सच के बहुत करीब होती हैं निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्में। ‘कैलेंडर गर्ल्स’ में वे दर्शकों को कराने जा रहे हैं ग्लैमर वर्ल्ड की हकीकत से रूबरू ...

अपनी नई फिल्म ‘कैलेंडर गर्ल्स’ की कहानी के विचार के बारे में मधुर भंडारकर बताते हैं, ‘मेरे ऑफिस में हर साल कैलेंडर आता है, जो विजय माल्या साहब भेजते हैं। उन्हें मैं किसी कोने में रख दिया करता था। एक दिन स्टाफ को साफ-सफाई के दौरान वे कैलेंडर मिले। उसने पूछा कि इनका क्या करना है तो मैंने कहा कि टेबल पर इकट्ठा कर लो, फिर किसी को दे देंगे। उसके कुछ दिनों बाद मेरे जेहन में यकायक एक घटनाक्रम कौंधा। मैं सोचने लगा कि उस कैलेंडर में मौजूद लड़कियों की जिंदगी क्या हो सकती है? हर साल उस कैलेंडर में छह लड़कियां होती हैं। उनमें से कुछ ही ऊंचा मुकाम हासिल कर पाती हैं। बाकी आज की तारीख में कहां हैं, कुछ पता नहीं। वे महज साल भर का फेम एंजॉय कर पाती हैं। फिर क्या होता है उनके साथ? इसके विषय ने व्यक्तिगत स्तर पर मुझे काफी अपील किया। मैंने उन गुमनाम लड़कियों की कहानी को फिल्म के माध्यम से लोगों के सामने पेश करने का मन बनाया।’

खुश हूं कि भारत में रहता हूं - सैफ अली खान

कड़वा है इसका सच
मधुर कहते हैं, ‘मैंने उन लड़कियों से मिलने की कोशिश की। सब तो नहीं मिलीं लेकिन कुछ से संपर्क करने में सफल रहा। मिसाल के तौर पर कई ग्लैमर इंडस्ट्री को अलविदा कह चुकी हैं। कई विदेश में सेटल हो गईं। उनमें से कुछ अभिनेत्रियां बनीं। इस तरह मैंने अब तक जिस मिजाज की रियल, हार्ड हिटिंग व पीछे की सच्चाई वाली कहानियां लोगों को दिखाई हैं, ‘कैलेंडर गर्ल्स’ उसी दायरे में आती है। फिल्म में सभी नवोदित कलाकार हैं, क्योंकि कैलेंडर गर्ल्स प्लेटफॉर्म ही नए चेहरों का होता है। वहां से वे सफलता की उड़ान भरती हैं। ऐसे में फिल्म के मुख्य कलाकारों के लिए 60-70 लड़कियों का ऑडिशन किया। आखिर में पांच लड़कियों का चयन किया। इस तरह यह फिल्म ‘कैलेंडर गर्ल’ का खिताब पाने के बाद की कहानी बयां करती है। ‘कैलेंडर गर्ल’ का हिस्सा बनने के लिए कई प्रांत से लड़कियां आती हैं। मुंबई की चकाचौंध के साथ कई समायोजित हो जाती हैं, कई वैसा नहीं कर पाती। खिताब पाने के बाद ऊंचाइयों के कौन से प्रतिमान स्थापित किए जा सकते हैं, यह फिल्म उस बारे में भी है।’

पिछली फिल्मों से तुलना नहीं
मधुर कहते हैं, ‘इस फिल्म का ग्लैमर ‘कॉरपोरेट’, ‘पेज थ्री’, ‘फैशन’ से इतर है। इसकी ‘फैशन’ से तुलना भी जायज नहीं, क्योंकि वह मेघना माथुर की कहानी थी। यहां पांच लड़कियों की कहानी है, जो एक-दूसरे से अलग हैं। ‘कैलेंडर गर्ल्स’ की पांचों लड़कियां मेन लीड हैं। सबको जस्टिफाई किया है। एक साल के दरम्यान कैलेंडर गर्ल बनीं लड़कियों की जिंदगी में क्या उतार-चढ़ाव आते हैं? वे किन चीजों से गुजरती हैं? उनकी आपसी भावनात्मक बॉन्डिंग क्या है? फिल्म उन चीजों के बारे में भी है।’

ग्लैमर वर्ल्स की हकीकत बताते हैं मधुर। वह कहते हैं, ‘ग्लैमर वर्ल्ड में मर्दों के साथ भी शोषण होता है। मुझे महिलाओं की कहानियां इसलिए अपील करती हैं, क्योंकि उनकी कहानियां मेरे कंफर्ट में आती हैं। कैलेंडर गर्ल का संघर्ष काफी रोचक और प्रेरक है, जिसे लोगों तक पहुंचना चाहिए। हम सिर्फ एक फीसदी सच दिखा पाते हैं। अगर कोई फिल्ममेकर स्पोट्र्स को केंद्र में रख फिल्में बनाता है तो उसमें क्रिकेट, हॉकी, गोल्फ, सॉकर, रेसलिंग आदि हैं न। सभी को एक ही कहानी तो नहीं कहेंगे। इस तरह ग्लैमर जगत की अलग-अलग कहानियों को पेश करने की कोशिश है।’

सम्मोहित करती है ग्लैमर इंडस्ट्री
मधुर आगे बताते हैं, ‘यह फिल्म आज की पीढ़ी को जरूर देखनी चाहिए ताकि उन्हें आकांक्षा, संघर्ष, प्रेरणा के बारे में पता चल सके। कैलेंडर गर्ल बनने लड़कियां किसी खास प्रांत से नहीं आती। कोई रोहतक से होती हैं तो कई बंगाल से। कुछ गोवा से आती हैं। ग्लैमर वर्ल्ड की चमक हर किसी को सम्मोहित करती है। हमें सिर्फ एक सफल दिखता है, पर 99 उन लोगों को नहीं देख पाते, जो प्रतिभावान होने के बावजूद सफल नहीं हो पाते। हम महज एक फीसदी सफल को फॉलो करते हैं। ‘कैलेंडर गर्ल्स’ गुमनामी में गुम लोगों की कहानी है। एक सच्चाई की तस्वीर पेश करती है। मैंने खुद बड़े नाम देखे हैं, जो आज कहीं नहीं हैं। जिन्हें आज कोई नहीं पूछता। मुझे इन कड़वी हकीकतों को दिखाने में बड़ा मजा आता है, मुझे सच्चाई दिखाना पसंद है।’

अजय ब्रह्मात्मज

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Posted By: Monika Sharma

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