।

यशराज में ये फिल्म बन रही है। यशराज और विशेषकर यश चोपड़ा जी से आपका विशेष रिश्ता रहा है।

जी हां। मुझे अक्सर वो दिन याद आ जाते हैं, जब दादर में राजकमल स्टूडियो में यश जी का एक सिंगल रुम का दफ्तर हुआ करता था, जो दरअसल एक मेकअप रुम का हिस्सा था। उस कमरे का साइज भी बहुत छोटा था। उसी छोटे कमरे में एक तरफ कुर्सी पर वे बैठते थे। उनके सामने उनका एकाउटेंट बैठा करते थे। एक कोने में मेकअप का सामान रखा रहता था। वहां से उन्होंने अपना सफर शुरु किया और इतना बड़ा साम्राज्य (यशराज स्टूडियो) खड़ा किया। हमारे लिए गर्व की बात है कि हमें उनके साथ इतना काम करने का अवसर मिला। आदि (आदित्य चोपड़ा) जिस मेहनत से काम कर रहे हैं और अपने पिता के काम को आगे बढ़ा रहे हैं, वो अदभुद है।

आपकी अगली फिल्म ब्रह्मास्त्र है। आप कब से शूटिंग शुरु करेंगे?

हमारी शूटिंग अगले महीने से शुरु होगी। वैसे फिल्म का निर्माण आरंभ हो चुका है। हमारी छोटी सी भूमिका है। मुख्य भूमिकाएं रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की हैं।

रणबीर और आलिया पहली बार आपके साथ काम करेंगे।

हम भी पहली बार उनके साथ काम करेंगे। मैं इन दोनों को बहुत ही भयंकर किस्म के कलाकार मानता हूं। इस नई पीढ़ी को लेकर मैं इसलिए प्रभावित होता हूं कि जिस लगन और मेहनत से ये लोग काम करते हैं, वो लाजवाब है। हमें आज भी उनकी लगन और कार्यशीलता से बहुत कुछ सीखने के लिए मिलता है। आप देखिए इस पीढ़ी के कलाकारों को। पहली फिल्म में भी इतने आत्मविश्वास से काम करते हैं, कि कभी महसूस ही नहीं होता कि ये लोग पहली बार काम कर रहे हैं।

सुजाय घोष के साथ आपकी फिल्म शुरु होने जा रही है। उनका मानना है कि आपके साथ काम करना एक नशा है, जिसके बिना अब वे फिल्म नहीं बनाते।

वो बहुत पागल किस्म के व्यक्ति हैं। उनको आप गंभीरता से न लिया कीजिए। विश्वास ही मत कीजिए ऐसी बातों पर। मित्र हैं हमारे, जिनको हम आदर के साथ देखते हैं। वे हमारे पास प्रस्ताव ही ऐसे लाते हैं कि हम उनको मना नहीं कर पाते। इस बार भी एक रोचक विषय है, जो एक स्पेनिश फिल्म का रीमेक कह सकते हैं। हमारे साथ तापसी पन्नू हैं, जो बेहतरीन अभिनेत्री हैं। जून में ही ये फिल्म शुरु हो जाएगी।

सुजाय अकेले ऐसे फिल्मकार नहीं हैं। आर बाल्की भी कहते हैं कि आपके बिना वे कोई फिल्म नहीं सोच पाते

ये इन लोगों की उदारता है, जो ऐसा कहते हैं। हमें इन बातों में कोई सच्चाई नहीं लगती। हर फिल्मकार का विजन होता है। बाल्की हों या सुजाय हों, दोनों बेहतरीन निर्देशक हैं और हम आभारी हैं कि हमें वे अपने साथ काम करने का अवसर देते हैं।

ये फिल्मकार आपके फैन हैं, जो आपके साथ काम करते हैं, तो क्या सेट पर भी फैन ही रहते हैं..

नहीं, डायरेक्टर हमेशा डायरेक्टर ही रहता है। ये भी संभव है कि हम भी निर्देशकों के फैन होते हैं। मैं बाल्की का भी फैन हूं। सेट पर एक ही रिश्ता होता है, वो कलाकार और निर्देशक का। वे जैसा हमसे कहते हैं, हम उनके निर्देशों का पालन करते हैं और यथासंभव श्रेष्ठ करने की कोशिश करते हैं।

कौन बनेगा करोड़पति का नया सीजन लौट रहा है। पिछले साल टीआरपी को लेकर केबीसी ने बहुतों को चकित किया। माना गया कि छोटा सीजन होने से फायदा मिला। क्या इस बार भी छोटा सीजन होगा?

ये तो टीम को तय करना है। हम इतना कह सकते हैं कि केबीसी का नया सीजन आएगा और छोटा सीजन वाली बात को लेकर हम अनुरोध करेंगे कि वे इस बार भी छोटा सीजन रखें, तो बेहतर रहेगा। जुलाई-अगस्त तक शायद हम सेट पर होंगे। इस बारे में अभी तैयारियां हो रही हैं, अभी इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगा।

वेब सीरिज और शार्ट फिल्मों के नए माध्यमों को आप किस प्रकार देखते हैं?

दोनों ही बहुत रोमांचकारी माध्यम है। अगर हमें इन से जुड़ने का प्रस्ताव मिलेगा, तो हमें खुशी होगी। एक प्रयत्न किया था धारावाहिक (युद्ध) में काम करने का। उसका फल अच्छा नहीं रहा। इन दोनों को लेकर हम उत्सुक हैं।

शुजित सरकार ने पीकू से पहले आपके साथ एक फिल्म बनाई थी शू बाइट। उस फिल्म को लेकर कुछ दिनों पहले आपने भी पोस्ट किया था कि फिल्म रिलीज हो। मामला कहां अटका है?

ये मामला स्टार फाक्स के पास अटका हुआ है। इससे पहले इस फिल्म के अधिकार वार्नर ब्रदर्स के पास थे। उससे पहले डिजनी कंपनी इसका निर्माण कर रही थी। हम दिल से चाहते हैं कि वो फिल्म यथाशीघ्र रिलीज हो। हमें आश्वासन भी मिला है कि कंपनी (स्टार फाक्स) इस ओर प्रयासरत हैं। फिल्म पूरी तरह से रिलीज के लिए तैयार है। एक रोचक कहानी है। उम्मीद और कामना है हमारी कि जल्दी से वो रिलीज हो सके। हम चाहते हैं कि मीडिया में भी इस बात को उठाया जाए, ताकि वे लोग (स्टार फाक्स) और ज्यादा प्रयत्न करें।

-अनुज अलंकार

अमेरिका से परमाणु डील टूटी तो ईरान बनाएगा परमाणु हथियार!
चीन ने जिबूती में लगाए लेजर हथियार, अमेरिकी विमान बना पहला टार्गेट
फिर जाग गया जिन्‍ना का जिन्‍न, अलीगढ़ से लेकर दिल्‍ली तक मचा रहा बवाल
पाकिस्‍तान में इस बार एलियन कराएंगे चुनाव, एलियंस से ही होगा मुकाबला!
परमाणु डील की आग को भड़काने का काम कर रहा है इजरायल, क्या चाहता है US    

Posted By: Kamal Verma